वैशंपायन उवाच ।
द्वाःस्थं प्राह महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
विदुरं द्रष्टुमिच्छामि तमिहानय माचिरम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं- [संजय के चले जाने पर] महाबुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्र ने द्वारपाल से कहा- मैं विदुर से मिलना चाहता हूँ। उन्हें यहाँ शीघ्र बुला लाओ’॥ १ ॥

प्रहितो धृतराष्ट्रेण दूतः क्षत्तारमब्रवीत् ।
ईश्वरस्त्वां महाराजो महाप्राज्ञ दिदृक्षति ॥ २ ॥

धृतराष्ट्र का भेजा हुआ बह दूत जाकर विदुर से बोला- महामते ! हमारे स्वामी महाराज धृतराष्ट्र आपसे मिलना चाहते हैं’ ॥ २ ॥

एवमुक्तस्तु विदुरः प्राप्य राजनिवेशनम् ।
अब्रवीद्धृतराष्ट्राय द्वाःस्थ मां प्रतिवेदय ॥ ३ ॥

उसके ऐसा कहने पर विदुर जी राजमहल के पास जाकर बोले-‘द्वारपाल ! धृतराष्ट्रको मेरे आने की सूचना दे दो’॥ ३ ॥

द्वाःस्थ उवाच ।
विदुरोऽयमनुप्राप्तो राजेन्द्र तव शासनात् ।
द्रष्टुमिच्छति ते पादौ किं करोतु प्रशाधि माम् ॥ ४ ॥

द्वारपाल ने जाकर कहा- महाराज ! आपकी आज्ञा से विदुरजी यहाँ आ पहुँचे हैं, वे आपके चरणों का दर्शन करना चाहते हैं । मुझे आज्ञा दीजिये, उन्हें क्या कार्य बताया जाय’ ॥ ४ ॥

धृतराष्ट्र उवाच ।
प्रवेशय महाप्राज्ञं विदुरं दीर्घदर्शिनम् ।
अहं हि विदुरस्यास्य नाकाल्यो जातु दर्शने ॥ ५ ॥

धृतराष्ट्र ने कहा-‘महाबुद्धिमान् दूरदर्शी विदुर को भीतर ले आओ, मुझे इस विदुर से मिलने में कभी भी अड़चन नहीं है’ ॥ ५ ॥

द्वाःस्थ उवाच ।
प्रविशान्तः पुरं क्षत्तर्महाराजस्य धीमतः ।
न हि ते दर्शनेऽकाल्यो जातु राजा ब्रवीति माम् ॥ ६ ॥

द्वारपाल विदुर के पास आकर बोला -‘विदुरजी ! आप बुद्धिमान् महाराज धृतराष्ट्र के अन्तःपुर में प्रवेश कीजिये । महाराज ने मुझसे कहा है कि मुझे विदुर से मिलने में कभी अड़चन नहीं है’ ॥ ६ ॥

वैशंपायन उवाच ।
ततः प्रविश्य विदुरो धृतराष्ट्र निवेशनम् ।
अब्रवीत्प्राञ्जलिर्वाक्यं चिन्तयानं नराधिपम् ॥ ७ ॥

वैशम्पायन जी कहते हैं-तदनन्तर विदुर धृतराष्ट्र के महल के भीतर जाकर चिन्ता में पड़े हुए राजासे हाथ जोड़कर बोले— ॥ ७ ॥

विदुरोऽहं महाप्राज्ञ सम्प्राप्तस्तव शासनात् ।
यदि किं चन कर्तव्यमयमस्मि प्रशाधि माम् ॥ ८ ॥

महाप्राज्ञ ! मैं विदुर हूँ, आपकी आज्ञा से यहाँ आया हूँ । यदि मेरे करने योग्य कुछ काम हो तो मैं उपस्थित हूँ, मुझे आज्ञा कीजिये’ ॥ ८ ॥

धृतराष्ट्र उवाच ।
सञ्जयो विदुर प्राप्तो गर्हयित्वा च मां गतः ।
अजातशत्रोः श्वो वाक्यं सभामध्ये स वक्ष्यति ॥ ९ ॥

धृतराष्ट्रने कहा- विदुर ! बुद्धिमान् संजय आया था, मुझे बुरा-भला कहकर चला गया है । कल सभामें वह अजातशत्रु युधिष्ठिर के वचन सुनायेगा ॥ ९ ॥

तस्याद्य कुरुवीरस्य न विज्ञातं वचो मया ।
तन्मे दहति गात्राणि तदकार्षीत्प्रजागरम् ॥ १० ॥

आज मैं उस कुरुवीर युधिष्ठिर की बात न जान सका – यही मेरे अङ्गों को जला रहा है और इसी ने मुझे अब तक जगा रखा है।। १० ॥

जाग्रतो दह्यमानस्य श्रेयो यदिह पश्यसि ।
तद्ब्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलो ह्यसि ॥ ११ ॥

तात ! मैं चिन्ता से जलता हुआ अभी तक जग रहा हैँ । मेरे लिये जो कल्याण की बात समझो, वह कहो; क्योंकि हमलोगों में तुम्हीं धर्म और अर्थ के ज्ञान में निपुण हो ॥ ११ ॥

यतः प्राप्तः सञ्जयः पाण्डवेभ्यो न मे यथावन्मनसः प्रशान्तिः ।
सवेन्द्रियाण्यप्रकृतिं गतानि किं वक्ष्यतीत्येव हि मेऽद्य चिन्ता ॥ १२ ॥

संजय जबसे पाण्डवों के यहाँ से लौटकर आया है, तबसे मेरे मनको पूर्ण शान्ति नहीं मिलती। सभी इन्द्रियाँ विकल हो रही हैं। कल वह क्या कहेगा, इसी बातकी मुझे इस समय बड़ी भरी चिन्ता हो रही है ।। १२ ॥

विदुर उवाच ।
अभियुक्तं बलवता दुर्बलं हीनसाधनम् ।
हृतस्वं कामिनं चोरमाविशन्ति प्रजागराः ॥ १३ ॥

विदुरजी बोले-राजन् ! जिसका बलवान के साथ विरोध हो गया है उस साधनहीन दुर्बल मनुष्य को, जिसका सब कुछ हर लिया गया है उसको, कामी को तथा चोर को रात में जागने का रोग लग जाता है ॥ १३ ॥

कच्चिदेतैर्महादोषैर्न स्पृष्टोऽसि नराधिप ।
कच्चिन्न परवित्तेषु गृध्यन्विपरितप्यसे ॥ १४ ॥

नरेन्द्र ! कहीं आपका भी इन महान् दोषों से सम्पर्क तो नहीं हो गया है ? कहीं पराये धन के लोभ से तो आप कष्ट नहीं पा रहे हैं ? ॥ १४ ॥

धृतराष्ट्र उवाच ।
श्रोतुमिच्छामि ते धर्म्यं परं नैःश्रेयसं वचः ।
अस्मिन्राजर्षिवंशे हि त्वमेकः प्राज्ञसंमतः ॥ १५ ॥

धृतराष्ट्रने कहा-मैं तुम्हारे धर्मयुक्त तथा कल्याण करने वाले सुन्दर वचन सुनना चाहता हूँ, क्योंकि इस राजर्षिवंश में केवल तुम्हीं विद्वानों के भी माननीय हो।। १५ ॥

विदुर उवाच ।
रजा लक्षणसंपन्नस्त्रैलोक्यस्याधिपो भवेत् ।
प्रेष्यस्ते प्रेषितश्चैव धृतराष्ट्र युधिष्ठिरः ॥ १६ ॥

विदुरजी बोले-महाराज धृतराष्ट्र ! श्रेष्ठ लक्षणों से सम्पन्न राजा युधिष्ठिर तीनों लोकों के स्वामी हो सकते हैं । वे आपके आज्ञाकारी थे, पर आपने उन्हें वन में भेज दिया॥ १६ ॥

विपरीततरश्च त्वं भागधेये न संमतः ।
अर्चिषां प्रक्षयाच्चैव धर्मात्मा धर्मकोविदः ॥ १७ ॥

आप धर्मात्मा और धर्म के जानकार होते हुए भी आँखों से अन्धे होने के कारण उन्हें पहचान न सके, इसीसे उनके अत्यन्त विपरीत हो गये और उन्हें राज्य का भाग देने में आपकी सम्मति नहीं हुई ॥ १७ ॥

आनृशंस्यादनुक्रोशाद्धर्मात्सत्यात्पराक्रमात् ।
गुरुत्वात्त्वयि संप्रेक्ष्य बहून्क्लेषांस्तितिक्षते ॥ १८ ॥

युधिष्ठिर में क्रूरता का अभाव, दया, धर्म, सत्य तथा पराक्रम है; वे आप में पूज्यबुद्धि रखते हैं । इन्हीं सद्गुणों के कारण वे सोच- विचारकर चुपचाप बहुत-से क्लेश सह रहे हैं ॥ १८॥

दुर्योधने सौबले च कर्णे दुःशासने तथा ।
एतेष्वैश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि ॥ १९ ॥

आप दुर्योधन, शकुनि, कर्ण तथा दुःशासन-जैसे अयोग्य व्यक्तियों पर राज्य का भार रखकर कैसे ऐश्वर्य-वृद्धि चाहते हैं ? ॥ १९ ॥

आत्मज्ञानं समारंभस्तितिक्षा धर्मनित्यता ।
यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्दित उच्यते ॥ २० ॥

अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान, उद्योग, दुःख सहने की शक्ति और धर्ममें स्थिरता- ये गुण जिस मनुष्य को पुरुषार्थ से च्युत नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है॥ २० ॥

निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते ।
अनास्तिकः श्रद्दधान एतत्पण्डित लक्षणम् ॥ २१ ॥

जो अच्छे कर्मो का सेवन करता और बुरे कर्मों से दूर रहता है , साथ ही जो आस्तिक और श्रद्धालु है, उसके वे सद्गुण पण्डित होने के लक्षण हैं॥ २१ ॥

क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीस्तम्भो मान्यमानिता ।
यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥ २२ ॥

क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्दप्डता तथा अपने को पूज्य समझना-ये भाव जिसको पुरुषार्थ से भ्रष्ट नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है ॥ २२ ॥

यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे ।
कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥ २३ ॥

दूसरे लोग जिसके कर्तव्य, सलाह और पहले से किये हुए विचार को नहीं जानते, बल्कि काम पूरा होने पर ही जानते हैं, वही पण्डित कहलाता है॥ २३ ॥

यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः ।
समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते ॥ २४ ॥

सदी-गर्मी, भय-अनुराग, सम्पत्ति अथवा दरिद्रता – ये जिसके कार्य में विघ्न नहीं डालते वही पण्डित कहलाता है ॥ २४ ॥

यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थावनुवर्तते ।
कामादर्थं वृणीते यः स वै पण्डित उच्यते ॥ २५ ॥

जिसकी लौकिक बुद्धि धर्म और अर्थका ही अनुसरण करती है और जो भोग को छोड़कर पुरुषार्थ का ही वरण करता है वही पण्डित कहलाता है।। २५॥

यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते ।
न किं चिदवमन्यन्ते पण्डिता भरतर्षभ ॥ २६ ॥

विवेकपूर्ण बुद्धि वाले पुरुष शक्ति के अनुसार काम करनेकी इच्छा रखते हैं और करते भी हैं तथा किसी वस्तु को तुच्छ समझकर उसकी अवहेलना नहीं करते।। २६ ।।

क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति विज्ञाय चार्थं भजते न कामात् ।
नासम्पृष्टो व्यौपयुङ्क्ते परार्थे तत्प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य ॥ २७ ॥

विद्वान् पुरुष किसी विषय को देर तक सुनता है किंतु शीघ्र ही समझ लेता है, समझकर कर्तव्यबुद्धि से पुरुषार्थ में प्रवृत्त होता है-कामना से नहीं; बिना पुछे दूसरे के विषय में व्यर्थ कोई बात नहीं कहता है। उसका यह स्वभाव पण्डित की मुख्य पहचान है ॥ २७ ॥

नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम् ।
आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डित बुद्धयः ॥ २८ ॥

पण्डितों की-सी बुद्धि रखने वाले मनुष्य दुर्लभ वस्तु की कामना नहीं करते, खोयी हुई वस्तु के विषय में शोक करना नहीं चाहते और विपत्ति में पड़कर घबराते नहीं हैं॥ २८ ॥

निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः ।
अवन्ध्य कालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते ॥ २९ ॥

जो पहले निश्चय करके फिर कार्य का आरम्भ करता है, कार्य के बीच में नहीं रुकता, समय को व्यर्थ नहीं जाने देता और चित्तको वश में रखता है, वही पण्डित कहलाता है॥ २९ ॥

आर्य कर्मणि राज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते ।
हितं च नाभ्यसूयन्ति पण्डिता भरतर्षभ ॥ ३० ॥

भरतकुल-भूषण ! पण्डित जन श्रेष्ठ कर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के कार्य करते हैं तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते हैं ॥ ३० ॥

न हृष्यत्यात्मसंमाने नावमानेन तप्यते ।
गाङ्गो ह्रद इवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते ॥ ३१ ॥

जो अपना आदर होने पर हर्ष के मारे फूल नहीं उठता, अनादर से संतप्त नहीं होता तथा गङ्गाजी के कुण्ड के समान जिसके चित्त को क्षोभ नहीं होता, वह पण्डित कहलाता है॥ ३१ ॥

तत्त्वज्ञः सर्वभूतानां योगज्ञः सर्वकर्मणाम् ।
उपायज्ञो मनुष्याणां नरः पण्डित उच्यते ॥ ३२ ॥

जो सम्पूर्ण भौतिक पदार्थो की असलियत का ज्ञान रखनेवाला सब कार्य कि करने का ढंग जानने वाला तथा मनुष्यों में सबसे बढ़कर उपाय का जानकार है, वही मनुष्य पण्डित कहलाता है॥ ३२ ॥

प्रवृत्त वाक्चित्रकथ ऊहवान्प्रतिभानवान् ।
आशु ग्रन्थस्य वक्ता च स वै पण्डित उच्यते ॥ ३३ ॥

जिसकी वाणी कहीं रुकती नहीं, जो विचित्र ढंग से बातचीत करता है, तर्क में निपुण और प्रतिभाशाली है तथा जो ग्रन्थ के तात्पर्य को शीघ्र बता सकता है, वही पण्डित कहलाता है ३३ ॥

श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा ।
असम्भिन्नार्य मर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः ॥ ३४ ॥

जिसकी विद्या बुद्धि का अनुसरण करती है और बुद्धि विद्या का तथा जो शिष्ट पुरुषो की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, वही पण्डित’ की पदवी पा सकता है॥ ३४ ॥

अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः ।
अर्थांश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः ॥ ३५ ॥

बिना पढ़े ही गर्व करने वाले, दरिद्र होकर भी बड़े-बड़े मनसूबे बाँधने वाले और बिना काम किये ही धन पानेकी इच्छा रखने वाले मनुष्य को पण्डित लोग मुर्ख कहते हैं ॥ ३५॥

स्वमर्थं यः परित्यज्य परार्थमनुतिष्ठति ।
मिथ्या चरति मित्रार्थे यश्च मूढः स उच्यते ॥ ३६ ॥

जो अपना कर्तव्य छोड़कर दूसरे के कर्तव्य का पालन करता है तथा मित्र के साथ असत् आचरण करता है; वह मूर्ख कहलाता है।। ३६ ॥

अकामां कामयति यः कामयानां परित्यजेत् ।
बलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ ३७ ॥

जो न चाहने वालों को चाहता है और चाहने वालों को त्याग देता है तथा जो अपने से बलवान के साथ बैर बाँधता है, उसे मूढ़ विचारका मनुष्य’ कहते हैं ॥ ३७ ।।

अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च ।
कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ ३८ ॥

जो शत्रु को मित्र बनाता और मित्र से द्वेष करते हुए उसे कष्ट पहुँचाता है तथा सदा बुरे कर्मो का आरम्भ किया करता है, उसे मूढ़ चित्तवाला’ कहते हैं ॥ ३८ ॥

संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते ।
चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ ॥ ३९ ॥

भरतश्रेष्ठ ! जो अपने कामों को व्यर्थ ही फैलाता है, सर्वत्र सन्देह करता है तथा शीघ्र होने वाले काम में भी देर लगाता है, वह मूढ़ है ॥ ३९ ॥

श्राद्धं पितृभ्यो न ददाति दैवतानि नार्चति ।
सुहृन्मित्रं न लभते तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ ४० ॥

जो पितरों का श्राद्ध और देवताओं का पूजन नहीं करता तथा जिसे सुहृद् मित्र नहीं मिलता, उसे मूढ़ चित्तवाला’ कहते हैं ॥ ४० ॥

अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते ।
विश्वसत्यप्रमत्तेषु मूढ चेता नराधमः ॥ ४१ ॥

मूढ़ चित्तवाला अधम मनुष्य बिना बुलाये ही भीतर चला आता है, बिना बोलता है तथा अविश्वसनीय मनुष्योंपर भी विश्वास करता है।।४१ ॥

परं क्षिपति दोषेण वर्तमानः स्वयं तथा ।
यश्च क्रुध्यत्यनीशः सन्स च मूढतमो नरः ॥ ४२ ॥

स्वयं दोषयुक्त बर्ताव करते हुए भी जो दूसरे पर उसके दोष बताकर आक्षेप करता है तथा जो असमर्थ होते हुए भी व्यर्थ का क्रोध करता है, वह मनुष्य महामूर्ख है।। ४२ ॥

आत्मनो बलमाज्ञाय धर्मार्थपरिवर्जितम् ।
अलभ्यमिच्छन्नैष्कर्म्यान्मूढ बुद्धिरिहोच्यते ॥ ४३ ॥

जो अपने बलको न समझकर बिना काम किये ही धर्म और अर्थसे विरुद्ध तथा न पाने योग्य वस्तुकी इच्छा करता है, वह पुरुष इस संसार में ‘मूढ़बुद्धि’ कहलाता है ॥ ४३ ॥

अशिष्यं शास्ति यो राजन्यश्च शून्यमुपासते ।
कदर्यं भजते यश्च तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ ४४ ॥

राजन् ! जो अनधिकारी को उपदेश देता और शुन्य की उपासना करता है तथा जो कृपण का आश्रय लेता है, उसे मूढ़ चित्तवाला कहते हैं ॥ ४४॥

अर्थं महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव वा ।
विचरत्यसमुन्नद्धो यः स पण्डित उच्यते ॥ ४५ ॥

बहुत धन, विद्या तथा ऐश्वर्य को पाकर भी इठलाता नहीं चलता, बह पण्डित कहलाता है ॥ ४५ ॥

एकः सम्पन्नमश्नाति वस्ते वासश्च शोभनम् ।
योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः को नृशंसतरस्ततः ॥ ४६ ॥

जो अपने द्वारा भरण-पोषण के योग्य व्यक्तियों को बाँटे बिना अकेले ही उत्तम भोजन करता और अच्छा वस्त्र पहनता है, उससे बढ़कर क्रूर कौन होगा ॥ ४६॥

एकः पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजनः ।
भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते ॥ ४७ ॥

मनुष्य अकेला पाप करता है और बहुत-से लोग उससे मौज उड़ाते हैं। मौज उड़ाने वाले तो छूट जाते हैं, पर उसका कर्ता ही दोष का भागी होता है ।।४७॥

एकं हन्यान्न वाहन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता ।
बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद्राष्ट्रं सराजकम् ॥ ४८ ॥

किसी धनुर्धर वीर के द्वारा छोड़ा हुआ बाण सम्भव है एक को भी मारे या न मारे। मगर बुद्धिमान द्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजाके साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र का विनाश कर सकती है ।। ४८ ।।

एकया द्वे विनिश्चित्य त्रींश्चतुर्भिर्वशे कुरु ।
पञ्च जित्वा विदित्वा षट्सप्त हित्वा सुखी भव ॥ ४९ ॥

एक (बुद्धि) से दो (कर्तव्य और अकर्तव्य) का निश्चय करके चार (साम, दान, भेद, दपण्ड) से तीन (शत्रु, मित्र, तथा उदासीन) को वश में कीजिये। पाँच (इन्द्रियों) को जीतकर छः (सन्धि विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रयरूप) गुणों को जानकर तथा सात (स्त्री, जूआ, मृगया, मद्य, कठोर वचन, दण्ड की कठोरता और अन्याय से धन का उपार्जन) को छोड़कर सुखी हो जाइये ॥ ४९ ॥

एकं विषरसो हन्ति शस्त्रेणैकश्च वध्यते ।
सराष्ट्रं स प्रजं हन्ति राजानं मन्त्रविस्रवः ॥ ५० ॥

विष का रस एक (पीने वाले) को ही मारता है, शस्त्र से एक का ही वध होता है, किंतु मन्त्र का फूटना राष्ट्र और प्रजा के साथ ही राजा का भी विनाश कर डालता है॥ ५० ॥

एकः स्वादु न भुञ्जीत एकश्चार्थान्न चिन्तयेत् ।
एको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्तेषु जागृयात् ॥ ५१ ॥

अकेले स्वादिष्ट भोजन न करे, अकेला किसी विषय का निश्चय न करे, अकेला रास्ता न चले और बहुत-से लोग सोये हों तो उनमें अकेला न जागता रहे ।। ५१ ।।

एकमेवाद्वितीयं तद्यद्राजन्नावबुध्यसे ।
सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव ॥ ५२ ॥

राजन् ! जैसे समुद्र के पार जाने के लिये नाव ही एकमात्र साधन है, उसी प्रकार स्वर्ग के लिये सत्य ही एकमात्र सोपान है, दूसरा नहीं, किंतु आप इसे नहीं समझ रहे हैं ॥ ५२ ॥

एकः क्षमावतां दोषो द्वितीयो नोपलभ्यते ।
यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः ॥ ५३ ॥

क्षमाशील पुरुषों में एक ही दोष का आरोप होता है, दूसरे की तो सम्भावना ही नहीं है। वह दोष यह है कि क्षमाशील मनुष्य को लोग असमर्थ समझ लेते हैं ॥ ५३ ॥

सोऽस्य दोषो न मन्तव्यः क्षमा हि परमं बलम् ।
क्षमा गुणो ह्यशक्तानां शक्तानां भूषणं तथा ॥ ५४ ॥

किंतु क्षमाशील पुरुष का वह दोष नहीं मानना चाहिये; क्योंकि क्षमा बहुत बड़ा बल है। क्षमा असमर्थ मनुष्यों का गुण तथा समर्थों का भूषण है ॥ ५४ ॥

क्षमा वशीकृतिर्लोके क्षमया किं न साध्यते ।
शान्तिशङ्खः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः ॥ ५५ ॥

इस जगत में क्षमा वशीकरणरूप है । भला, क्षमा से क्या नहीं सिद्ध होता ? जिसके हाथ में शान्ति रूपी तलवार है, उसका दुष्ट पुरुष क्या कर लेंगे ? ॥ ५५॥

अतृणे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति ।
अक्षमावान्परं दोषैरात्मान्ं चैव योजयेत् ॥ ५६ ॥

तृणरहित स्थान में गिरी हुई आग अपने-आप बुझ जाती है । क्षमाहीन पुरुष अपने को तथा दूसरे को भी दोष का भागी बना लेता है ॥ ५६॥

एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा ।
विद्यैका परमा दृष्टिरहिंसैका सुखावहा ॥ ५७ ॥

केवल धर्म ही परम कल्याणकारक हैं, एकमात्र क्षमा ही शान्ति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। एक विद्या ही परम सन्तोष देनेवाली है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देने वाली है॥ ५७ ॥

द्वाविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलशयानिव ।
राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ ५८ ॥

बिल में रहने वाले मेढक आदि जीवों को जैसे साँप खा जाता है, उसी प्रकार यह पृथ्वी शत्रु से विरोध न करने वाले राजा और परदेश-सेवन न करने वाले ब्राह्मण-इन दोनों को खा जाती है ॥ ५८ ॥

द्वे कर्मणी नरः कुर्वन्नस्मिँल्लोके विरोचते ।
अब्रुवन्परुषं किं चिदसतो नार्थयंस्तथा ॥ ५९ ॥

जरा भी कठोर न बोलना और दुष्ट पुरुषों का आदर न करना-इन दो कर्मो को करने वाला मनुष्य इस लोक में विशेष शोभा पाता है ॥ ५९ ॥

द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र परप्रत्यय कारिणौ ।
स्त्रियः कामित कामिन्यो लोकः पूजित पूजकः ॥ ६० ॥

दूसरी स्त्री द्वारा चाहे गये पुरुष की कामना करने वाली स्त्रियाँ तथा दूसरों के द्वारा पूजित मनुष्य का आदर करने वाले पुरुष- ये दो प्रकार के लोग दूसरों पर विश्वास करके चलने वाले हैं ॥ ६० ॥

द्वाविमौ कण्टकौ तीक्ष्णौ शरीरपरिशोषणौ ।
यश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यत्यनीश्वरः ॥ ६१ ॥

जो निर्धन होकर भी बहुमूल्य वस्तु की इच्छा रखता और असमर्थ होकर भी क्रोध करता है-ये दोनों ही अपने शरीर को सुखा देने वाले काँटों के समान हैं ॥ ६१ ॥

द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा ।
गृहस्थश्च निरारंभः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः ॥ ६२ ॥

दो ही अपने विपरीत कर्म के कारण शोभा नहीं पाते- अकर्मण्य गृहस्थ और प्रपञ्च में लगा हुआ संन्यासी ॥ ६२ ॥

द्वाविमौ पुरुषौ राजन्स्वर्गस्य परि तिष्ठतः ।
प्रभुश्च क्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान् ॥ ६३ ॥

राजन् ! ये दो प्रकार के पुरुष स्वर्ग के भी ऊपर स्थान पाते हैं-शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने वाला और निर्धन होने पर भी दान देने वाला ॥ ६३ ॥

न्यायागतस्य द्रव्यस्य बोद्धव्यौ द्वावतिक्रमौ ।
अपात्रे प्रतिपत्तिश्च पात्रे चाप्रतिपादनम् ॥ ६४ ॥

न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए धन के दो ही दुरुपयोग समझने चाहिये-अपात्र को देना और सत्पात्र को न देना ॥ ६४ ॥

द्वावंभसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढं शिलाम् ।
धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम् ॥ ६५ ॥

जो धनी होने पर भी दान न दे और दरिद्र होने पर भी कष्ट सहन न कर सके -इन दो प्रकार के मनुष्यों को गले में मजबूत पत्थर बाँधकर पानी में डुबा देना चाहिये । ६५ ॥

द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र सुर्यमण्डलभेदिनौ ।
परिव्राड्योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः ॥ ६६ ॥

पुरुषश्रेष्ठ ! ये दो प्रकार के पुरुष सूर्यमण्डल को भेदकर ऊर्ध्वगति को प्राप्त होते हैं-योगयुक्त संन्यासी और संग्राम में लोहा लेते हुए मारा गया योद्धा ॥ ६६ ॥

त्रयो न्याया मनुष्याणां श्रूयन्ते भरतर्षभ ।
कनीयान्मध्यमः श्रेष्ठ इति वेदविदो विदुः ॥ ६७ ॥

भरतश्रेष्ठ ! मनुष्यों की कार्य सिद्धि के लिये उत्तम, मध्यम और अधम—ये तीन प्रकार के न्यायानुकूल उपाय सुने जाते हैं, ऐसा वेदवेत्ता विद्वान् जानते हैं॥ ६७॥

त्रिविधाः पुरुषा राजन्नुत्तमाधममध्यमाः ।
नियोजयेद्यथावत्तांस्त्रिविधेष्वेव कर्मसु ॥ ६८ ॥

राजन् ! उत्तम, मध्यम और अधम—ये तीन प्रकारके पुरुष होते हैं, इनको यथायोग्य तीन ही प्रकार के कर्मोमें लगाना चाहिये ।। ६८ ॥।

त्रय एवाधना राजन्भार्या दासस्तथा सुतः ।
यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम् ॥ ६९ ॥

राजन् ! तीन ही धनके अधिकारी नहीं माने जाते-स्त्री, पुत्र तथा दास। ये जो कुछ कमाते हैं, वह धन उसीका होता है जिसके अधीन ये रहते हैं। ६९ ॥

हरणं च परस्वानां परदाराभिमर्शनम् ।
सुहृदश्च परित्यागस्त्रयो दोषा क्षयावहः ॥ ७० ॥

दूसरे के धन का हरण, दूसरे की स्त्री का संसर्ग तथा सुहृद् मित्र का परित्याग-ये तीनों ही दोष, नाश करने वाले होते हैं।। ७० ॥

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ ७१ ॥

काम, क्रोध और लोभ- ये आत्मा का नाश करने वाले नरक के तीन दरवाजे हैं, अतः इन तीनों को त्याग देना चाहिये ।। ७१ ॥

वरप्रदानं राज्यां च पुत्रजन्म च भारत ।
शत्रोश्च मोक्षणं कृच्छ्रात्त्रीणि चैकं च तत्समम् ॥ ७२ ॥

भारत ! वरदान पाना, राज्य की प्राप्ति और पुत्र का जन्म- ये तीन एक ओर और शत्रु के कष्ट से छूटना-यह एक तरफ; वे तीन और यह एक बराबर ही है । ७२ ॥

भक्तं च बजमानं च तवास्मीति वादिनम् ।
त्रीनेतान् शरणं प्राप्तान्विषमेऽपि न सन्त्यजेत् ॥ ७३ ॥

भक्त, सेवक तथा मैं आपका ही हूँ, ऐसा कहने वाले- इन तीन प्रकार के शरणागत मनुष्यों को संकट पड़ने पर भी नहीं छोड़ना चाहिये।। ७३ ॥

चत्वारि राज्ञा तु महाबलेन वर्ज्यान्याहुः पण्डितस्तानि विद्यात् ।
अल्पप्रज्ञैः सह मन्त्रं न कुर्यान् न दीर्घसूत्रैरलसैश्चारणैश्च ॥ ७४ ॥

थोड़ी बुद्धिवाले, दीर्षसूत्री, जल्दबाज और स्तुति करने वाले लोगों के साथ गुप्त सलाह नहीं करनी चाहिये- ये चारों महाबली राजा के लिये त्यागने योग्य बताये गये हैं । विद्वान् पुरुष ऐसे लोगों को पहचान ले । ७४ ।।

चत्वारि ते तात गृहे वसन्तु श्रियाभिजुष्टस्य गृहस्थ धर्मे ।
वृद्धो ज्ञातिरवसन्नः कुलीनः सखा दरिद्रो भगिनी चानपत्या ॥ ७५ ॥

तात ! गृहस्थ-धर्म में स्थित लक्ष्मीवान् आपके घर में चार प्रकार के मनुष्यों को सदा रहना चाहिये-अपने कुटुम्ब का बूढ़ा, संकट में पड़ा हुआ उच्च कुल का मनष्य, धनहीन मित्र और बिना सन्तान की बहिन ॥ ७५॥

चत्वार्याह महाराज सद्यस्कानि बृहस्पतिः ।
पृच्छते त्रिदशेन्द्राय तानीमानि निबोध मे ॥ ७६ ॥

महाराज ! इन्द्र के पूछने पर उनसे बृहस्पतिजी ने जिन चारों को तत्काल फल देने वाला बताया था, उन्हें आप मुझसे सुनिये- ॥ ७६॥

देवतानां च सङ्कल्पमनुभावं च धीमताम् ।
विनयं कृतविद्यानां विनाशं पापकर्मणाम् ॥ ७७ ॥

देवताओं का सङ्कल्प, बुद्धिमानों का प्रभाव, विद्वानों की नम्रता और पापियों का विनाश ॥ ७७ ॥

चत्वारि कर्माण्यभयङ्कराणि भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि ।
मानाग्निहोत्रं उत मानमौनं मानेनाधीतमुत मानयज्ञः ॥ ७८ ॥

चार कर्म भय को दूर करने वाले हैं; किन्तु वे ही यदि ठीक तरह से सम्पादित न हों तो भय प्रदान करते हैं। वे कर्म हैं-आदर के साथ अग्निहोत्र, आदरपूर्वक मौन का पालन, आदरपूर्वक स्वाध्याय और आदर के साथ यज्ञ का अनुष्टान ॥ ७८ ।।

पञ्चाग्नयो मनुष्येण परिचर्याः प्रयत्नतः ।

पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च भरतर्षभ ॥ ७९ ॥

भरतश्रेष्ठ ! पिता, माता, अमि, आत्मा और गुरु- मनुष्य को इन पॉँच अग्नियों की बड़े यत्नसे सेवा करनी चाहिये ७९ ॥

पञ्चैव पूजयँल्लोके यशः प्राप्नोति केवलम् ।
देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च भिक्षूनतिथिपञ्चमान् ॥ ८० ॥

देवता, पितर, मनुष्य, संन्यासी और अतिथि- इन पाँचों की पूजा करने वाला मनुष्य शुद्ध यश प्राप्त करता है। ८० ॥

पञ्च त्वानुगमिष्यन्ति यत्र यत्र गमिष्यसि ।
मित्राण्यमित्रा मध्यस्था उपजीव्योपजीविनः ॥ ८१ ॥

राजन् ! आप जहाँ-जहाँ जायँगे वहाँ-वहाँ मित्र- शत्रु, उदासीन, आश्रय देने वाले तथा आश्रय पाने वाले – ये पाँच आप के पीछे लगे रहेंगे।। ८१ ॥

पञ्चेन्द्रियस्य मर्त्यस्य छिद्रं चेदेकमिन्द्रियम् ।
ततोऽस्य स्रवति प्रज्ञा दृतेः पादादिवोदकम् ॥ ८२ ॥

पाँच ज्ञानेन्द्रियों वाले पुरुष की यदि एक भी इन्द्रिय छिद्र (दोष) युक्त हो जाय तो उससे उसकी बुद्धि इस प्रकार बाहर निकल जाती है, जैसे मशक के छेद से पानी ॥ ८२ ॥

षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्री भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥ ८३ ॥

ऐश्वर्य या उन्नति चाहने वाले पुरुषों को नींद, तन्द्रा (ऊँघना), डर, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घ सूत्रता (जल्दी हो जाने वाले काम में अधिक देर लगाने की आदत)-इन छः दुर्गुणों को त्याग देना चाहिये ॥ ८३ ॥

षडिमान्पुरुषो जह्याद्भिन्नां नावमिवार्णवे ।
अप्रवक्तारमाचार्यमनधीयानमृत्विजम् ॥ ८४ ॥

अरक्षितारं राजानं भार्यां चाप्रिय वादिनीम् ।
ग्रामकारं च गोपालं वनकामं च नापितम् ॥ ८५ ॥

उपदेश न देनेवाले आचार्य, मन्त्रोच्यारण न करनेवाले होता, रक्षा करने में असमर्थ राजा, कटु वचन बोलनेवाली स्त्री ग्राम में रहने की इच्छा वाले ग्वाले तथा वनमें रहनेकी इच्छावाले नाई-इन छःको उसी भाँति छोड़ दे. जैसे उपदेश न देने वाले आचार्य, मन्त्रोच्चारण न करनेवाले होता, रक्षा करनेमें असमर्थ राजा, कटु वचन बोलने वाली स्त्री, ग्राम में रहनेकी इच्छावाले ग्वाले तथा बनमें रहने की इच्छा वाले नाई-इन छःको उसी भाँति छोड़ दे, जैसे समुद्र की सैर करने वाला मनुष्य फटी हुई नाव का परित्याग कर देता है ।। ८४-८५ ।

षडेव तु गुणाः पुंसा न हातव्याः कदाचन ।
सत्यं दानमनालस्यमनसूया क्षमा धृतिः ॥ ८६ ॥

मनुष्य को कभी भी सत्य, दान, कर्मण्यता, अनसूया (गुणों में दोष दिखाने की प्रवृत्ति का अभाव), क्षमा तथा धैर्य-इन छः गुणों का त्याग नहीं करना चाहिये॥ ८६ ॥।

अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च ।
वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या षट् जीवलोकस्य सुखानि राजन् ॥ ८७ ॥

राजन् ! धनकी आय, नित्य नीरोग रहना, स्त्री का अनुकूल तथा प्रियवादिनी होना, पुत्रका आज्ञा के अन्दर रहना तथा धन पैदा करने वाली विद्या का ज्ञान-ये छः बातें इंस मनुष्य लोक में सुखदायिनी होती हैं। । ८७ ॥

षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति ।
न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रियः ॥ ८८ ॥

मनमें नित्य रहने वाले छः शत्रु-काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य कों जो वशमें कर लेता है, वह जितेन्द्रिय पुरुष पापों से ही लिप्त नहीं होता, फिर उनसे उत्पन्न होने वाले अनर्थों की तो बात ही क्या है॥ ८८ ॥

षडिमे षट्सु जीवन्ति सप्तमो नोपलभ्यते ।
चोराः प्रमत्ते जीवन्ति व्याधितेषु चिकित्सकाः ॥ ८९ ॥

प्रमदाः कामयानेषु यजमानेषु याजकाः ।
राजा विवदमानेषु नित्यं मूर्खेषु पण्डिताः ॥ ९० ॥

निम्नाङ्कित छः प्रकार के मनुष्य छः प्रकार के लोगों से अपनी जीविका चलाते हैं, सातवें की उपलब्धि नहीं होती। चोर असावधान पुरुष से, वैद्य रोगी से, मतवाली स्त्रियाँ कामियों से, पुरोहित यजमानों से, राजा झगड़ने वालों से तथा विद्वान् पुरुष मूरखों से अपनी जीविका चलाते हैं ॥ ८९-९० ।॥।

षडिमानि विनश्यन्ति मुहूर्तमनवेक्षणात् ।
गावः सेवा कृषिर्भार्या विद्या वृषलसंगतिः ॥ ९१ ॥

क्षणभर भी देख-रेख न करने से गौ, सेवा, खेती, स्त्री विद्या तथा शूद्रों से मेल-ये छः चीजें नष्ट हो जाती हैं ॥ ९१ ॥

षडेते ह्यवमन्यन्ते नित्यं पूर्वोपकारिणम् ।
आचार्यं शिक्षिता शिष्याः कृतदारश्च मातरम् ॥ ९२ ॥

नारिं विगतकामस्तु कृतार्थाश्च प्रयोजकम् ।
नावं निस्तीर्णकान्तारा नातुराश्च चिकित्सकम् ॥ ९३ ॥

ये छः सदा अपने पूर्व उपकारी का अनादर करते हैं-शिक्षा समाप्त हो जाने पर शिष्य आचार्य का, विवाहित बेटे माता का, कामवासना की शान्ति हो जानेपर मनुष्य स्त्री का, कृत कार्य पुरुष सहायक का, नदी की दुर्गम धारा पार कर लेने वाले पुरुष नावका तथा रोंगी पुरुष रोग छूटने के बाद वैद्य का तिरस्कार कर देते हैं १२-९३ ॥

आरोग्यमानृण्यमविप्रवासः सद्भिर्मनुष्यैः सह संप्रयोगः ।
स्वप्रत्यया वृत्तिरभीतवासः षट् जीवलोकस्य सुखानि राजन् ॥ ९४ ॥

राजन् ! नीरोग रहना, ऋणी न होना, परदेश में न रहना, अच्छे लोगों के साथ मेल होना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना और निडर होकर रहना-ये छः मनुष्य लोक के सुख हैं।॥ १४ ॥

ईर्षुर्घृणी नसन्तुष्टः क्रोधनो नित्यशङ्कितः ।
परभाग्योपजीवी च षडेते नित्यदुःखिताः ॥ ९५ ॥

ईष्ष्या करने वाला, घृणा करनेवाला, असन्तोषी, क्रोधी, सदा शङ्कित रहनेवाला और दूसरे के भाग्य पर जीवन-निर्वाह करनेवाला – ये छः सदा दुःखी रहते हैं ॥ ९५ ॥

सप्त दोषाः सदा राज्ञा हातव्या व्यसनोदयाः ।
प्रायशो यैर्विनश्यन्ति कृतमूलाश्च पार्थिवाः ॥ ९६ ॥

स्त्रियोऽक्षा मृगया पानं वाक्पारुष्यं च पञ्चमम् ।
महच्च दण्डपारुष्यमर्थदूषणमेव च ॥ ९७ ॥

स्त्रीविषयक आसक्ति, जूआ, शिकार, मद्यपान, वचन की कठोरता, अत्यन्त कठोर दण्ड देना और धनका दुरुपयोग करना-ये सात दुःखदायी दोष राजा को सदा त्याग देने चाहिये। इनसे दृढ़मूल राजा भी प्रायः नष्ट हो जाते हैं ॥ ९६-९७ ।।

अष्टौ पूर्वनिमित्तानि नरस्य विनशिष्यतः ।
ब्राह्मणान्प्रथमं द्वेष्टि ब्राह्मणैश्च विरुध्यते ॥ ९८ ॥

ब्राह्मण स्वानि चादत्ते ब्राह्मणांश्च जिघांसति ।
रमते निन्दया चैषां प्रशंसां नाभिनन्दति ॥ ९९ ॥

नैतान्स्मरति कृत्येषु याचितश्चाभ्यसूयति ।
एतान्दोषान्नरः प्राज्ञो बुद्ध्या बुद्ध्वा विवर्जयेत् ॥ १०० ॥

विनाश के मुख में पड़ने वाले मनुष्य के आठ पूर्वचिह्न हैं-प्रथम तो वह ब्राह्मणों से द्वेष करता है, फिर उनके विरोधका पात्र बनता है, ब्राह्मणों का धन हड़प लेता है, उनको मारना चाहता है, ब्राह्मणों की निन्दा में आनन्द मानता है, उनकी प्रशंसा सुनना नहीं चाहता, यज्ञ-यागादि में उनका स्मरण नहीं करता तथा कुछ माँगने पर उनमें दोष निकालने लगता है । इन सब दोषों को बुद्धिमान् मनुष्य समझे और समझकर त्याग दे ॥ ९८-१०० ॥

अष्टाविमानि हर्षस्य नव नीतानि भारत ।
वर्तमानानि दृश्यन्ते तान्येव सुसुखान्यपि ॥ १०१ ॥

समागमश्च सखिभिर्महांश्चैव धनागमः ।
पुत्रेण च परिष्वङ्गः संनिपातश्च मैथुने ॥ १०२ ॥

समये च प्रियालापः स्वयूथेषु च संनतिः ।
अभिप्रेतस्य लाभश्च पूजा च जनसंसदि ॥ १०३ ॥

भारत ! मित्रों से समागम, अधिक धनकी प्राप्ति, पुत्र का आलिङ्गन, मैथुन में प्रवृत्ति, समय पर प्रिय वचन बोलना, अपने वर्ग के लोगों में उन्नति, अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति और जन समाज में सम्मान-ये आठ हर्ष के सार दिखायी देते हैं और ये ही अपने लौकिक सुख के भी साधन होते हैं।। १०१-१०३ ॥

अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च ।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥ १०४ ॥

बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रियनिग्रह, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, अधिक न बोलना, হাक्ति के अनुसार दान और कृतज्ञता-ये आठ गुण पुरुष की ख्याति बढ़ा देते हैं। १०४ ॥

नवद्वारमिदं वेश्म त्रिस्थूणं पञ्च साक्षिकम् ।
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं विद्वान्यो वेद स परः कविः ॥ १०५ ॥

जो विद्वान् पुरुष [आँख, कान आदि] नौ दरवाजे वाले, तीन (वात, पित्त, कफरूपी) खम्भों वाले, पाँच (ज्ञानेन्द्रियरूप) साक्षीवाले आत्मा के निवास स्थान इस शरीर रूपी गृहको जानता है, वह बहुत बड़ा ज्ञानी है॥ १०५ ॥

दश धर्मं न जानन्ति धृतराष्ट्र निबोध तान् ।
मत्तः प्रमत्त उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धो बुभुक्षितः ॥ १०६ ॥

त्वरमाणश्च भीरुश्च लुब्धः कामी च ते दश ।
तस्मादेतेषु भावेषु न प्रसज्जेत पण्डितः ॥ १०७ ॥

महाराज धृतराष्ट्र ! दस प्रकार के लोग धर्म को नहीं जानते, उनके नाम सुनो । नशे में मतवाला, असावधान, पागल, थका हुआ, क्रोधी, भूखा, जल्दबाज, लोभी, भयभीत और कामी-ये दस हैं। अतः इन सब लोगों में विद्वान् पुरुष आसक्ति न बढ़ावे ॥ १०६-१०७ ।।

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
पुत्रार्थमसुरेन्द्रेण गीतं चैव सुधन्वना ॥ १०८ ॥

इसी विषय में असुरों के राजा प्रह्लादने सुधन्वा के साथ अपने पुत्र के प्रति कुछ उपदेश दिया था। नीतिज्ञ लोग उस पुराने इतिहास का उदाहरण देते हैं । १०८ ॥

यः काममन्यू प्रजहाति राजा पात्रे प्रतिष्ठापयते धनं च ।
विशेषविच्छ्रुतवान्क्षिप्रकारी तं सर्वलोकः कुरुते प्रमाणम् ॥ १०९ ॥

जो राजा काम और क्रोध का त्याग करता है और सुपात्र को धन देता है, विशेषज्ञ है, शास्त्रों का ज्ञाता और कर्तव्य को शीघ्र पूरा करने वाला है, उसे सब लोग प्रमाण मानते हैं।। १०९ ॥

जानाति विश्वासयितुं मनुष्यान् विज्ञात दोषेषु दधाति दण्डम् ।
जानाति मात्रां च तथा क्षमां च तं तादृशं श्रीर्जुषते समग्रा ॥ ११० ॥

जो मनुष्यों में विश्वास उत्पन्न करना जानता है, जिनका अपराध प्रमाणित हो गया है, उन्हीं को दण्ड देता है, जो दण्ड देनेकी न्यूनाधिक मात्रा तथा क्षमा का उपयोग जानता है, उस राजाकी सेवा में सम्पूर्ण सम्पत्ति चली आती है।। ११० ।

सुदुर्बलं नावजानाति कंचिद्- युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम् ।
न विग्रहं रोचयते बलस्थैः काले च यो विक्रमते स धीरः ॥ १११ ॥

जो किसी दुर्बल का अपमान नहीं करता, सदा सावधान रहकर शत्रुके साथ बुद्धिपूर्वक व्यवहार करता है, बलवानों के साथ युद्ध पसन्द नहीं करता तथा समय आने पर पराक्रम दिखाता है, वही धीर है । १११ ॥

प्राप्यापदं न व्यथते कदा चिद् उद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः ।
दुःखं च काले सहते जितात्मा धुरन्धरस्तस्य जिताः सपत्नाः ॥ ११२ ॥

जो धुर्धर महापुरुष आपत्ति पड़ने पर कभी दुःखी नहीं होता, बल्कि सावधानी के साथ उद्योग का आश्रय लेता है तथा समय पर दुःख सहता है, उसके शत्रु तो पराजित ही हैं।। ११२ ।।

अनर्थकं विप्र वासं गृहेभ्यः पापैः सन्धिं परदाराभिमर्शम् ।
दम्भं स्तैन्यं पैशुनं मद्य पानं न सेवते यः स सुखी सदैव ॥ ११३ ॥

जो निरर्थक विदेशवास, पापियों से मेल, परख्त्रीगमन, पाखण्ड, चोरी, चुगलखोरी तथा मदिरापान नहीं करता, वह सदा सुखी रहता है।। ११३ ॥

न संरम्भेणारभतेऽर्थवर्गम् आकारितः शंसति तथ्यमेव ।
न मात्रार्थे रोचयते विवादं नापूजितः कुप्यति चाप्यमूढः ॥ ११५ ॥

न योऽभ्यसूयत्यनुकम्पते च न दुर्बलः प्रातिभाव्यं करोति ।
नात्याह किं चित्क्षमते विवादं सर्वत्र तादृग्लभते प्रशंसाम् ॥ ११५ ॥

जो क्रोध या उतावली के साथ धर्म, अर्थ तथा कामका आरम्भ नहीं करता, पूछने पर यथार्थ बात ही बतलाता है, मित्र के लिये झगड़ा नहीं पसन्द करता, आदर न पानेपर क्रुद्ध नहीं होता, बिवेक नहीं खो बैठता, दूसरों के दोष नहीं देखता, सब पर दया करता है, दुर्बल होते हुए किसी की जमानत नहीं देता, बढ़कर नहीं बोलता तथा विवाद को सह लेता है, ऐसा मनुष्य सब जगह प्रशंसा पाता ॥ ११४-११५॥

यो नोद्धतं कुरुते जातु वेषं न पौरुषेणापि विकत्थतेऽन्यान् ।
न मूर्च्छितः कटुकान्याह किं चित् प्रियं सदा तं कुरुते जनोऽपि ॥ ११६ ॥

जो कभी उद्दण्ड का-सा वेष नहीं बनाता, दूसरों के सामने अपने पराक्रम की भी डींग नहीं हाँकता, क्रोधसे व्याकुल होनेपर भी कटुवचन नहीं बोलता, उस मनुष्य को लोग सदा ही प्यारा बना लेते हैं ११६ ॥

न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं न दर्ममारोहति नास्तमेति ।
न दुर्गतोऽस्मीति करोति मन्युं तमार्य शीलं परमाहुरग्र्यम् ॥ ११७ ॥

जो शान्त हुई वैर की आग को फिर प्रज्वलित नहीं करता, गर्व नहीं करता, हीनता नहीं दिखाता तथा मैं विपत्ति में पड़ा हूँ,’ ऐसा सोचकर अनुचित काम नहीं करता, उस उत्तम आचरण वाले पुरुषको आर्यजन सर्वश्रेष्ठ कहते है ॥ ११७ ॥

न स्वे सुखे वै कुरुते प्रहर्षं नान्यस्य दुःखे भवति प्रतीतः ।
दत्त्वा न पश्चात्कुरुतेऽनुतापं न कत्थते सत्पुरुषार्य शीलः ॥ ११८ ॥

जो अपने सुखमें प्रसन्न नहीं होता, दूसरे के दुःख के समय हर्ष नहीं मानता और दान देवर पश्चात्ताप नहीं करता; वह सजन में सदाचारी कहलाता है ॥ ११८ ॥

देशाचारान्समयाञ्जातिधर्मान् बुभूषते यस्तु परावरज्ञः ।
स तत्र तत्राधिगतः सदैव महाजनस्याधिपत्यं करोति ॥ ११९ ॥

जो मनुष्य देश के व्यवहार, लोकाचार तथा जातियोंके धर्मो को जानने की इच्छा करता है, उसे उत्तम-अधम का विवेक हो जाता है । वह जहाँ कहीं भी जाता है; सदा महान् जनसमूह पर अपनी प्रभुता स्थापित कर लिता है ॥ ११९ ॥

दम्भं मोहं मत्सरं पापकृत्यं राजद्विष्टं पैशुनं पूगवैरम् ।
मत्तोन्मत्तैर्दुर्जनैश्चापि वादं यः प्रज्ञावान्वर्जयेत्स प्रधानः ॥ १२० ॥

जो बुद्धिमान् दम्भ, मोह, मात्सर्य, पापकर्म, राजद्रोह, चुगलखोरी, समूह से वैर और मतवाले, पागल तथा दुर्जनों से विवाद छोड़ देता है, वह श्रेष्ठ है ।। १२० ॥।

दमं शौचं दैवतं मङ्गलानि प्रायश्चित्तं विविधाँल्लोकवादान् ।
एतानि यः कुरुते नैत्यकानि तस्योत्थानं देवता राधयन्ति ॥ १२१ ॥

जो दान होम, देवपूजन, माङ्गलिक कर्म, प्रायक्चित्त तथा अनेक प्रकार के लौकिक आचार – इन नित्य किये जाने योग्य कर्म को करता है, देवता लोग उसके अभ्युदय की सिद्धि करते हैं । १२१ ।।

समैर्विवाहं कुरुते न हीनैः समैः सख्यं व्यवहारं कथाश्च ।
गुणैर्विशिष्टांश्च पुरो दधाति विपश्चितस्तस्य नयाः सुनीताः ॥ १२२ ॥

जो अपने बराबर वालों के साथ विवाह, मित्रता, व्यवहार तथा बावचीत करता है, हीन पुरुषों के साथ नहीं, और गुणों में बढ़े-चढ़े पुरुषों को सदा आगे रखता है, उस विद्वान की नीति श्रेष्ठ है । १२२ ॥

मितं भुङ्क्ते संविभज्याश्रितेभ्यो मितं स्वपित्यमितं कर्मकृत्वा ।
ददात्यमित्रेष्वपि याचितः सं- स्तमात्मवन्तं प्रजहात्यनर्थाः ॥ १२३ ॥

जो अपने आश्रितजनों को बाँटकर थोड़ा ही भोजन करता है, बहुत अधिक काम करके भी थोड़ा सोता है तथा माँगने पर जो मित्र नहीं है, उसे भी धन देता है, उस मनस्वी पुरुष को सारे अनर्थ दूर से ही छोड़ देते हैं ॥ १२३ ॥

चिकीर्षितं विप्रकृतं च यस्य नान्ये जनाः कर्म जानन्ति किं चित् ।
मन्त्रे गुप्ते सम्यगनुष्ठिते च स्वल्पो नास्य व्यथते कश्चिदर्थः ॥ १२४ ॥

जिसके अपनी इच्छा के अनुकूल और दूसरों की इच्छा के विरुद्ध कार्यको दूसरे लोग कुछ भी नहीं जान पाते, मन्त्र गुप्त रहने और अभीष्ट कार्य का ठीक-ठीक सम्पादन होने के कारण उसका थोड़ा भी काम बिगड़ने नहीं मन्त्रे गुप्ते पाता ॥ १२४ ॥

यः सर्वभूतप्रशमे निविष्टः सत्यो मृदुर्दानकृच्छुद्ध भावः ।
अतीव सञ्ज्ञायते ज्ञातिमध्ये महामणिर्जात्य इव प्रसन्नः ॥ १२५ ॥

जो मनुष्य सम्पूर्ण भूतों को शान्ति प्रदान करने में तत्पर, सत्यवादी, कोमल, दूसरों को आदर देने वाला तथा पवित्र विचार वाला होता है, वह अच्छी: खान से निकले और चमकते हुए श्रेष्ठ रल्न की भाँति अपनी जाति वालो में अधिक प्रसिद्धि पाता है।। १२५।॥।

य आत्मनापत्रपते भृशं नरः स सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत ।
अनन्त तेजाः सुमनाः समाहितः स्वतेजसा सूर्य इवावभासते ॥ १२६ ॥

जो स्वयं ही अधिक लज्जाशील है, वह सब लोगों में श्रेष्ठ समझा जाता वह अपने अनन्त तेज, शुद्ध हृदय एवं एकाग्रता से युक्त होनेके कारण कान्ति में सूर्य के समान शोभा पाता हैं॥ १२६ ॥

वने जाताः शापदग्धस्य राज्ञः पाण्डोः पुत्राः पञ्च पञ्चेन्द्र कल्पाः ।
त्वयैव बाला वर्धिताः शिक्षिताश्च तवादेशं पालयन्त्याम्बिकेय ॥ १२७ ॥

अम्बिकानन्दन ! शाप से दग्ध राजा पाण्डुके जो पाँच पुत्र वन में उत्पन्न हुए; वे पांच इन्द्रो के समान शक्तिशाली हैं, उन्हें आपहीने बचपन से पाला और शिक्षा दी है, वे भी सदा आपकी आज्ञा का पालन करते रहते हैं। १२७ ।।

प्रदायैषामुचितं तात राज्यं सुखी पुत्रैः सहितो मोदमानः ।
न देवानां नापि च मानुषाणां भविष्यसि त्वं तर्कणीयो नरेन्द्र ॥ १२८ ॥

तात ! उन्हें उनका न्यायोचित राज्यभाग देकर आप अपने पुत्रो के साथ आनन्द भोगिये। नरेन्द्र ! ऐसा करने पर आप देवता या मनुष्यों की टीका-टिप्पणी के विषय नहीं रह जायेगे ।। १२८ ।।

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरनीतिवाक्ये त्रयस्त्रंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥

धृतराष्ट्र उवाच ।
जाग्रतो दह्यमानस्य यत्कार्यमनुपश्यसि ।
तद्ब्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलः शुचिः ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र बोले- तात ! मैं चिन्ता से जलता हुआ अभी तक जाग रहा हूँ, तुम मेरे करने योग्य जो कार्य समझो, उसे बताओ; क्योंकि हम लोगों में तुम्हीं चर्म और अर्थ के ज्ञान में निपुण हो ॥ १ ॥

त्वं मां यथावद्विदुर प्रशाधि प्रज्ञा पूर्वं सर्वमजातशत्रोः ।
यन्मन्यसे पथ्यमदीनसत्त्व श्रेयः करं ब्रूहि तद्वै कुरूणाम् ॥ २ ॥

उदारचित्त विदुर ! तुम अपनी बुद्धि से विचारकर मुझे ठीक-ठीक उपदेश करो । जो बात युधिष्ठिर के लिये हितकर और कौरवों के लिये कल्याणकारी समझो, वह सब अवश्य बताओ ॥ २ ॥

पापाशङ्गी पापमेव नौपश्यन् पृच्छामि त्वां व्याकुलेनात्मनाहम् ।
कवे तन्मे ब्रूहि सर्वं यथावन् मनीषितं सर्वमजातशत्रोः ॥ ३ ॥

विद्वन् ! मेरे मनमें अनिष्ट की आशङ्का बनी रहती है, इसलिये में सर्वत्र अनिष्ट ही देखता हूँ, अतः व्याकुल हृदयसे में तुमसे पूछ रहा हूँ अजातशत्रु युधिष्ठिर क्या चाहते हैं ? सो सब ठीक-ठीक बताओ ।। ३ ॥

विदुर उवाच ।
शुभं वा यदि वा पापं द्वेष्यं वा यदि वा प्रियम् ।
अपृष्टस्तस्य तद्ब्रूयाद्यस्य नेच्छेत्पराभवम् ॥ ४ ॥

विदुरजी ने कहा-मनुष्यों को चाहिये कि वह जिसकी पराजय नहीं चाहता, उसको बिना पूछे भी कल्याण करने वाली या अनिष्ट करने वाली अच्छी अथवा बुरी- जो भी बात हो, बता दे॥ ४ ॥

तस्माद्वक्ष्यामि ते राजन्भवमिच्छन्कुरून्प्रति ।
वचः श्रेयः करं धर्म्यं ब्रुवतस्तन्निबोध मे ॥ ५ ॥

इसलिये राजन् ! जिससे समस्त कौरवों का हित हो, वही बात आपसे कहुँगा। मैं जो कल्याणकारी एवं धर्मयुक्त वचन कह रहा हूँ, उन्हें आप ध्यान देकर सुनें- ॥ ५॥

मिथ्योपेतानि कर्माणि सिध्येयुर्यानि भारत ।
अनुपाय प्रयुक्तानि मा स्म तेषु मनः कृथाः ॥ ६ ॥

असत् उपायों (जूआ आदि) का प्रयोग करके जो कपटपूर्ण भारत कार्य सिद्ध होते हैं, उनमें आप मन मत लगाइये। ६ ॥।

तथैव योगविहितं न सिध्येत्कर्म यन्नृप ।
उपाययुक्तं मेधावी न तत्र ग्लपयेन्मनः ॥ ७ ॥

इसी प्रकार अच्छे उपायों का उपयोग करके सावधानी के साथ किया गया कोई कर्म यदि सफल न हो तो बुद्धिमान् पुरुष को उसके लिये मनमें ग्लानि नहीं करनी चाहिये।। ७ ॥

अनुबन्धानवेक्षेत सानुबन्धेषु कर्मसु ।
सम्प्रधार्य च कुर्वीत न वेगेन समाचरेत् ॥ ८ ॥

किसी प्रयोजन से किये गये कर्मोंमें पहले प्रयोजन को समझ लेना चाहिये। खूब सोच-विचारकर काम करना चाहिये, जल्दबाजी से किसी काम का आरम्भ नहीं करना चाहिये ॥ ८ ॥।

अनुबन्धं च सम्प्रेक्ष्य विपाकांश्चैव कर्मणाम् ।
उत्थानमात्मनश्चैव धीरः कुर्वीत वा न वा ॥ ९ ॥

धीर मनुष्य को उचित है कि पहले कर्मों के प्रयोजन, परिणाम तथा अपनी उन्नति का विचार करके फिर काम आरम्भ करे या न करे ॥ ९ ॥

यः प्रमाणं न जानाति स्थाने वृद्धौ तथा क्षये ।
कोशे जनपदे दण्डे न स राज्यावतिष्ठते ॥ १० ॥

जो राजा स्थिति, लाभ, हानि, खजाना, देश तथा दण्ड आदि की मात्रा को नहीं जानता, वह राज्य पर स्थित नहीं रह सकता॥ १० ॥

यस्त्वेतानि प्रमाणानि यथोक्तान्यनुपश्यति ।
युक्तो धर्मार्थयोर्ज्ञाने स राज्यमधिगच्छति ॥ ११ ॥

जो इनके प्रमाणों को ठीक-ठीक जानता है तथा धर्म और अर्थके ज्ञान में दत्तचित्त रहता है, वह राज्य को प्राप्त करता है ॥ ११ ॥

न राज्यं प्राप्तमित्येव वर्तितव्यमसाम्प्रतम् ।
श्रियं ह्यविनयो हन्ति जरा रूपमिवोत्तमम् ॥ १२ ॥

अब तो राज्य प्राप्त हो ही गया’- ऐसा समझकर अनुचित बर्ताव नहीं करना चाहिये। उद्दष्डता सम्पत्ति को उसी प्रकार नष्ट कर देती है, जैसे सुन्दर रूप को बुढ़ापा ॥ १२ ॥

भक्ष्योत्तम प्रतिच्छन्नं मत्स्यो बडिशमायसम् ।
रूपाभिपाती ग्रसते नानुबन्धमवेक्षते ॥ १३ ॥

मछली बढ़िया चारे से ढकी हुई लोहे की काँटी को लोभमें पड़कर निगल जाती है, उससे होने वाले परिणाम पर विचार नहीं करती॥ १३ ॥

यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत् ।
हितं च परिणामे यत्तदद्यं भूतिमिच्छता ॥ १४ ॥

अतः अपनी उन्नति चाहने वाले पुरुष को वही वस्तु खानी (या ग्रहण करनी) चाहिये, जो खाने योग्य हो तथा खायी जा सके, खाने (या ग्रहण करने) पर पच सके और पच जाने पर हितकारी हो । १४॥

वनस्पतेरपक्वानि फलानि प्रचिनोति यः ।
स नाप्नोति रसं तेभ्यो बीजं चास्य विनश्यति ॥ १५ ॥

जो पेड़ से कच्चे फलों को तोड़ता है, वह उन फलो से रस तो पाता नहीं; उलटे उस वृक्ष के बीज का नाश होता है।। १५ ॥

यस्तु पक्वमुपादत्ते काले परिणतं फलम् ।
फलाद्रसं स लभते बीजाच्चैव फलं पुनः ॥ १६ ॥

परन्तु जो समय पर पके हुए फल को ग्रहण करता है, वह फलसे रस पाता है और उस बीज से पुनः फल प्राप्त करता है । १६ ।

यथा मधु समादत्ते रक्षन्पुष्पाणि षट्पदः ।
तद्वदर्थान्मनुष्येभ्य आदद्यादविहिंसया ॥ १७ ॥

जैसे भौरा फूलों की रक्षा करता हुआ ही उनके मधु का आस्वादन करता है, उसी प्रकार राजा भी प्रजाजनों को कष्ट दिये बिना ही उनसे धन ले ।। १७ ॥

पुष्पं पुष्पं विचिन्वीत मूलच्छेदं न कारयेत् ।
मालाकार इवारामे न यथाङ्गारकारकः ॥ १८ ॥

जैसे माली बगीचे में एक-एक फूल तोड़ता है, उसकी जड़ नहीं काटता, उसी प्रकार राजा प्रजा की रक्षा-पूर्वक उनसे कर ले । कोयला बनाने वाले की तरह जड़ नहीं काटनी चाहिये॥ १८ ॥

किं नु मे स्यादिदं कृत्वा किं नु मे स्यादकुर्वतः ।
इति कर्माणि सञ्चिन्त्य कुर्याद्वा पुरुषो न वा ॥ १९ ॥

इसे करनेसे मेरा क्या लाभ होगा और न करने से क्या हानि होगी-इस प्रकार कर्मके विषयमें भली-भाँति विचार करके फिर मनुष्य करे या न करे ।। १९ ॥

अनारभ्या भवन्त्यर्थाः के चिन्नित्यं तथागताः ।
कृतः पुरुषकारोऽपि भवेद्येषु निरर्थकः ॥ २० ॥

कुछ ऐसे व्यर्थ कार्य हैं, जो निल्य आप्राप्त होने के कारण आरम्भ करने योग्य नहीं होते, क्योंकि उनके लिये किया हृुआ पुरुषार्थ भी व्यर्थ हो जाता है। २० ।।

प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थकः । न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्ढं पतिमिव स्त्रियः ॥ २१ ॥

जिसकी प्रसन्नता का कोई फल नहीं और क्रोध भी व्यर्थ है, उसको प्रजा स्वामी बनाना नहीं चाहती-जैसे स्त्री नपुंसक को पति नहीं बनाना चाहती ॥ २१ ॥

कांश्चिदर्थान्नरः प्राज्ञो लभु मूलान्महाफलान् ।
क्षिप्रमारभते कर्तुं न विघ्नयति तादृशान् ॥ २२ ॥

जिनका मूल (साधन) छोटा और फल महान् हो, बुद्धिमान् पुरुष उनको शीघ्र ही आरम्म कर देता है, वैसे कामों में वह विघ्न नहीं आने देता।॥ २२ ॥

ऋजु पश्यति यः सर्वं चक्षुषानुपिबन्निव ।
आसीनमपि तूष्णीकमनुरज्यन्ति तं प्रजाः ॥ २३ ॥

जो राजा मानो आँखों से पी जायगा-इस प्रकार प्रेम के साथ कोमल दृष्टि से देखता है, वह चुपचाप बैठा रहे तो भी प्रजा उससे अनुराग रखती है॥ २३ ॥

सुपुष्मितः स्यादफल: फलितः स्याद् दुरारुहः ।
अपक्रः पक्कसंकाशो न तु शीर्येत कहिचित् ॥ २४ ॥

राजा वृक्ष की भाँति अच्छी तरह फूलने ( प्रसन्न रहने) पर भी फल से खाली रहे (अधिक देनेवाला न हों) यदि फल से युक्त (देने वाला) हो तो भी जिस पर चढ़ा न जा सके, ऐसा (पहुँच के बाहर) होकर रहे । कच्चा (कम शक्ति वाला) होनेपर भी पके (शक्ति सम्पन्न) की भाँति अपने को प्रकट करे, ऐसा करने से वह नष्ट नहीं होता । २४ ॥

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम् ।
प्रसादयति लोकं यस्तं लोकोऽनुप्रसीदति ॥ २५ ॥

जो राजा नेत्र, मन, वाणी और कर्म-इन चारोंसे प्रजाको प्रसन्न करता उसी से प्रजा प्रसन्न रहती है । २५ ॥

यस्मात्त्रस्यन्ति भूतानि मृगव्याधान्मृगा इव ।
सागरान्तामपि महीं लब्ध्वा स परिहीयते ॥ २६ ॥

जैसे व्याघ्र से हिरण भयभीत होता है, उसी प्रकार जिससे समस्त प्राणी डरते हैं, वह समुद्रपर्यन्त पृथ्वी का राज्य पाकर भी प्रजाजनों के द्वारा त्याग दिया जाता है २६ ॥

पितृपैतामहं राज्यं प्राप्तवान्स्वेन तेजसा ।
वायुरभ्रमिवासाद्य भ्रंशयत्यनये स्थितः ॥ २७ ॥

अन्याय में स्थित हुआ राजा बाप-दादों का राज्य पाकर भी अपने ही कर्मो से उसे इस तरह भ्रष्ट कर देता है, जैसे हवा बादल को छिन्न-भिन्न कर देती है ॥ २७ ॥

धर्ममाचरतो राज्ञः सद्भिश्चरितमादितः ।
वसुधा वसुसम्पूर्णा वर्धते भूतिवर्धनी ॥ २८ ॥

परम्परा से सज्जन पुरुषों द्वारा किये हुए धर्म का आचरण करनेवाले राजा के राज्य की पृथ्वी धन-धान्य से पूर्ण होकर उन्नति को प्राप्त होती है और उसके ऐश्वर्य को बढ़ाती है॥ २८॥

अथ सन्त्यजतो धर्ममधर्मं चानुतिष्ठतः ।
प्रतिसंवेष्टते भूमिरग्नौ चर्माहितं यथा ॥ २९ ॥

जो राजा धर्म को छोड़ता और अधर्म का अनुष्ठान करता है, उसकी राज्यभूमि आग पर रखे हुए चमड़े की भाँति संकुचित हो जाती है । । २९ ॥

य एव यत्नः क्रियते प्रर राष्ट्रावमर्दने ।
स एव यत्नः कर्तव्यः स्वराष्ट्र परिपालने ॥ ३० ॥

जो यत्न दूसरे राष्ट्रों का नाश करने के लिये किया जाता है, वही अपने राज्य की रक्षाके लिये करना उचित है । ३० ॥

धर्मेण राज्यं विन्देत धर्मेण परिपालयेत् ।
धर्ममूलां श्रियं प्राप्य न जहाति न हीयते ॥ ३१ ॥

धर्म से ही राज्य प्राप्त करे और धर्म से ही उसकी रक्षा करे; क्योंकि धर्ममूलक राज्यलक्ष्मी को पाकर न तो राजा उसे छोड़ता है और न वहीं राजा को छोड़ती है॥ ३१ ॥

अप्युन्मत्तात्प्रलपतो बालाच्च परिसर्पतः ।
सर्वतः सारमादद्यादश्मभ्य इव काञ्चनम् ॥ ३२ ॥

निरर्थक बोलने वाले, पागल तथा बकवाद करनेवाले बच्चे से भी सब ओरसे उसी भाँति तत्वकी बात ग्रहण करनी चाहिये, जैसे पत्थरों में से सोना ले लिया जाता है॥ ३२ ॥

सुव्याहृतानि सुधियां सुकृतानि ततस्ततः ।
सञ्चिन्वन्धीर आसीत शिला हारी शिलं यथा ॥ ३३ ॥

जैसे उष्छवति से जीविका चलाने वाला एक-एक दानों चुगता रहता है, उसी प्रकार धोर पुरुष को सत्कर्मो का संग्रह करते रहना चाहिये ॥ ३३ ॥

गन्धेन गावः पश्यन्ति वेदैः पश्यन्ति ब्राह्मणाः ।
चारैः पश्यन्ति राजानश्चक्षुर्भ्यामितरे जनाः ॥ ३४ ॥

गोएँ गन्धसे, ब्राह्मण लोग वेदों से, राजा जासूसों से और अन्य साधारण लोग आँखों से देखा करते हैं ॥ ३४ ॥

भूयांसं लभते क्लेशं या गौर्भवति दुर्दुहा ।
अथ या सुदुहा राजन्नैव तां विनयन्त्यपि ॥ ३५ ॥

राजन ! जो गाय बड़ी कठिनाई से दुने देती हैं, वह बहुत हेश उठाती हैं; किंतु जो आसानी से दुध देती है, उसे लोग कष्ट नहीं देते।। ३५॥

यदतप्तं प्रणमति न तत्सन्तापयन्त्यपि ।
यच्च स्वयं नतं दारु न तत्संनामयन्त्यपि ॥ ३६ ॥

जो धातु बिना गरम किये मुड़ जाते हैं, उन्हें आगमें नहीं तपाते। जो काठ स्वयं झुका होता है, उसे लोग झुकाने का प्रयल्न नहीं करते।। ३६ ॥।

एतयोपमया धीरः संनमेत बलीयसे ।
इन्द्राय स प्रणमते नमते यो बलीयसे ॥ ३७ ॥

इस दृष्टान्त के अनुसार बुद्धिमान् पुरुष को अधिक बलवान के सामने झुक जाना चाहिये; जो अधिक बलवान के सामने झुकता है, वह मानो इन्द्रदेवता को प्रणाम करता है। ३७ ॥

पर्जन्यनाथाः पशवो राजानो मित्र बान्धवाः ।
पतयो बान्धवाः स्त्रीणां ब्राह्मणा वेद बान्धवाः ॥ ३८ ॥

पशुओं के रक्षक या स्वामी हैं बादल, राजाओं के सहायक हैं मन्त्री, ख्तरियों के बन्धु (रक्षक) हैं पति और ब्राह्मणों के बान्धव हैं वेद ॥ ३८ ॥

सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते ।
मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते ॥ ३९ ॥

सत्य से धर्म की रक्षा होती है, योग से विद्या सुरक्षित होती है, सफाई से रूप की रक्षा होती है और सदाचार से कुल की रक्षा होती है।। ३९ ।।

मानेन रक्ष्यते धान्यमश्वान्रक्ष्यत्यनुक्रमः ।
अभीक्ष्णदर्शनाद्गावः स्त्रियो रक्ष्याः कुचेलतः ॥ ४० ॥

तौलने से नाज की रक्षा होती है, फेरनेसे घोड़े सुरक्षित रहते हैं, बारम्बार देखभाल करने से गौओं की तथा मैले वस्त्र से स्त्रियों की रक्षा होती है ॥ ४० ॥

न कुलं वृत्ति हीनस्य प्रमाणमिति मे मतिः ।
अन्त्येष्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते ॥ ४१ ॥

मेरा ऐसा विचार है कि सदाचार से हीन मनुष्य का केवल ऊँचा कुल मान्य नहीं हो सकता; क्योंकि नीच कुल में उत्पन्न मनुष्यों का भी सदाचार श्रेष्ठ माना जाता है॥ ४१ ॥

य ईर्ष्युः परवित्तेषु रूपे वीर्ये कुलान्वये ।
सुखे सौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिरनन्तकः ॥ ४२ ॥

जो दूसरों के धन, रूप, पराक्रम, कुलीनता, सुख, सौभाग्य और सम्मान पर डाह करता है, उसका यह रोग असाध्य हैं ॥ ४२ ॥

अकार्य करणाद्भीतः कार्याणां च विवर्जनात् ।
अकाले मन्त्रभेदाच्च येन माद्येन्न तत्पिबेत् ॥ ४३ ॥

न करने योग्य काम करने से, करने योग्य काम में प्रमाद करने से तथा कार्य सिद्ध होने के पहले ही मन्त्र प्रकट हो जानेसे डरना चाहिये और जिससे नशा चढ़े, ऐसा पेय नहीं पीना चाहिये ॥ ४३ ॥

विद्यामदो धनमदस्तृतीयोऽभिजनो मदः ।
एते मदावलिप्तानामेत एव सतां दमाः ॥ ४४ ॥

विद्या का मद, धन का मद और तीसरा ऊँचे कुलका मद है। ये घमण्डी पुरुषोंक े लिये तो मद हैं, परंतु सज्जन पुरुषों के लिये दमके साधन हैं । ४४ ॥

असन्तोऽभ्यर्थिताः सद्भिः किं चित्कार्यं कदाचन ।
मन्यन्ते सन्तमात्मानमसन्तमपि विश्रुतम् ॥ ४५ ॥

कभी किसी कार्य में सज्जनों द्वारा प्रार्थित होनेपर दुष्ट लोग अपने को प्रसिद्ध दुष्ट जानते हुए भी सज्जन मानने लगते हैं ॥ ४५॥

गतिरात्मवतां सन्तः सन्त एव सतां गतिः ।
असतां च गतिः सन्तो न त्वसन्तः सतां गतिः ॥ ४६ ॥

मनस्वी पुरुषों को सहारा देने वाले सन्त हैं, सन्तों के भी सहारे सन्त ही हैं; दुष्टों को भी सहारा देने वाले सन्त हैं, पर दुष्टलोग सन्तों को सहारा नहीं । देते ॥ ४६॥

 

जिता सभा वस्त्रवता समाशा गोमता जिता ।
अध्वा जितो यानवता सर्वं शीलवता जितम् ॥ ४७ ॥

अच्छे वस्त्र वाला सभा को जीतता (अपना प्रभाव जमा लेता) है, जिसके पास गौ है, वह मीठे स्वाद की आकाङ्क्षाको जीत लेता है; सबारी से चलने वाला मार्ग को जीत लेता (तय कर लेता) है और शीलवान् पुरुष सब पर विजय पा लेता है।॥ ४७॥

शीलं प्रधानं पुरुषे तद्यस्येह प्रणश्यति ।
न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः ॥ ४८ ॥

पुरुष में शील ही प्रधान है, जिसका बही नष्ट हो जाता है, इस संसार में उसका जीवन, धन और बन्धुओं से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता ।। ४८ ॥

आढ्यानां मांसपरमं मध्यानां गोरसोत्तरम् ।
लवणोत्तरं दरिद्राणां भोजनं भरतर्षभ ॥ ४९ ॥

भरतश्रेष्ठ ! धनोन्मत्त पुरुषों के भोजन में माँस की, मध्यम श्रेणी वालों के भोजन में गोरस की तथा दरिद्रों के भोजन में तेल की प्रधानता होती है।। ४९ ॥

सम्पन्नतरमेवान्नं दरिद्रा भुञ्जते सदा ।
क्षुत्स्वादुतां जनयति सा चाढ्येषु सुदुर्लभा ॥ ५० ॥

दरिद्र पुरुष सदा स्वादिष्ट ही भोजन करते हैं, क्योंकि भूख उनके भोजन में स्वाद उत्पन्न कर देती है और वह ( भूख) धनियों के लिये सर्वथा दुर्लभ है॥ ५० ॥

प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते ।
दरिद्राणां तु राजेन्द्र अपि काष्ठं हि जीर्यते ॥ ५१ ॥

राजन् ! संसार में धनियों को प्रायः भोजन करने की शक्ति नहीं होती, किन्तु दरिद्रों के पेट में काठ भी पच जाते हैं ।। ५१ ।।

अवृत्तिर्भयमन्त्यानां मध्यानां मरणाद्भयम् ।
उत्तमानां तु मर्त्यानामवमानात्परं भयम् ॥ ५२ ॥

अधम पुरुषों को जीविका न होने से भय लगता है, मध्यम श्रेणी के मनुष्योंको मृत्युसे भय होता है, परंतु उत्तम पुरुषों को अपमान से ही महान् भय होता है॥ ५२ ॥

ऐश्वर्यमदपापिष्ठा मदाः पानमदादयः ।
ऐश्वर्यमदमत्तो हि नापतित्वा विबुध्यते ॥ ५३ ॥

यों तो पीने का नशा आदि भी नशा ही है, किंतु ऐश्वर्य का नशा तो बहुत ही बुरा है; क्योंकि ऐश्वर्य के मदसे मतवाला पुरुष श्रष्ट हुए बिना होश में नहीं आता ॥ ५३ ॥

इन्द्रियौरिन्द्रियार्थेषु वर्तमानैरनिग्रहैः ।
तैरयं ताप्यते लोको नक्षत्राणि ग्रहैरिव ॥ ५४ ॥

वशमें न होनेके कारण विषयों में रमनेवाली इन्द्रियों से यह संसार डसी भाँति कष्ट पाता है, जैसे सूर्य आदि ग्रहों से नक्षत्र तिरस्कृत हो जाते हैं।। ५४॥

यो जितः पञ्चवर्गेण सहजेनात्म कर्शिना ।
आपदस्तस्य वर्धन्ते शुक्लपक्ष इवोडुराड् ॥ ५५ ॥

जो मनुष्य जीवों को वशमें करने वाली सहज पाँच इन्द्रियोंसे जीत लिया गया, उसकी आपत्तियाँ शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की भाँति बढ़ती हैं ॥ ५५ ॥

अविजित्य य आत्मानममात्यान्विजिगीषते ।
अमित्रान्वाजितामात्यः सोऽवशः परिहीयते ॥ ५६ ॥

इन्द्रियों सहित मनको जीते बिना ही जो मन्त्रियों को जीतने की इच्छा करता है या मन्त्रियों को अपने अधीन किये बिना शत्रुको जीतना चाहता है, उस अजितेन्द्रिय पुरुष को सब लोग त्याग देते हैं ॥ ५६ ॥

आत्मानमेव प्रथमं देशरूपेण यो जयेत् ।
ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते ॥ ५७ ॥

जो पहले इन्द्रियों सहित मन को ही शत्रु समझकर जीत लेता है, उसके बाद यदि वह मन्त्रियों तथा शत्रुओं को जीतने की इच्छा करे तो उसे सफलता मिलती है ॥ ५७॥

वश्येन्द्रियं जितामात्यं धृतदण्डं विकारिषु ।
परीक्ष्य कारिणं धीरमत्यन्तं श्रीर्निषेवते ॥ ५८ ॥

इन्द्रियों तथा मनको जीतने वाले, अपराधियों को दण्ड देने वाले और जाँच-परखकर काम करने वाले धीर पुरुषकी लक्ष्मी अत्यन्त सेवा करती हैं ।। ५८ ॥

रथः शरीरं पुरुषस्य राजन् नात्मा नियन्तेन्द्रियाण्यस्य चाश्वाः ।

तैरप्रमत्तः कुशलः सदश्वैर् दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ॥ ५९ ॥

राजन् ! मनुष्य का शरीर रथ है, बुद्धि सारथि है और इन्द्रियाँ इसके घोड़े हैं। इनको वश में करके सावधान रहनेवाला चतुर एवं धीर पुरुष काबू में किये हुए घोड़ोंसे रथी की भाँति सुखपूर्वक यात्रा करता है।। ५९ ।।

एतान्यनिगृहीतानि व्यापादयितुमप्यलम् ।
अविधेया इवादान्ता हयाः पथि कुसारथिम् ॥ ६० ॥

शिक्षा न पाये हुए तथा काबूमें न आने वाले घोड़े जैसे मूर्ख सारथि को मार्ग में मार गिराते हैं, वैसे ही ये इन्द्रियाँ वश में न रहने पर पुरुष को मार डालने में भी समर्थ होती हैं। ६० ॥।

अनर्थमर्थतः पश्यन्नर्तं चैवाप्यनर्थतः ।
इन्द्रियैः प्रसृतो बालः सुदुःखं मन्यते सुखम् ॥ ६१ ॥

इन्द्रियाँ बश में न होने के कारण अर्थ को अनर्थ और अनर्थ को अर्थ समझकर अज्ञानी पुरुष बहुत बड़े दुःख को भी सुख मान बैठता है॥ ६१ ॥

धर्मार्थौ यः परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशानुगः ।
श्रीप्राणधनदारेभ्य क्षिप्रं स परिहीयते ॥ ६२ ॥

जो धर्म और अर्थ का परित्याग करके इन्द्रियों के वश में हो जाता शीघ्र ही ऐश्वर्य, प्राण, धन तथा स्त्री से ही हाथ धो बैठता है ६२ ।॥

अर्थानामीश्वरो यः स्यादिन्द्रियाणामनीश्वरः ।
इन्द्रियाणामनैश्वर्यादैश्वर्याद्भ्रश्यते हि सः ॥ ६३ ॥

जो अधिक धन का स्वामी होकर भी इन्द्रियों पर अधिकार नहीं रखता, वह इन्द्रियों को वश में न रखने के कारण ही ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है । ६३ ॥

आत्मनात्मानमन्विच्छेन्मनो बुद्धीन्द्रियैर्यतैः ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ६४ ॥

मन, बुद्धि और इन्द्रियों को अपने अधीन कर अपने से ही अपने आत्मा को जानने की इच्छा करे; क्योंकि आत्मा ही अपना बन्धु और आत्मा ही अपना शत्रु है।। ६४ ।

बन्धुरात्माऽऽत्पनस्तस्य येनैवात्माऽऽत्मना जितः ।
स एव नियतो बन्धुः स एव नियतो रिपु: ॥ ६५ ॥

जिसने स्वयं अपने आत्मा को जीत लिया है, उसका आत्मा ही उसका बन्धु है। वही सच्चा बन्धु और वहीं नियत शत्रु है।॥ ६५॥

क्षुद्राक्षेणेव जालेन झषावपिहितावुभौ ।
कामश्च राजन्क्रोधश्च तौ प्राज्ञानं विलुम्पतः ॥ ६६ ॥

राजन् ! जिस प्रकार सूक्ष्म छेद वाले जालमें फँसी हुई दो बड़ी-बड़ी मछलियाँ मिलकर जाल को काट डालती हैं, उसी प्रकार ये काम और क्रोध-दोनों विशिष्ट ज्ञान को लुप्त कर देते है । ६६ ॥

समवेक्ष्येह धर्मार्थौ सम्भारान्योऽधिगच्छति ।
स वै सम्भृत सम्भारः सततं सुखमेधते ॥ ६७ ॥

जो इस जगत में धर्म तथा अर्थ का विचार करके विजय साधन- सामग्री का संग्रह करता है, वही उस सामग्री से युक्त होने के कारण सदा सुखपूर्वक समृद्धिशाली होता रहता है । ६७ ।॥

यः पञ्चाभ्यन्तराञ्शत्रूनविजित्य मतिक्षयान् ।
जिगीषति रिपूनन्यान्रिपवोऽभिभवन्ति तम् ॥ ६८ ॥

जो चित्त के विकारभूत पाँच इन्द्रिय रूपी भीतरी शत्रुओं को जीते बिना ही। दूसरे शत्रुओं को जीतना चाहता है, उसे शत्रु पराजित कर देते हैं ६८ ।

दृश्यन्ते हि दुरात्मानो वध्यमानाः स्वकर्म भिः ।
इन्द्रियाणामनीशत्वाद्राजानो राज्यविभ्रमैः ॥ ६९ ॥

इन्द्रियों पर अधिकार न होने के कारण बड़े-बड़े साधु भी अपने कर्मो से तथा राजा लोग राज्य के भोग विलासों से बँधे रहते हैं।। ६९ ॥

असन्त्यागात्पापकृतामपापांस् तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात् ।
शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावात् तस्मात्पापैः सह सन्धिं न कुर्यात् ॥ ७० ॥

पापाचारी दुष्टों का त्याग न करके उनके साथ मिले रहने से निरपराध सज्जनों को भी उनके समान ही दण्ड प्राप्त होता है, जैसे सूखी लकड़ी में मिल जाने से गीली भी जल जाती है; इसलिये दुष्ट पुरुषों के साथ कभी मेल न करे ॥ ७० ॥

निजानुत्पततः शत्रून्पञ्च पञ्च प्रयोजनान् ।
यो मोहान्न निघृह्णाति तमापद्ग्रसते नरम् ॥ ७१ ॥

जो पाँच विषयों की ओर दौड़ने वाले अपने पाँच इन्द्रिय रूपी शत्रुओं को मोह के कारण वश में नहीं करता, उस मनुष्य को विपत्ति ग्रस लेती है॥ ७१ ॥

अनसूयार्जवं शौचं सन्तोषः प्रियवादिता ।
दमः सत्यमनायासो न भवन्ति दुरात्मनाम् ॥ ७२ ॥

गुणों में दोष न देखना, सरलता, पवित्रता, सन्तोष, प्रिय वचन बोलना, इन्द्रियदमन, सत्यभाषण तथा अच्चलता-ये गुण दुरात्मा पुरुषों में नहीं होते ॥ ७२ ॥

आत्मज्ञानमनायासस्तितिक्षा धर्मनित्यता ।
वाक्चैव गुप्ता दानं च नैतान्यन्त्येषु भारत ॥ ७३ ॥

भारत ! आत्मज्ञान, अक्रोध, सहनशीलता, धर्मपरायणता, वचनकी रक्षा तथा दान-ये गुण अधम पुरुषो में नहीं होते॥ ७३ ॥

आक्रोश परिवादाभ्यां विहिंसन्त्यबुधा बुधान् ।
वक्ता पापमुपादत्ते क्षममाणो विमुच्यते ॥ ७४ ॥

मूर्ख मनुष्य विद्वानों को गाली और निन्दा से कष्ट पहुँचाते हैं। गाली देने वाला पाप का भागी होता है और क्षमा करने वाला पाप से मुक्त हो जाता है। ७४ ।।

हिंसा बलमसाधूनां राज्ञां दण्डविधिर्बलम् ।
शुश्रूषा तु बलं स्त्रीणां क्षमागुणवतां बलम् ॥ ७५ ॥

दुष्ट पुरुषों का बल है हिंसा, राजाओं का बल है दण्ड देना, स्त्रियों का बल है सेवा और गुणवानों का बल है क्षमा ॥ ७५ ॥

वाक्संयमो हि नृपते सुदुष्करतमो मतः ।
अर्थवच्च विचित्रं च न शक्यं बहुभाषितुम् ॥ ७६ ॥

राजन् ! वाणीका पूर्ण संयम तो बहुत कठिन माना ही गया है, परंतु विशेष अर्थयुक्त और चमत्कारपूर्ण वाणी भी अधिक नहीं बोली जा सकती ॥ ७६ ॥

अभ्यावहति कल्याणं विविधा वाक्सुभाषिता ।
सैव दुर्भाषिता राजन्ननर्थायोपपद्यते ॥ ७७ ॥

राजन् ! मधुर शब्दों में कही हुई खात अनेक प्रकार से कल्याण करती है; किंतु वही यदि कटु शब्दों में कही जाय तो महान् अनर्थ का कारण बन जाती है ।॥ ७७॥

संरोहति शरैर्विद्धं वनं परशुना हतम् ।
वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम् ॥ ७८ ॥

बाणों से बींधा हुआ तथा फरसे से काटा हुआ वन भी पनप जाता है, किंतु कटु वचन कहकर वाणी से किया हुआ भयानक घाव नहीं भरता॥ ७८ ॥

कर्णिनालीकनाराचा निर्हरन्ति शरीरतः ।
वाक्षल्यस्तु न निर्हर्तुं शक्यो हृदि शयो हि सः ॥ ७९ ॥

कर्णि, नालीक और नाराच नामक बाणों को शरीर से निकाल सकते हैं. परंतु कटु वचनरूपी काँटा नहीं निकाला जा सकता; क्योंकि वह हृदय के भीतर धँस जाता है ॥ ७९ ॥

वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहतः शोचति रत्र्यहानि ।
परस्य नामर्मसु ते पतन्ति तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु ॥ ८० ॥

वचनरूपी बाण मुख से निकलकर दूसरों के मर्म पर ही चोट करते हैं, उनसे आहत मनुष्य रात-दिन घुलता रहता है अतः विद्वान् पुरुष दूसरो पर उनका प्रयोग न करे । ८० ॥

यस्मै देवाः प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम् ।
बुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽपाचीनानि पश्यति ॥ ८१ ॥

देवतालोग जिसे पराजय देते हैं, उसकी बुद्धि को पहले ही हर लेते हैं; इससे वह नीच कमों पर ही अधिक दृष्टि रखता है ॥ ८१ ॥

बुद्धौ कलुष भूतायां विनाशे प्रत्युपस्थिते ।
अनयो नयसङ्काशो हृदयान्नापसर्पति ॥ ८२ ॥

विनाशकाल उपस्थित होने पर बुद्धि मलिन हो जाती है; फिर तो न्याय के समान प्रतीत होने वाला अन्याय हृदय से बाहर नहीं निकलता ।। ८२ ॥

सेयं बुद्धिः परीता ते पुत्राणां तव भारत ।
पाण्डवानां विरोधेन न चैनाम् अवबुध्यसे ॥ ८३ ॥

भरतश्रेष्ठ ! आपके पुत्रो की वह बुद्धि पाण्डवों के प्रति विरोध से व्याप्त हो गयी है; आप इन्हें पहचान नहीं रहे हैं ॥ ८३ ॥

राजा लक्षणसम्पन्नस्त्रैलोक्यस्यापि यो भवेत् ।
शिष्यस्ते शासिता सोऽस्तु धृतराष्ट्र युधिष्ठिरः ॥ ८४ ॥

महाराज धृतराष्ट्र ! जो राजलछणों से सम्पन्न होनेके कारण त्रिभुवन का भी राजा हो संकता है, वह आपका आज्ञाकारी युधिष्ठिर ही इस पृथ्वी का शासक होने योग्य है ॥ ८४ ॥

अतीव सर्वान्पुत्रांस्ते भागधेय पुरस्कृतः ।
तेजसा प्रज्ञया चैव युक्तो धर्मार्थतत्त्ववित् ॥ ८५ ॥

बह धर्म तथा अर्थ के तत्त्व को जानने वाला, तेज और बुद्धि से युक्त, पूर्ण सौभाग्यशाली तथा आपके सभी पुत्रो से बढ़-चढ़कर है॥ ८५॥ 

आनृशंस्यादनुक्रोशाद्योऽसौ धर्मभृतां वरः ।
गौरवात्तव राजेन्द्र बहून्क्लेशांस्तितिक्षति ॥ ८६ ॥

राजेन्द्र । धर्मधारियों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर दया, सौम्यभाव तथा आपके प्रति गौरव बुद्धि के, कारण बहुत कष्ट सह रहा है॥ ८६॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरनीतिवाक्ये चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४

धृतराष्ट्र उवाच ।
ब्रूहि भूयो महाबुद्धे धर्मार्थसहितं वचः ।
शृण्वतो नास्ति मे तृप्तिर्विचित्राणीह भाषसे ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र ने कहा- महाबुद्धे । तुम पुनः धर्म और अर्थ से युक्त बातें कहो, इन्हें सुनकर मुझे तृप्ति नहों होतो । इस बिषय में तुम अनद्भुत भाषण कर रहे हो ॥ १ ॥

विदुर उवाच ।
सर्वतीर्थेषु वा स्नानं सर्वभूतेषु चार्जवम् ।
उभे एते समे स्यातामार्जवं वा विशिष्यते ॥ २ ॥

विदुर जी बोले- कोमलता का बर्ताव— ये दोनों एक समान हैं, अथवा कोमलला के बर्ताव का सब तीर्थो में स्नान और सब प्राणियों के साथ विशेष महत्व है ॥ २ ॥

आर्जवं प्रतिपद्यस्व पुत्रेषु सततं विभो ।
इह कीर्तिं परां प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्स्यसि ॥ ३ ॥

बिभो ! आप अपने पुत्र कौरव-पाण्डव दोनों के साथ समान रूप से कोमलता का बर्ताव कीजिये। ऐसा करने से इस लोक में महान् सुयश प्राप्त करके मरने के पश्चात् आप स्वर्ग लोक में जायँगे ॥ ३ ॥

यावत्कीर्तिर्मनुष्यस्य पुण्या लोकेषु गीयते ।
तावत्स पुरुषव्याघ्र स्वर्गलोके महीयते ॥ ४ ॥

पुरुषश्रेष्ठ ! इस लोक में जबतके मनुष्य की पावन कीर्ति का गान किया। जाता है, तबतक वह स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है।।४ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
विरोचनस्य संवादं केशिन्यर्थे सुधन्वना ॥ ५ ॥

इस विषय में उस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं, जिसमें केशिनी के लिये सुधन्वा के साथ विरोचन के विवादका वर्णन है ॥ ५ ॥

स्वयंवरे स्थिता कन्या केशिनी नाम नामतः ।
रूपेणाप्रतिमा राजन् विशिष्टपतिकाम्यया ॥ ६ ॥

राजन् ! एक समयकी बात है, केशिनी नामवाली एक अनुपम सुन्दरी कन्या सर्वश्रेष्ठ पतिको वरण करनेकी इच्छासे स्वयंवर-सभामें उपस्थित हुई ॥ ६ ॥

विरोचनोsथ दैतेयस्तदा तत्राजगाम ह ।
प्राप्तुमिच्छंस्ततस्तत्र दैत्ये्ं प्राह केशिनी ॥ ७ ॥

उसी समय दैल्यकुमार विरोचन उसे प्राप्त करने की इच्छा से वहाँ आया । तब केशिनीने वहाँ दैत्यराज से इस प्रकार बातचीत की ॥ ७ ॥

केशिन्युवाच ।
किं ब्राह्मणाः स्विच्छ्रेयांसो दितिजाः स्विद्विरोचन ।
अथ केन स्म पर्यङ्कं सुधन्वा नाधिरोहति ॥ ८ ॥

केशिनी बोली-विरोचन ! ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं या दैत्य ? यदि ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं तो सुधन्वा ब्राह्मण ही मेरी शय्यापर क्यों न बैठे ? अर्थात् में सुधन्वा से विवाह क्यों न करूँ? ॥ ८ ॥।

विरोचन उवाच ।
प्राजापत्या हि वै श्रेष्ठा वयं केशिनि सत्तमाः ।
अस्माकं खल्विमे लोकाः के देवाः के द्विजातयः ॥ ९ ॥

विरोचनने कहा-केशिनी ! हम प्रजापतिकी श्रेष्ठ संतानें हैं, अतः सबसे उत्तम हैं। यह सारा संसार हम लोगों का ही है। हमारे सामने देवता क्या हैं ? और ब्राह्मण कौन चीज हैं ? | ९ ॥

केशिन्युवाच ।
इहैवास्स्व प्रतीक्षाव उपस्थाने विरोचन ।
सुधन्वा प्रातरागन्ता पश्येयं वां समागतौ ॥ १० ॥

केशिनी बोली-विरोचन ! इसी जगह हम दोनों प्रतीक्षा करें, कल प्रातःकाल सुधन्वा यहाँ आवेगा फिर में तुम दोनों को एकत्र उपस्थित देखगी॥ १० ॥

विरोचन उवाच ।
तथा भद्रे करिष्यामि यथा त्वं भीरु भाषसे ।
सुधन्वानं च मां चैव प्रातर्द्रष्टासि सङ्गतौ ॥ ११ ॥

विरोचन बोला कल्याणि ! तुम जैसा कहती हो, वही करूंगा प्रातःकाल तुम मुझे और सुधन्त्रा को एक साथ उपस्थित देखोगी॥ ११ ॥

विदुर उवाच अतीतायांच शर्वर्यामुदिते सूर्यमण्डले ।
अथाजगाम ते देशं सुधन्वा राजसत्तम ।
विरोचनो यत्र विभो केशिन्या सहितः स्थितः ॥ १२ ॥

विटुरजी कहते हैं-राजाओं में श्रेष्ठ धृतराष्ट्र ! इसके बाद जब रात बीती और सूर्यमण्डल का उदय हुआ, उस समय सुधन्वा उस स्थानपर आया, जहाँ विरोचन केशिनी के साथ उपस्थित था ।। १२ ।।

सुधन्वा च समागच्छत् प्रहलादि केशिनीं तथा।
समागतं द्विजं दृष्ट्वा केशिनी भरतर्वभ ।
प्रत्युत्थायासनं तस्मै पाद्यमव्य ददौ पुनः ॥ १३ ॥

भरतश्रेष्ठ ! सुधन्वा प्रहादकुमार विरोचन और केशिनीके पास आया ।। बराहाण को आया देख केशिनी उठ खड़ी हुई और उसने उसे आसन, पाद्य और अर्ध्य निवेदन किया ॥ १३ ॥

विदुर उवाच ।
अन्वालभे हिरण्मयं प्राह्रादेऽहं तवासनम् ।
एकत्वमुपसम्पन्नो न त्वासेयं त्वया सह ॥ १४ ॥

सुधन्वा बोला- प्रहलादनन्दन ! में तुम्हारे इस सुवर्णमय सुन्दर सिंहासन को केवल छू लेता हूँ, तुम्हारे साथ इसपर बैठ नहीं सकता; क्योंकि ऐसा होने से हम दोनों एक समान हो जायेंगे ॥ १४ ॥

विरोचन उवाच ।
अन्वाहरन्तु फलकं कूर्चं वाप्यथ वा बृसीम् ।
सुधन्वन्न त्वमर्होऽसि मया सह समासनम् ॥ १५ ॥

विरोचनने कहा-सुधन्वन् ! तुम्हारे लिये तो पीढ़ा चटाई या कुश का आसन उचित है; तुम मेरे साथ बराबरके आसन पर बैठने योग्य हो ही नहीं ॥ १५ ॥

सुधन्वोवाच पितापुत्रौ सहासीतां छ्वौ विप्रौ क्षत्रियावपि ।
वृद्धौं वैश्यौ च शूद्रौ च न त्वन्यावितरेतरम् ॥ १६ ॥

सुधन्वाने कहा-पिता और पुत्र एक साथ एक आसन पर बैठ सकते हैं; दो ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वृद्ध, दो वैश्य और दो शुद्र भी एक साथ बैठ सकते हैं, किन्तु दूसरे कोई दो व्यक्ति परस्पर एक साथ नहीं बैठ सकते ॥ १६ ॥

पितापि ते समासीनमुपासीतैव मामधः ।
बालः सुखैधितो गेहे न त्वं किं चन बुध्यसे ॥ १७ ॥

तुम्हारे पिता प्रह्लाद नीचे बैठकर ही मेरी सेवा किया करते हैं । तुम अभी बालक हो, घरमें सुख से पले हो; अतः तुम्हें इन बातों का कुछ भी ज्ञान नहीं है ॥ १७ ॥

विरोचन उवाच ।
हिरण्यं च गवाश्वं च यद्वित्तमसुरेषु नः ।
सुधन्वन्विपणे तेन प्रश्नं पृच्छाव ये विदुः ॥ १८ ॥

विरोचन बोला-सुधन्वन् ! हम असुरों के पास जो कुछ भी सोना, गौ, घोड़ा आदि धन है, उसकी मैं बाजी लगाता हूँ, हम-तुम दोनों चलकर जो इस विषय के जानकार हों, उनसे पूछे कि हम दोनों मे कौन श्रेष्ठ है ? ॥ १८ ॥

सुधन्वोवाच ।
हिरण्यं च गवाश्वं च तवैवास्तु विरोचन ।
प्राणयोस्तु पणं कृत्वा प्रश्नं पृच्छाव ये विदुः ॥ १९ ॥

सुधन्वा बोला-विरोचन ! सुवर्ण, गाय और घोड़ा तुम्हारे ही पास रहें, हम दोनों प्राणों की बाजी लगाकर जो जानकार हों, उनसे पूछे ॥१९ ॥

विरोचन उवाच ।
आवां कुत्र गमिष्यावः प्राणयोर्विपणे कृते ।
न हि देवेष्वहं स्थाता न मनुष्येषु कर्हि चित् ॥ २० ॥

विरोचन ने कहा- अच्छा, प्राणों की बाजी लगाने के पश्चात् हम दोनों कहाँ चलेंगे ? मैं न तो देवताओं के पास जा सकता हूँ और न कभी मनुष्योंसि ही निर्णय करा सकता हूँ।। २० ॥

सुधन्वोवाच ।
पितरं ते गमिष्यावः प्राणयोर्विपणे कृते ।
पुत्रस्यापि स हेतोर्हि प्रह्रादो नानृतं वदेत् ॥ २१ ॥

प्राणों की बाजी लग जाने पर हम दोनों तुम्हारे पिताके पास चलेंगे। [मुझे विश्वास है कि] प्रह्लाद अपने बेटे के लिये भी झूठ नहीं बील सकते हैं ॥ २१ ॥

विदुर उवाच एवं कृतपणौ क्रुद्धौ तत्राभिजग्मतुस्तदा ।
विरोचनसुधन्वानौ प्रहादो यत्र तिष्ठति ॥ २२ ॥

विदुर जी कहते हैं- इस तरह बाजी लगाकर परस्पर क्रुद्ध हो विरोचन और सुधन्वा दोनों उस समय बहाँ गये, जहाँ प्रह्लादजी थे ॥ २२ ॥

प्रह्लाद उवाच ।
इमौ तौ सम्प्रदृश्येते याभ्यां न चरितं सह ।
आशीविषाविव क्रुद्धावेकमार्गमिहागतौ ॥ २३ ॥

प्रहाद ने (मन-ही-मन) कहा- जो कभी भी एक साथ नहीं चले थे, वे ही दोनों ये सुधन्वा और विरोचन आज साँप की तरह क्रुद्ध होकर एक ही राह से आते दिखायी देते है ॥ २३ ॥

किं वै सहैव चरतो न पुरा चरतः सह ।
विरोचनैतत्पृच्छामि किं ते सख्यं सुधन्वना ॥ २४ ॥

[ फिर विरोचन से कहा- ] विरोचन ! मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या सुधन्वा के साथ तुम्हारी मित्रता हो गयी है ? फिर कैसे एक साथ आ रहे हो ? पहले तो तुम दोनों कभी एक साथ नहीं चलते थे ॥ २४ ॥

न मे सुधन्वना सख्यं प्राणयोर्विपणावहे ।
प्रह्राद तत्त्वामृप्च्छामि मा प्रश्नमनृतं वदीः ॥ २५ ॥

विरोचन बोला-पिताजी ! सुधन्वा के साथ मेरी मित्रता नहीं हुई है। हम दोनों प्राणों की बाजी लगाये आ रहे हैं। मैं आपसे यथार्थ बात पूछता हूँ। मेरे प्रश्नको झूठा उत्तर न दीजियेगा ॥ २५ ॥

प्रह्लाद उवाच ।
उदकं मधुपर्कं चाप्यानयन्तु सुधन्वने ।
ब्रह्मन्नभ्यर्चनीयोऽसि श्वेता गौः पीवरी कृता ॥ २६ ॥

प्रहलाद ने कहा- सेवको ! सुधन्वा के लिये जल और मधुपर्क लाओ। [फिर सुधन्वासे कहा—] ब्रह्मन् ! तुम मेरे पूजनीय अतिथि हो, मैंने तुम्हारे लिये सफेद गौ खूब मोटी-ताजी कर रखी है ॥ २६ ॥

सुधन्वोवाच ।
उदकं मधुपर्कं च पथ एवार्पितं मम ।
प्रह्राद त्वं तु नौ प्रश्नं तथ्यं प्रब्रूहि पृच्छतोः ॥ २७ ॥

सुधन्वा बाला-प्रहाद ! जल और मधुपर्क तो मुझे मार्ग में ही मिल गया है। तुम तो जो मैं पूछ रहा हूँ, उस प्रश्रका ठीक-ठीक उत्तर दो-क्या ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं अथवा विरोचन ? ॥ २७ ॥

प्रह्लाद उवाच ।
पुर्तो वान्यो भवान्ब्रह्मन्साक्ष्ये चैव भवेत्स्थितः ।

तयोर्विवदतोः प्रश्नं कथमस्मद्विभो वदेत् ॥ २८ ॥

प्रह्लाद बोले-ब्रह्मन् ! मेरे एक ही पुत्र है और इधर तुम स्वयं उपस्थित हो; भला तुम दोनों के विवाद में मेरे-जैसा मनुष्य कैसे निर्णय दे सकता है ? ॥ २८ ॥

सुधन्वोबाच गां प्रदद्यास्त्वौरसाय यद्वान्यत् स्यात् प्रियं धनम् ।
द्वयोर्विवदतोस्तथ्यं वाच्यं च मतिमंस्त्वया ॥ २९ ॥

सुधन्वा बोला-मतिमन् । तुम्हारे पास गौ तथा दूसरा जो कुछ भी प्रिय धन हो, वह सब अपने औरस पुत्र विरोचनको दे दो; परंतु हम दोनॉ के विवाद में तो तुम्हें ठीक-ठीक उत्तर देना ही चाहिये ॥ २९ ॥

अथ यो नैव प्रब्रूयात्सत्यं वा यदि वानृतम् ।
एतत्सुधन्वन्पृच्छामि दुर्विवक्ता स्म किं वसेत् ॥ ३० ॥

प्रह्वाद ने कहा-सुधन्वन् ! अबे में तुमसे यह बाते पूछता हूँ, जो सत्य न बोले अरथवा असत्य निर्णय करे, ऐसे दुष्ट बक्ता की क्या स्थिति होती है ? | ३० ॥

सुधन्वोवाच ।
यां रात्रिमधिविन्ना स्त्री यां चैवाक्ष पराजितः ।
यां च भाराभितप्ताङ्गो दुर्विवक्ता स्म तां वसेत् ॥ ३१ ॥

सुधन्वा बोला-सौतवाली स्त्री, जूएमें हारे हुए जुआरी और भार ढोने से व्यथित शरीर वाले मनुष्य की रात में जो स्थिति होती है, वही स्थिति उलटा न्याय देने वाले वक्ता की भी होती है ॥ ३१ |॥

नगरे प्रतिरुद्धः सन्बहिर्द्वारे बुभुक्षितः ।
अमित्रान्भूयसः पश्यन्दुर्विवक्ता स्म तां वसेत् ॥ ३२ ॥

जो झूठा निर्णय देता है, वह राजा नगर में कैद होकर बाहरी दरवाजे पर भूख का कष्ट उठाता हुआ बहुत-से शत्रुओं को देखता है ॥ ३२ ।।

पञ्च पश्वनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते ।
शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं पुरुषानृते ॥ ३३ ॥

पशु के लिये झूठ बोलने से पाँच पीढ़ियों को, गौके लिये झूठ बोलने पर दस पीढ़ियों को, घोड़े के लिये असत्य भाषण करने पर सौ पीढ़ियों को और मनुष्य के लिये झूठ बोलन पर एक हज़ार पीढ़ियों को मनुष्य नरक में ढकेलता है।। ३३ ॥

हन्ति जातानजातांश्च हिरण्यार्थोऽनृतं वदन् ।
सर्वं भूम्यनृते हन्ति मा स्म भूम्यनृतं वदीः ॥ ३४ ॥

सोने के लिये झूठ बोलने वाला भूत और भविष्य सभी पीढ़ियों को नरक में गिराता है पृथ्वी तथा स्त्री के लिये झूठ कहनेवाला तो अपना सर्वनाश ही कर लेता है, इसलिये तुम भूमि या स्त्री के लिये कभी झुठ न बोलना ॥ ३४ ॥

प्रह्लाद उवाच ।
मत्तः श्रेयानङ्गिरा वै सुधन्वा त्वद्विरोचन ।
मातास्य श्रेयसी मातुस्तस्मात्त्वं तेन वै जितः ॥ ३५ ॥

प्रह्लाद ने कहा-विरोचन ! सुधन्बा के पिता अङ्गिरा मुझसे श्रेष्ठ हैं, सुधन्वा तुमसे श्रष्ठ है, इसकी माता भी तुम्हारी माता से श्रेष्ठ है, अतः तुम आज सुधन्वास हार गये।। ३५ ।।

विरोचन सुधन्वायं प्राणानामीश्वरस्तव ।
सुधन्वन्पुनरिच्छामि त्वया दत्तं विरोचनम् ॥ ३६ ॥

विरोचन ! अब सुधन्वा दुम्हारे प्राण का मालिक है। सुधन्वन् ! अब यदि तुम दे दो तो में विरोचन को पाना चौहता हैं ! ॥ ३६ ।।

सुधन्वोवाच ।
यद्धर्ममवृणीथास्त्वं न कामादनृतं वदीः ।
पुनर्ददामि ते तस्मात्पुत्रं प्रह्राद दुर्लभम् ॥ ३७ ॥

सुधन्वा बोला-प्रहलाद ! तुमने धर्म को ही स्वीकार किया है, स्वार्थवश झूठ नहीं कहा है; इसलिये अब इस दुर्लभ पुत्र को फिर तुम्हें दे रहा हूँ ॥ ३७ ॥

एष प्रह्राद पुत्रस्ते मया दत्तो विरोचनः ।
पादप्रक्षालनं कुर्यात्कुमार्याः संनिधौ मम ॥ ३८ ॥

प्रह्लाद ! तुम्हारे इस पुत्र विरोचन को मैने पुनः तुम्हें दे दिया; कितु अब यह कुमारी केशिनी के निकट चलकर मेरा पैर धोवे ।। ३८ ॥

विदुर उवाच ।
तस्माद्राजेन्द्र भूम्यर्थे नानृतं वक्तुमर्हसि ।
मा गमः स सुतामात्योऽत्ययं पुत्राननुभ्रमन् ॥ ३९ ॥

विदुर जी कहते हैं- इसलिये राजेन्द्र । आप पृथ्वी के लिये झूठ न बोलें। बेटे के स्वार्थवश सच्ची बात न कहकर पुत्र और मन्त्रियों के साथ विनाश के मुख में न जायेँ ॥ ३९ ॥

न देवा यष्टिमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् ।
यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम् ॥ ४० ॥

देवता लोग चरवाहों की तरह डण्डा लेकर पहरा नहीं देते। बे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसे उत्तम बुद्धि से युक्त कर देते हैं।। ४० ॥

यथा यथा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मनः ।
तथा तथास्य सर्वार्थाः सिध्यन्ते नात्र संशयः ॥ ४१ ॥

मनुष्य जैसे-जैसे कल्याण में मन लगाता है, वैसे-ही-वैसे उसके सारे अभीष्ट सिद्ध होते हैं इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है॥४१ ॥

न छन्दांसि वृजिनात्तारयन्ति आयाविनं मायया वर्तमानम् ।
नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाश् छन्दांस्येनं प्रजहत्यन्तकाले ॥ ४२ ॥

कपटपूर्ण व्यवहार करने वाले मायावी को वेद पापों से मुक्त नहीं करते; किंतु जैसे पंख निकल आने पर चिड़ियों के बच्चे घोंसला छोड़ देते हैं, उसी प्रकार वेद भी अन्त काल में उसे त्याग देते हैं ॥ ४२ ॥

मत्तापानं कलहं पूगवैरं भार्यापत्योरन्तरं ज्ञातिभेदम् ।
राजद्विष्टं स्त्रीपुमांसोर्विवादं वर्ज्यान्याहुर्यश्च पन्थाः प्रदुष्ठः ॥ ४३ ॥

शराब पीना, कलह, समूह के साथ वैर, पति-पत्नी में भेद पैदा करना, कुटुम्ब वालों में भेदबुद्धि उत्पनत्न करना, राजा के साथ द्वेष, स्त्री और पुरुष में विवाद और बुरे रास्ते- ये सब त्याग देने योग्य बताये

सामुद्रिकं वणिजं चोरपूर्वं शलाक धूर्तं च चिकित्सकं च ।
अरिं च मित्रं च कुशीलवं च नैतान्साख्येष्वधिकुर्वीत सप्त ॥ ४४ ॥

हस्तरेखा देखने वाला, चोरी करके व्यापार करने वाला, जुआरी, वैद्य, शत्रु, मित्र, और नर्तक- इन सातों को कभी भी गवाह न बनावे ॥ ४४ ॥

मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुत मानयज्ञः ।
एतानि चत्वार्यभयङ्कराणि भयं प्रयच्छन्त्ययथा कृतानि ॥ ४५ ॥

आदर के साथ अग्निहोत्र, आदरपूर्वक मौन का पालन, आदरपूर्वक स्वाध्या और आदर के साथ यज्ञ का अनुष्ठान—ये चार कम भय को दूर करने वाले हैं, किंतु वे ही यदि ठीवक तरह से सम्पादित न हों तो भय प्रदान- करने वाले होते हैं ।।४५ ।।

अगार दाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रयी ।
पर्व कारश्च सूची च मित्र ध्रुक्पारदारिकः ॥ ४६ ॥

भ्रूणहा गुरु तल्पी च यश्च स्यात्पानपो द्विजः ।
अतितीक्ष्णश्च काकश्च नास्तिको वेद निन्दकः ॥ ४७ ॥

स्रुव प्रग्रहणो व्रात्यः कीनाशश्चार्थवानपि ।
रक्षेत्युक्तश्च यो हिंस्यात्सर्वे ब्रह्मण्हणैः समाः ॥ ४८ ॥

घर में आग लगाने वाला, विष देने वाला, जारज संतान की कमाई खाने वाला सोमरस बेचने वाला, इस्त्र बनाने वाला चुगली करने वाला, मित्रद्रोही, परस्त्री लम्पट, गर्भ कों हत्या करने वाला, गुरु स्त्री गामी, ब्राह्मण होकर शराब पीने वाला, अधिक तीखे स्वभाव वाला, कौए की तरह काँय-कॉय करने वाला नास्तिक, वेद की निन्दा करने वाला, ग्राम पुरोहित, ब्रात्य क्रूर तथा शक्ति रहते हुए रक्षा के लिये प्रार्थना करने पर भी जो हिंसा करता है- ये सब-के सब ब्रह्महत्यारों के समान हैं॥ ४६-४८ ॥

तृणोक्लया ज्ञायते जातरूपं युगे भद्रो व्यवहारेण साधुः ।
शूरो भयेष्वर्थकृच्छ्रेषु धीरः कृच्छ्रास्वापत्सु सुहृदश्चारयश् च ॥ ४९ ॥

जलती हुई आग से सोने की पहचान होती है, सदाचार से सत्पुरुष की, व्यवहार से साधु की, भय आनेपर शुर की, आर्थिक कठिनाई में धीर की और कठिन आपत्ति में शत्रु एवं मित्र की परीक्षा होती है ॥ ४९ |॥

जरा रूपं हरति हि धैर्यमाशा मृत्युः प्राणान्धर्मचर्यामसूया ।
क्रोधः श्रियं शीलमनार्य सेवा ह्रियं कामः सर्वमेवाभिमानः ॥ ५० ॥

बुढापा (सुन्दर) रूप कों, आशा रता को, मृल्यु प्राणो को, दोष देखने कों आदत धर्माचरण को, क्रोध लक्ष्मी को, नीच पुरुषों की सेवा सत्स्वभाव को, काम लज्जा को और अभिमान सर्वस्व को नष्ट् कर देता है ॥ ५० ॥

श्रीर्मङ्गलात्प्रभवति प्रागल्भ्यात्सम्प्रवर्धते ।
दाक्ष्यात्तु कुरुते मूलं संयमात्प्रतितिष्ठति ॥ ५१ ॥

शुभ कर्मो से लक्ष्मी की उत्पत्ति होती। है, प्रगल्मता से वह बढ़ती है, चतुरता से जड़ जमा लेती है और संयम से सुरक्षित रहती है ॥ ५१ ॥

अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च ।
पराक्रमश्चाबहु भाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥ ५२ ॥

आठ गुण पुरुष की शोभा बढ़ाते हैं— बुद्धि, कुलीनता, दम, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, बहुत न बौलना, यथाशक्ति दान देना और कृतज्ञ होना ॥ ५२ ॥

एतान्गुणांस्तात महानुभावान् एको गुणः संश्रयते प्रसह्य ।
राजा यदा सत्कुरुते मनुष्यं सर्वान्गुणानेष गुणोऽतिभाति ॥ ५३ ॥

तात ! एक गुण ऐसा है, जो इन सभी महत्त्वपूर्ण गुणोंपर हठात् अधिकार जमा लता है। जिस समय राजा किसी मनुष्य का सल्कार करती है, उस समय यह एक ही गुण (राज सम्मान) सभी गुणौस बढ़कर शौभा पाता है॥ ५३ ॥

अष्टौ नृपेमानि मनुष्यलोके स्वर्गस्य लोकस्य निदर्शनानि ।
चत्वार्येषामन्ववेतानि सद्भिश् चत्वार्येषामन्ववयन्ति सन्तः ॥ ५४ ॥

राजन् ! मनुष्य लोक मे ये आठ गुण स्वगलोक का दर्शन करानेवाले हैं; इनमे से चार तो संतो के साथ नित्य सम्बद्ध हैं-उनमें सदा विद्यमान रहते हैं। और चार का सज्जन पुरुष अनुसरण करते हैं ॥ ५४ ॥

यज्ञो दानमध्ययनं तपश् च चत्वार्येतान्यन्ववेतानि सद्भिः ।
दमः सत्यमार्जवमानृशंस्यं चत्वार्येतान्यन्ववयन्ति सन्तः ॥ ५५ ॥

यज्ञ, दान, अध्ययन और तप- ये चार सजनों के साथ नित्य सम्बद्ध हैं और इन्द्रियनिग्रह, सत्य, सरलता तथा कोमलता- इन चारों का संत लोग अनुसरण करते हैं ॥ ५५॥

इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा घृणा ।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥ ५६ ॥

यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और अलोभ- ये धर्म के आठ प्रकार के मार्ग बताये गये हैं ।। ५६ ॥

तत्र पूर्वचतुर्वगों दम्भार्थमपि सेव्यते ।
उत्तरश्च चतुर्वर्गं नामहात्मसु तिष्ठति ॥ ५७ ॥

इनमेंसे पहले चारों का तो दम्भके लिये भी सेवन किया जा सकता है, परंतु अन्तिम चार तो जो महत्मा नहीं है, उनमें रह हो नहीं सकते ।। ५७ ॥।

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम् ।
नासौ हर्मो यतन सत्यमस्ति न तत्सत्यं यच्छलेनानुविद्धम् ॥ ५८ ॥

जिस सभाप बड़े-बूंढ़े नहीं, वह सभा नहीं, जो धर्मकी बात न कहें, वे बूढ़े नहीं, जिसमें सत्य नहीं, वह धर्म नहीं और जो कपट से पूर्ण हो, वह लत्य नहीं है ॥ ५८ ॥

सत्यं रूपं श्रुतं विद्या कौल्यं शीलं बलं धनम् ।
शौर्यं च चिरभाष्यं च दशः संसर्गयोनयः ॥ ५९ ॥

सत्य, विनय का भाव, शास्त्रज्ञान, विद्या, कुलीनता, शील, बल, धन, शरता और चमत्कारपूर्ण बात कहना-ये दस स्वर्ग के साधन हैं ॥ ५९ ॥

पापं कुर्वन्पापकीर्तिः पापमेवाश्नुते फलम् ।
पुण्यं कुर्वन्पुण्यकीर्तिः पुण्यमेवाश्नुते फलम् ॥ ६० ॥

पापकोर्ति वाला मनुष्य पापाचरण करता हुआ पाप रूप फल को ही प्राप्त करता है और पुण्यकर्मा मनुष्य पुण्य करता हुआ अत्यन्त पुण्य फल का ही उपभोग करता है ॥ ६० ॥

पापं प्रज्ञां नाशयति क्रियमाणं पुनः पुनः ।
नष्टप्रज्ञः पापमेव नित्यमारभते नरः ॥ ६१ ॥

इसलिये प्रशंसित व्रतका आचरण करने वाले पुरुष को पाप नहीं करना चाहिये, क्योंकि बारम्बार किया हुआ पाप बुद्धि को नष्ट कर देता है ॥ ६१ ॥

पुण्यं प्रज्ञां वर्धयति क्रियमाणं पुनः पुनः ।
वृद्धप्रज्ञः पुण्यमेव नित्यमारभते नरः ॥ ६२ ॥

जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, वह मनुष्य सदा पाप ही करता रहता है। इसी प्रकार बारम्बार किया हुआ पुण्य बुद्धि को बढ़ाता है॥ ६२ ॥

वृद्धप्रज्ञः पुण्यमेव नित्यमारभते नरः ।
पुण्यं कुर्वन् पुण्यकीर्तिः पुण्यं स्थानं स्म गच्छति ।
तस्मात् पुण्यं निषेवेत पुरुष: सुसमाहितः ॥ ६३ ॥

जिसकी बुद्धि बढ़ जाती है, वह मनुष्य सदा पुण्य ही करता है। इस प्रकार पुण्यकर्मा मनुष्य पुण्य करता हुआ पुण्यलोक को ही जाता है। इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वह सदा एकाग्रचित्त होकर पुण्य का ही सेवन करे ।। ६३ ॥

असूयको दन्द शूको निष्ठुरो वैरकृन्नरः ।
स कृच्छ्रं महदाप्नोतो नचिरात्पापमाचरन् ॥ ६४ ॥

गुणो में दोष देखने वाला, मर्म पर आधात करने वाला, नि्देयी, शत्रुता करने वाला और शठ मनुष्य पापका आचरण करता हुआ शीघ्र ही महान् कष्ट को प्राप्त होता है॥ ६४ ॥

अनसूयः कृतप्रज्ञ्टः शोभनान्याचरन्सदा ।
अकृच्छ्रात्सुखमाप्नोति सर्वत्र च विराजते ॥ ६५ ॥

दोषदृष्टि से रहित शुद्ध बुद्धिवाला पुरुष सदा शुभ कर्मों का अनुष्ठान करता हुआ महान् सुख को प्राप्त होता है और सर्वत्र उसका सम्मान होता है ॥ ६५ ॥

प्रज्ञामेवागमयति यः प्राज्ञेभ्यः स पण्डितः ।
प्राज्ञो ह्यवाप्य धर्मार्थौ शक्नोति सुखमेधितुम् ॥ ६६ ॥

जो बुद्धिमान् पुरुषों से सद्बुद्धि प्राप्त करता है, वही पण्डित है क्योंकि बुद्धिमान् पुरुष ही धर्म और अर्थ को प्राप्त कर अनायास ही अपनी उन्नति करने में समर्थ होता है ॥ ६६ ॥

दिवसेनैव तत्कुर्याद्येन रातौ सुखं वसेत् ।
अष्ट मासेन तत्कुर्याद्येन वर्षाः सुखं वसेत् ॥ ६७ ॥

दिनभर में ही वह कार्य कर ले, जिससे रात में सुखसे रह सके और आठ महीनों में वह कार्य कर ले, जिससे वर्षा के चार महीने सुख से व्यतीत कर सके॥ ६७ ॥

पूर्वे वयसि तत्कुर्याद्येन वृद्धसुखं वसेत् ।
यावज्जीवेन तत्कुर्याद्येन प्रेत्य सुखं वसेत् ॥ ६८ ॥

पहली अवस्था में वह काम करे, जिससे वृद्धावस्था में सुखपूर्वक रह सके और जीवन भर वह कार्य करे, जिससे मरने के बाद भी सुख से रह सके ॥ ६८ ।।

जीर्णमन्नं प्रशंसन्ति भार्यं च गतयौवनाम् ।
शूरं विगतसङ्ग्रामं गतपारं तपस्विनम् ॥ ६९ ॥

सज्जन पुरुष पच जाने पर अन्नकी, निष्कलढ़ जवानी बीत जाने पर स्त्री की, संग्राम जीत लेने पर शूर की और तत्त्व ज्ञान प्राप्त हो जानेपर तपस्वी की प्रअशंसा करते हैं ।। ६९ |

धनेनाधर्मलब्धेन यच्छिद्रमपिधीयते ।
असंवृतं तद्भवति ततोऽन्यदवदीर्यते ॥ ७० ॥

अधर्म से प्राप्त हुए धन के द्वारा जो दोष छिपाया जाता है, वह तो छिपता नहीं, उससे भिन्न और नया दोष प्रकट हो जाता है ।। ७० ॥

गुरुरात्मवतां शास्ता शासा राजा दुरात्मनाम् ।
अथ प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः ॥ ७१ ॥

अपने मन और इन्द्रियों को वश में करने वाले शिष्यों के शासक गुरु हैं, दुष्टों के शासक राजा हैं और छिपे-छिपे पाप करने वालों के शासक सूर्यपुत्र यमराज हैं॥ ७१ ॥

ऋषीणां च नदीनां च कुलानां च महामनाम् ।
प्रभवो नाधिगन्तव्यः स्त्रीणां दुश्चरितस्य च ॥ ७२ ॥

ऋषि, नदी, महात्माओं के कुल तथा स्त्रियों के दुश्चरित्र का मूल नहीं जाना जा सकता ॥ ७२ ॥

द्विजातिपूजाभिरतो दाता ज्ञातिषु चार्जवी ।
क्षत्रियः स्वर्गभाग्राजंश्चिरं पालयते महीम् ॥ ७३ ॥

राजन् ! ब्राह्मणों की सेवा-पूजा में संलग्र रहने वाला, दाता, कुटुम्बीजनों के प्रति कोमलता का बर्ताव करने वाला और शीलवान् राजा चिरकाल तक पृथ्वी का पालन करता है॥ ७३ ॥

सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषास्त्रयः ।
शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम् ॥ ७४ ॥

शर, विद्वान् और सेवाधर्म को जानने वाले -ये तीन प्रकार के मनुष्य पृथ्वी से सुवर्णरूपी पुष्प का सञ्चव करते हैं।। ७४ ॥

बुद्धिश्रेष्ठानि कर्माणि बाहुमध्यानि भारत ।
तानि जङ्घा जघन्यानि भारप्रत्यवराणि च ॥ ७५ ॥

भारत ! बुद्धि से विचारकर किये हुए कर्म श्रेष्ठ होते हैं, बाहुबल से कियें जाने वाले कर्म मध्यम श्रेणी के हैं, जड्गा से होने वाले कार्य अधम हैं और भार ढोने का काम महान् अधम है ॥ ७५ ॥

दुर्योधने च शकुनौ मूढे दुःशासने तथा ।
कर्णे चैश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि ॥ ७६ ॥

राजन् !- अब आप दुर्योधन, शकुनि, मूर्ख दुःशासन तथा कर्ण पर राज्य का भार रखकर उन्नति कैसे चाहते हैं ? ॥ ७६॥

सर्वैर्गुणैरुपेताश्च पाण्डवा भरतर्षभ ।
पितृवत्त्वयि वर्तन्ते तेषु वर्तस्व पुत्रवत् ॥ ७७ ॥

भरतश्रेष्ठ ! पांडव तो सभी उत्तम गुणों से संपन्न हैं और आप में पिता का-सा भाव रखकर बताव करते हैं, ऑप भी उनपर पुत्रभाव रखकर उचित व्यवहार कीजिये ॥ ७७॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरहितवाक्ये पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५॥

विदुर उवाच।
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
आत्रेयस्य च संवादं साध्यानां चेति नः श्रुतम् ॥ १ ॥

विदुरजी कहते हैं- इस विषय में दरतात्रेय और साध्य देवताओं के संवाद रूप इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं यह मेरा भी सुना हुआ है॥ १ ॥

चरन्तं हंसरूपेण महर्षिं संशितव्रतम् ।
साध्या देवा महाप्राज्ञं पर्यपृच्छन्त वै पुरा ॥ २ ॥

प्राचीन कालकी बात है, उत्तम वरत वाले महाबुद्धिमान् महर्षि दत्तात्रेय जी साध्या देवा हंस (परमहंस) रूप से विचर रहे थे, उस समय साध्य देवताओं ने उनसे पूछा ॥ २ ॥

साध्या ऊचुः ।
साध्या देवा वय्मस्मो महर्षे दृष्ट्वा भवन्तं न शक्नुमोऽनुमातुम् ।
श्रुतेन धीरो बुद्धिमांस्त्वं मतो नः काव्यां वाचं वक्तुमर्हस्युदाराम् ॥ ३ ॥

महर्षे ! हम सब लोग साध्य देवता हैं, आपकी केवल देखकर हम आपके विषय में कुछ अनुमान नहीं कर सकते। हमें तो आप शास्त्र ज्ञान से बुक्त, धीर एव्ं बुद्धिमान् जान पड़ते हैं, अतः हम लोगों को विद्वत्तापूर्ण अपनी उदार बाणी सुनाने की कृपा करें॥ ३ ॥

हंस उवाच ।
एतत्कार्यममराः संश्रुतं मे धृतिः शमः सत्यधर्मानुवृत्तिः ।
ग्रन्थिं विनीय हृदयस्य सर्वं प्रियाप्रिये चात्मवशं नयीत ॥ ४ ॥

हंस ने कहा-देवताओ। मैंने सुना है कि धैर्य धारण, मनोनिग्रह तथा सत्य-धर्मो का पालन ही कर्तव्य हैं, इसके द्वारा पुरुष को चाहिये कि हृदय की सारी गाँठ खोलकर प्रिय और अप्रिय को अपने आत्मा के समान समझे ॥ ४ ॥

आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षितः ।
आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति ॥ ५ ॥

दूसरों से गाली सुनकर भी स्वयं उन्हें गाली न दे । क्षमा करने वाले का रोका हुआ क्रोध ही गाली देने वाले को जला डालता है और उसके पुण्य को भी ले लेता है ॥ ५॥

नाक्रोशी स्यान्नावमानी परस्य मित्रद्रोही नोत नीचोपसेवी ।
न चातिमानी न च हीनवृत्तो रूक्षां वाचं रुशतीं वर्जयीत ॥ ६ ॥

दूसरे को न तो गाली दे और न उसका अपमान करे, मित्रों से द्रोह तथी नीच पुरुषों की सेवा न करे, सदाचारसे हीन एवं अभिमानी न हो, रूखी तथा रोष भरी वाणी का परिल्याग करे ॥ ६ ॥।

मर्माण्यस्थीनि हृदयं तथासून् घोरा वाचो निर्दहन्तीह पुंसाम् ।
तस्माद्वाचं रुशतीं रूक्षरूपां धर्मारामो नित्यशो वर्जयीत ॥ ७ ॥

इस जगत् में रूखी बातें मनुष्यों के मर्मस्थान, हड़ी, हुदय तथा प्राणीं को दग्ध करती रहती हैं; इसलिये धर्मानुरागी पुरुष जलाने वाली रूखी बातों को सदा के लिये परित्याग कर दे।। ७॥

अरुं तुरं परुषं रूक्षवाचं वाक्कण्टकैर्वितुदन्तं मनुष्यान् ।
विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां मुखे निबद्धां निरृतिं वहन्तम् ॥ ८ ॥

जिसकी वाणी रूखी और स्वभाव कठोर है, जो मर्म पर आघात करता और वाग्बाणों से मनुष्यों को पीड़ा पहुँचाता है, उसे ऐसा समझना चाहिये कि वह मनुष्यों में महादरिद्र है और वह अपने मुख में दरिद्रता अथवा मौत को बाँधे हुए ढो रहा है। ८ ॥

परश्चेदेनमधिविध्येत बाणैर् भृशं सुतीक्ष्णैरनलार्क दीप्तैः ।
विरिच्यमानोऽप्यतिरिच्यमानो विद्यात्कविः सुकृतं मे दधाति ॥ ९ ॥

यदि दूसरा कोई इस मनुष्य को अग्नि और सूर्यक समान दग्ध करने वाले तीखे याग्याणों से बहुत चोट पहुँचावे तो वह विद्वान् पुरुष चौट खाकर अल्यन्त वेदना सहते हुए भी ऐसा समझे कि वह मेरे पुण्यो को पुष्ट कर रहा है ॥ १ ॥

यदि सन्तं सेवते यद्यसन्तं तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव ।
वासो यथा रङ्ग वशं प्रयाति तथा स तेषां वशमभ्युपैति ॥ १० ॥

जैसे वस्त्र जिस रंग में रंगा जाय वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार यदि कोई सज्जन, असजन, तपस्वी अथवा चोर की सेवा करता है तो वह उन्हीं के वश में हो जाता है, उस पर उन्ही का रंग चढ़ जाता है।। १०।।

वादं तु यो न प्रवदेन्न वादयेद् यो नाहतः प्रतिहन्यान्न घातयेत् ।
यो हन्तुकामस्य न पापमिच्छेत् तस्मै देवाः स्पृहयन्त्यागताय ॥ ११ ॥

जो स्वयं किसी के प्रति बुरी बात नहीं कहता, दूसरों से भी नहीं कहलाता, विना मार खाये स्वयं न तो किसी को मारता है और न दूसरों से ही मरवाता हैं, मार खाकर भी अपराधी को जा मारना नहीं चाहता, देवता भी उसके आगमन की बाट जोहते रहते हैं ॥ ११ ॥

अव्याहृतं व्याहृताच्छ्रेय आहुः सत्यं वदेद्व्याहृतं तद्द्वितीयम् ।
प्रियंवदेद्व्याहृतं तत्तृतीयं धर्म्यं वदेद्व्याहृतं तच्चतुर्थम् ॥ १२ ॥

बोलने से न बौलना अच्छा बताया गया है; किंतु सत्य बोलना वाणी की दूसरी विशेषता है, यानी मौन की अपेक्षा भी दूना लाभप्रद है । सत्य भी यदि प्रिय बोला जाय तो तीसरी विशेषता है और वह भी यदि धर्म सम्मत कहा जाय तो वह बचन की चौथी विशेषता है ॥ १२ ॥

यादृशैः संविवदते यादृशांश् चोपसेवते ।
यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग्भवति पूरुषः ॥ १३ ॥

मनुष्य जैसे लोगो के साथ रहता है, जैसे लोगों की सेवा करता है और जैसा होना चाहता है, वैसा ही हो जाता है ॥ १३ ॥

यतो यतो निवर्तते ततस्ततो विमुच्यते ।
निवर्तनाद्धि सर्वतो न वेत्ति दुःखमण्वपि ॥ १४ ॥

मनुष्य जिन जिन विषयो से मन को हटाता जाता उन-उनसे उसके मुक्ति होती जाती है, इस प्रकार यदि सब ओरस निवृत हो जाय तो उसे लेशमात्र दुःस्त का भी कभी अनुभव नहीं होता ।। १४ ॥

न जीयते नोत जिगीषतेऽन्यान् न वैरक्कृच्चाप्रतिघातकश् च ।
निन्दा प्रशंसासु समस्वभावो न शोचते हृष्यति नैव चायम् ॥ १५ ॥

जो नं तो स्वयं किसी से जीता जाता न. दूसरो को जातने की इच्छा करता है न किसी के साथ लेर करता, न दूसरो की चोट पहुचाना चाहता है, जो निन्द आर पशसाम समान माव रखता है, बेह हुए-किल पर हो जाता है ।। १५ ।।

भावमिच्छति सर्वस्य नाभावे कुरुते मतिम् ।
सत्यवादी मृदुर्दान्तो यः स उत्तमपूरुषः ॥ १६ ॥

जो सबका कल्याण चाहता है, किसीके अकल्याणकी बात मन में भी नहीं लाता; जो सत्यवादी कोमल और जितेन्द्रिय है, वह उत्तम पुरुष माना गया है ॥ १६ ॥

नानर्थकं सान्त्वयति प्रतिज्ञाय ददाति च ।
राद्धापराद्धे जानाति यः स मध्यमपूरुषः ॥ १७ ॥

जो झुठी सान्त्वना नहीं देता, देने की प्रतिज्ञा कर के दे ही डालता है, दूसरों के दोषों को जानता है, वह मध्यम श्रेणी का पुरुष है ॥ १७ ॥

दुःशासनस्तूपहन्ता न शास्ता नावर्तते मन्युवशात्कृतघ्नः ।
न कस्य चिन्मित्रमथो दुरात्मा कलाश्चैता अधमस्येह पुंसः ॥ १८ ॥

जिसका शासन अल्यन्त कठोर हो, जो अनेक दोषों से दृषित हो, कलंकित हो, जो क्रोधवश किसी की बुराई करने से नहीं हटता हो, दूसरोंक े किये हुए उपकार को नहीं मानता हो, जिसकी किसी के साथ मित्रता नहीं हो ये अधम पुरुष के भेद हैं।। १८ ॥

न श्रद्दधाति कल्याणं परेभ्योऽप्यात्मशङ्कितः ।
निराकरोति मित्राणि यो वै सोऽधम पूरुषः ॥ १९ ॥

जो अपने ही ऊपर संदह होने के कारण दूसरों से भी कल्याण होने का विश्वार नहीं करता, मित्रो को भी दूर रखता है, अवश्य ही बह अधम पुरुष है।। १९ ॥

उत्तमानेव सेवेत प्राप्ते काले तु मध्यमान् ।
अधमांस्तु न सेवेत य इच्छेच्छ्रेय आत्मनः ॥ २० ॥

जो अपनी उन्नति चाहता है, उत्तम पुरुषों की हो सवा करे, समय आ पड़ने पर मध्यम पुरुषों की भी सेवा कर ले, परंतु अधम पुरुषों की सेवा कदापि न करे ।। २० ॥

प्राप्नोति वै वित्तमसद्बलेन नित्योत्थानात्प्रज्ञया पौरुषेण ।
न त्वेव सम्यग्लभते प्रशंसां न वृत्तमाप्नोति महाकुलानाम् ॥ २१ ॥

मनुष्य दुष्ट पुरुषों के बल से, निरन्तर के उद्योग से, बुद्धिस े तथा पुरुषार्थ से धन भले ही प्राप्त कर ले, परन्तु इससे उत्तम कुलीन पुरुषोंके सम्मान और सदाचार को बह पूर्ण रूप से कदापि नहीं प्राप्त कर सकता ॥ २१ ।।

धृतराष्ट्र उवाच ।
महाकुलानां स्पृहयन्ति देवा धर्मार्थवृद्धाश्च बहुश्रुताश् च ।
पृच्छामि त्वां विदुर प्रश्नमेतं भवन्ति वै कानि महाकुलानि ॥ २२ ॥

धृतराष्ट्र ने कहा- विदुर । धर्म और अर्थके नित्य ज्ञाता एवं बहुश्रुत देवता भी उत्तम कुल में उत्पन्न पुरुषोंकी इच्छा करते हैं। इसलिये मैं तुमसे यह प्रश्न करता हूँ कि महान् (उत्तम) कुल कौन है ? ॥ २२ ॥

विदुर उवाच ।
तमो दमो ब्रह्मवित्त्वं वितानाः पुण्या विवाहाः सततान्न दानम् ।
येष्वेवैते सप्तगुणा भवन्ति सम्यग्वृत्तास्तानि महाकुलानि ॥ २३ ॥

विदुर जी बोले-जिन में तप, इन्द्रिय संयम वेदोंका स्वाध्याय, यज्ञ, पवित्र विवाह, सदा अन्नदान और सदाचार- ये सात गुण वर्तमान हैं, उन्हें महान् (उतम) कुल कहते हैं ॥ २३ ॥

येषां न वृत्तं व्यथते न योनिर् वृत्तप्रसादेन चरन्ति धर्मम् ।
ये कीर्तिमिच्छन्ति कुले विशिष्टां त्यक्तानृतास्तानि महाकुलानि ॥ २४ ॥

जिनका सदाचार शिथिल नहीं होता, जो अपने दोषों से माता-पिता को कष्ट नहीं पहुँचाते, प्रसन्न चित्त से धर्म का आाचरण करते हैं तथा असत्य का परित्याग कर अपने कुल की विशेष कीर्ति चाहते हैं, वे ही महान् कुलीन हैं ॥ २४ ॥

अनिज्ययाविवाहैर्श्च वेदस्योत्सादनेन च ।
कुलान्यकुलतां यान्ति धर्मस्यातिक्रमेण च ॥ २५ ॥

यज्ञ न होने से, निन्दित कुल में विवाह करने से, वेद का त्याग और धर्म का उल्लङ्खन करने से उत्तम कुल भी अधम हो जाते हैं।। २५ ।।

देव द्रव्यविनाशेन ब्रह्म स्वहरणेन च ।
कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥ २६ ॥

देवताओंके धनका नाश, ब्राह्मणके धनका अपहरण और ब्राह्मणोंकी मर्यादा को उल्लङ्कन करने से उत्तम कुल भी अधम हो जाते हैं ॥ २६ ॥

ब्राह्मणानां परिभवात्परिवादाच्च भारत ।
कुलान्यकुलतां यान्ति न्यासापहरणेन च ॥ २७ ॥

भारत ! ब्राह्माणो के अनादर और निन्दा से तथा धरोहर रखी हुई वस्तु को छिपा लेने से अच्छे कुल भी निन्दनीय हो जाते हैं।।२७ ।।

कुलानि समुपेतानि गोभिः पुरुषतोऽश्वतः ।
कुलसङ्ख्यां न गच्छन्ति यानि हीनानि वृत्ततः ॥ २८ ॥

गोओ, गनुष्यों और धनसे सम्पन्न होकर भी जी कुल सदा नीरस होन हैं, व अच्छ कुल की गणना मे नहीं आ सकता ॥ २८ ॥

वृत्ततस्त्वविहीनानि कुलान्यल्पधनान्यपि 

कुलसङ्ख्यां तु गच्छन्ति कर्षन्ति च मयद्यशः ॥ २९ ॥

थोड़े धनवाले कुल भी यदि सदाचार से सम्पन्र हैं, तो वे अच्छे कुलों की गणना में आ जाते हैं और महान् यश प्राप्त करते हैं ।। २१ ।।

वृत्त यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च ।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ॥ ३० ॥

सदाचार की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिये; धन तो आता और जाता रहता है। धन क्षीण हो जानेपर भी सदाचारी मनुष्य क्षीण नहीं माना जाता; किन्तु जो सदाचार से भ्रष्ट हो गया, उसे तो नष्ट ही समझना चाहिये| ३० ॥

गोभि: पशुभिरश्रैश्च कृष्या च सुसमृद्धया ।
कुलानि न प्ररोहन्ति यानि हीनानि वृत्ततः ॥ ३१ ॥

जो कुल सदाचार से हीन हैं, वे गौओं, पशुओं, घोड़ों तथा हरी-भरी खेती से सम्पतन्न होने पर भी उन्रति नहीं कर पाते ॥ ३१ ॥

मा नः कुले वैरकृत्कश् चिदस्तु राजामात्यो मा परस्वापहारी ।
मित्रद्रोही नैकृतिकोऽनृती वा पूर्वाशी वा पितृदेवातिथिभ्यः ॥ ३२ ॥

हमारे कुल में कोई बैर करने वाला न हो, दूसरों के धन का अपहरण करने वाला राजा अथवा मन्त्री न हो और मित्र द्रोही, कपटी तथा असल्यवादी न हो। इसी प्रकार माता-पिता, देवता एवं अतिथियों को भोजन कराने से यहले भोजन करने वाला भी न हो ॥ ३२ ।

यश्च नो ब्राह्मणं हन्याद्यश्च नो ब्राह्मणान्द्विषेत् ।
न नः स समितिं गच्छेद्यश्च नो निर्वपेत्कृषिम् ॥ ३३ ॥

हम लोगों में से जो ब्राह्मणों क हल्या कर, बह्मण के साथ द्वेष कर तथा पितृ को पि्डदान एवं त्पण न कर; वह हमारी सभामे न जाয ॥ ३३.॥

तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता ।
सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदा चन ॥ ३४ ॥

तृण का आसन, पृथ्वी, जल और चौथी मीठी चाणी- इन चार चीजों की कभी कमी नहीं होती॥ ३४ ॥

श्रद्धया परया राजन्नुपनीतानि सत्कृतिम् ।
प्रवृत्तानि महाप्राज्ञ धर्मिणां पुण्यकर्मणाम् ॥ ३५ ॥

महाप्राज्ञ राजन् ! पुण्यकर्म करने वाले धर्मात्मा पुरुषों के यहाँ ये तृण आदि वस्तुएँ बड़ी श्रद्धा के साथ सत्कार के लिये उपस्थित की जाती हैं ॥ ३५ ॥

सूक्ष्मोऽपि भारं नृपते स्यन्दनो वै शक्तो वोढुं न तथान्ये महीजाः ।
एवं युक्ता भारसहा भवन्ति महाकुलीना न तथान्ये मनुष्याः ॥ ३६ ॥

नृपवर ! छोटा-सा भी रथ भार ढो सकता है, किन्तु दूसरे काठ बड़े-बड़े होने पर भी ऐसा नहीं कर सकते । इसी प्रकार उत्तम कुल में उत्पन्न उत्साही पुरुष भार सह सकते हैं, दूसरे मनुष्य वेसे नहीं होते॥ ३६ ॥

न तन्मित्रं यस्य कोपाद्बिभेति यद्वा मित्रं शङ्कितेनोपचर्यम् ।
यस्मिन्मित्रे पितरीवाश्वसीत तद्वै मित्रं सङ्गतानीतराणि ॥ ३७ ॥

जिसके कोप से भयभीत होना पड़े तथा शङ्कित होकर जिसकी सेवा की जाय, वह मित्र नहीं है । मित्र तो वही है, जिस पर पिताकी भाँति विश्वास किया जा सके, दूसरे तो सङ्गमात्र हैं ॥ ३७॥

यदि चेदप्यसम्बन्धो मित्रभावेन वर्तते ।
स एव बन्धुस्तन्मित्रं सा गतिस्तत्परायणम् ॥ ३८ ॥

पहले से कोई सम्बन्ध न होनेपर भी जो मित्रता को बत्ताच करे, वही बन्धु, वही मित्र, बही संहारा और बही आश्रय हैं ॥ ३८ ॥

चलचित्तस्य वै पुंसो वृद्धाननुपसेवतः ।
पारिप्लवमतेर्नित्यमध्रुवो मित्र सङ्ग्रहः ॥ ३९ ॥

जिसका चित्त चञ्चल है, जो वद्धों की सेवा नहीं करता, उस अनिश्चितमति पुरुष के लिये मित्रों का संग्रह स्थायी नहीं होता ॥ ३९ ॥

चलचित्तमनात्मानमिन्द्रियाणां वशानुगम् ।
अर्थाः समतिवर्तन्ते हंसाः शुष्कं सरो यथा ॥ ४० ॥

जैसे हंस सुखे सरोवर के आस-पास ही मंड़राकर रह जाते हैं, भीतर नहीं प्रवेश करते उसी प्रकार जिसका चित्त चञ्चल है; जो अज्ञानी और इन्द्रियों का गुलाम है, उसे अर्थ की प्राप्ति नहीं होती।॥४० ॥

अकस्मादेव कुप्यन्ति प्रसीदन्त्यनिमित्ततः ।
शीलमेतदसाधूनामभ्रं पारिप्लवं यथा ॥ ४१ ॥

दुष्ट पुरुषों का स्वभाव मेध के समान चञ्चल होता है, वे सहसा क्रध कर बैठते हैं और अकारण ही प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ४१ ॥

सत्कृताश्च कृतार्थाश्च मित्राणां न भवन्ति ये ।
तान्मृतानपि क्रव्यादाः कृतघ्नान्नोपभुञ्जते ॥ ४२ ॥

जो मित्रो से सत्कार पाकर और उनकी सहायता में कृत काय होकर भी उनके नहीं होते, ऐसे कृतघों के मरने पर उनका मांस माँसभोजी जन्तु भी नहीं खाते ।॥ ४२ ॥

अर्थयेदेव मित्राणि सति वासति वा धने ।
नानर्थयन्विजानाति मित्राणां सारफल्गुताम् ॥ ४३ ॥

धन हो या न हो, मित्रों का तो सत्कार करे हो । मित्रोरे कुछ भी न माँगले हुए उनके सार-असार की परीक्ष न कर ॥ ४३ ॥

सन्तापाद्भ्रश्यते रूपं सन्तापाद्भ्रश्यते बलम् ।
सन्तापाद्भ्रश्यते ज्ञानं सन्तापाद्व्याधिमृच्छति ॥ ४४ ॥

संताप से रूप नष्ट होता है, संतापन बल नषट होना है, सेताप से ञान नष्ट होता है और संताप से मनुष्य रेग को परप्त होता है ।।४४ ।।

अनवाप्यं च शोकेन शरीरं चोपतप्यते ।
अमित्राश्च प्रहृष्यन्ति मा स्म शोके मनः कृथाः ॥ ४५ ॥

अभीष्ट चस्तु शोक करने से नहीं मिलती; उससे तो केवल शरीर को कष्ट होता है और शत्रु प्रसन्न होते हैं। इसलिये आप मन में शोक न करें ॥ ४५ ॥

पुनर्नरो म्रियते जायते च पुनर्नरो हीयते वर्धते पुनः ।
पुनर्नरो याचति याच्यते च पुनर्नरः शोचति शोच्यते पुनः ॥ ४६ ॥

मनुष्य बार-बार मरता और जन्म लेता है, बार- बार हानि उठाता और बड़ता है, बार-बार स्वयं दूसरे से याचना करता है और दूसरे उससे यांचना करते हैं तथा बारम्बार वह दूसरों के लिये शोक करता है और टूसरे उसके लिये शोक करते हैं ॥ ४६ ।।

सुखं च दुःखं च भवाभवौ च लाभालाभौ मरणं जीवितं च ।
पर्यायशः सर्वमिह स्पृशन्ति तस्माद्धीरो नैव हृष्येन्न शोचेत् ॥ ४७ ॥

सुख-दुःख, उत्पत्ति-विनाश, लाभ-हानि और जीवन मरण- ये वारी: बारी से सबको प्राप्त होते रहते हैं, इसंलिये धीर पुरुष को इनके लिये हर्ष और शोक नहीं करना चाहिये।॥ ४७ ॥

चलानि हीमानि षडिन्द्रियाणि तेषां यद्यद्वर्तते यत्र यत्र ।
ततस्ततः स्रवते बुद्धिरस्य छिद्रोद कुम्भादिव नित्यमम्भः ॥ ४८ ॥

ये छः इन्द्रियाँ बहुत ही चक्ञल हैं, इनमे से जो-जो इन्द्रिय जिस-जिस विषय की ओर बढ़ती है, वहाँ- वृहाँ बुद्धि उसी प्रकार क्षीण होती है; जैसे फूटे घड़े से पानी सदा चू जाता है॥ ४८ ॥

धृतराष्ट्र उवाच ।
तनुरुच्छः शिखी राजा मिथ्योपचरितो मया ।
मन्दानां मम पुत्राणां युद्धेनान्तं करिष्यति ॥ ४९ ॥

धृतराष्ट्र ने कहा-काठ में छिपी हुई आग के समान सूक्ष्म धर्म से बँधे हुए राजा युधिष्ठिर के साथ मैंने मिथ्या व्यवहार किया है । अतः वे मेरे मूर्ख पुत्रों का नाश कर डालेंगे ॥ ४९ ॥

नित्योद्विग्नमिदं सर्वं नित्योद्विग्नमिदं मनः ।
यत्तत्पदमनुद्विग्नं तन्मे वद महामते ॥ ५० ॥

महामते ! यह सब कुछ सदा ही भय से उद्विम् है, मेरा यह मन भी भयसे उद्विम्र है, इसलिये जो उद्वेगशून्य और शान्त पद हो, वही मुझे बताओ ॥ ५० ॥

विदुर उवाच ।
नान्यत्र विद्या तपसोर्नान्यत्रेन्द्रिय निग्रहात् ।
नान्यत्र लोभसन्त्यागाच्छान्तिं पश्याम तेऽनघ ॥ ५१ ॥

विदुरजी बोले-पापशून्य नरेश ! विद्या, तप, इन्द्रियनिग्रह और लोभ त्याग के सिवा और कोई आपके लिये शान्ति का उपाय मैं नहीं देखता।। ५१ ॥

बुद्ध्या भयं प्रणुदति तपसा विन्दते महत् ।
गुरुशुश्रूषया ज्ञानं शान्तिं त्यागेन विन्दति ॥ ५२ ॥

बुद्धि से मनुष्य अपने भव को दूर करता है, तपस्या से महत् पद को प्राप्त होता है, गुरुशुश्रूपाले ज्ञान और योग से शान्ति पाता है ॥ ५२ ॥

अनाश्रिता दानपुण्यं वेद पुण्यमनाश्रिताः ।
रागद्वेषविनिर्मुक्ता विचरन्तीह मोक्षिणः ॥ ५३ ॥

मोक्ष की इच्छा रखनेवाले मनुष्य दान के पुण्य का आश्रय नहीं लेते, वेद के पुण्य का भी आश्रय नहीं लेते, किंतु निष्कामभाव से राग-द्वेष से रहित हो इस विचरन्तीह लोक मे विचरते रहते हैं।। ५३ ।।

स्वधीतस्य सुयुद्धस्य सुकृतस्य च कर्मणः ।
तपसश्च सुतप्तस्य तस्यान्ते सुखमेधते ॥ ५४ ॥

सम्यक् अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्यकर्म और अच्छी तरह की हुई तपस्या के अन्त में सुख की वृद्धि होती है ॥ ५४ ॥

स्वास्तीर्णानि शयनानि प्रपन्ना न वै भिन्ना जातु निद्रां लभन्ते ।
न स्त्रीषु राजन्रतिमाप्नुवन्ति न मागधैः स्तूयमाना न सूतैः ॥ ५५ ॥

राजन ! आपस में फूट रखने वाले लोग अच्छे बिछौनों से युक्त पलंग पाकर भी कभी सुख की नींद नहीं सोने पाते, उन्हें स्त्रियों के पास रहकर तथा सूत-मागधों द्वारा की हुई स्तुति सुनकर भी प्रसन्नता नहीं होती ५५ ॥

न वै भिन्ना जातु चरन्ति धर्मं न वै सुखं प्राप्नुवन्तीह भिन्नाः ।
न वै भिन्ना गौरवं मानयन्ति न वै भिन्नाः प्रशमं रोचयन्ति ॥ ५६ ॥

जो परस्पर भेदभाव रखते हैं, वे कभी धर्म का आचरण नहीं करते । सुख की नहीं पाते। उन्हें गौरव नहीं प्राप्त होता तथा शाक्ति की वार्ता भी नहीं सुहाती ।। ५६ ॥।

न वै तेषां स्वदते पथ्यमुक्तं योगक्षेमं कल्पते नोत तेषाम् ।
भिन्नानां वै मनुजेन्द्र परायणं न विद्यते किं चिदन्यद्विनाशात् ॥ ५७ ॥

हित की बात भी कही जाय तो उन्हें अन्छी नहीं लगती उनके योगक्षेम की भी सिद्धि नहीं हो पाती। राजन् ! भटभाव वाले पुरुषों की विनाश के सिवा और कोई गति नहीं है।। ५৬.।।

सम्भाव्यं गोषु सम्पन्नं सम्भाव्यं ब्राह्मणे तपः ।
सम्भाव्यं स्त्रीषु चापल्यं सम्भाव्यं ज्ञातितो भयम् ॥ ५८ ॥

जैसे गोओं में दूध, बाह्मण में तप और युवती स्त्रियों में चञ्चलता का होना अधिक सम्भव है, उसी प्रकार अपने जाति-बन्धुओं से भय होना भी सम्भव ही है॥ ५८ ॥

तन्तवोऽप्यायता नित्यं तन्तवो बहुलाः समाः ।
बहून्बहुत्वादायासान्सहन्तीत्युपमा सताम् ॥ ५९ ॥

नित्य सींचकर बढ़ायी हुई पतली लताएँ बहुत होने के कारण बहुत वर्षों तक नाना प्रकार के झाके सहती है; यही बात सत्पुरुषों कि विषय में भी समझनी चाहिये। (वे दुर्बल होने पर भी सामूहिक शक्तिसे बलवान् जाते हैं) ॥ ५९ ॥

धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च ।
धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातयो भरतर्षभ ॥ ६० ॥

भरतश्रेष्ठ धृतराष्ट्र ! जलती हुई लकड़ियाँ अलग-अलग होने पर धुआँ फेंकती हैं और एक साथ होने पर प्रज्वलित हो उठती हैं। इसी प्रकार जाति जन्धु ज्ञातयो भी फूट होने पर दुःख उठाते और एकता होने पर सुखी रहते हैं । ६० ॥।

ब्राह्मणेषु च ये शूराः स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च ।
वृन्तादिव फलं पक्वं धृतराष्ट्र पतन्ति ते ॥ ६१ ॥

धृतराष्ट्र जो लोग ब्राह्मण, स्त्रियों, जाति वालों और गोओ पर ही शुरता प्रकट करते हैं, वे डठल से पर्क हुए फला की भाँति नीचे निरते हैं ६१ ॥

महानप्येकजो वृक्षो बलवान्सुप्रतिष्ठितः ।
प्रसह्य एव वातेन शाखा स्कन्धं विमर्दितुम् ॥ ६२ ॥

यदि वृक्ष अकला है तो वह बलवान्, दृढ़मूल तथा बहुत बड़ा होने पर भी एक ही क्षण ने आँधीके द्वारा बिलपूर्वक शाखाओ सहित धरोशायी किया जा सकता है ।। ६२ ।।

अथ ये सहिता वृक्षाः सङ्घशः सुप्रतिष्ठिताः ।
ते हि शीघ्रतमान्वातान्सहन्तेऽन्योन्यसंश्रयात् ॥ ६३ ॥

किन्तु जो बहुत-से बृक्ष एक साथ रहकर समूह के रूप में जुड़े हैं, वे एक-टूसरे के सहारे बड़ी-से-बड़ी आँधी को भी सह सकते है ॥ ६३ ॥

एवं मनुष्यमप्येकं गुणैरपि समन्वितम् ।
शक्यं द्विषन्तो मन्यन्ते वायुर्द्रुममिवौकजम् ॥ ६४ ॥

समस्त गुणो से सम्पन्न अकेले होने पर शत्रु अपनी शक्ति के अन्दर समझते हैं, जैसे अकेले वृक्ष को मनुष्य को वायु ॥ ६४ ॥

अन्योन्यसमुपष्टम्भादन्योन्यापाश्रयेण च ।
ज्ञातयः सम्प्रवर्धन्ते सरसीवोत्पलान्युत ॥ ६५ ॥

किन्तु परस्पर मेल होने से और एक से दूसरे को सहारा मिलने से जाति वाले लोग इस प्रकार वृद्धि को प्राप्त होते हैं, जैसे तालाब में कमल ॥ ६५ ॥

अवध्या ब्राह्मणा गावो स्त्रियो बालाश्च ज्ञातयः ।
येषां चान्नानि भुञ्जीत ये च स्युः शरणागताः ॥ ६६ ॥

ब्राह्मण, गौ, कुटम्बी, बालक, स्त्री, अन्नदाता और शरणागत-ये अवध्य होते हैं॥ ६६ ॥

न मनुष्ये गुणः कश्चिदन्यो धनवताम् अपि ।
अनातुरत्वाद्भद्रं ते मृतकल्पा हि रोगिणः ॥ ६७ ॥

राजन् ! आपका कल्याण हो, मनुष्य में धन और आरोग्य को छोड़कर दूसरा कोई गुण नहीं है, क्योंकि रोगी तो मुर्दे के समान है ॥ ६७॥

अव्याधिजं कटुकं शीर्ष रोगं पापानुबन्धं परुषं तीक्ष्णमुग्रम् ।
सतां पेयं यन्न पिबन्त्यसन्तो मन्युं महाराज पिब प्रशाम्य ॥ ६८ ॥

महाराज ! जो बिना रोग के उत्पन्न, कड़वा, सिर में दर्द पैदा करने वाला, पाप से सम्बद्ध, कठोर, तीखा और गरम है, जो सज्जनों द्वारा पान करने योग्य है औ जिसे दुर्जन नहीं पी सकते – उस क्रोध को आप पी जाइये और शा होइये ॥ ६८ ॥

रोगार्दिता न फलान्याद्रियन्ते न वै लभन्ते विषयेषु तत्त्वम् ।
दुःखोपेता रोगिणो नित्यमेव न बुध्यन्ते धनभोगान्न सौख्यम् ॥ ६९ ॥

रोग से पीड़ित मनुष्य मधुर फल का आदर नहीं करते, विषयों में भी कुछ सुख या सार नहीं मिलता। रोगी सदा ही दुःखी रहते हैं, वे न धन सम्बन्धी भोगों का और न सुख का ही अनुभव करते हैं। ६९ ॥

पुरा ह्युक्तो नाकरोस्त्वं वचो मे द्यूते जितां द्रौपदीं प्रेक्ष्य राजन् ।
दुर्योधनं वारयेत्यक्षवत्यां कितवत्वं पण्डिता वर्जयन्ति ॥ ७० ॥

राजन् ! पहले जुए में द्रौपदी को जीती गयी देखकर मैंने आपसे का था- आप छूत क्रीडा में. आसक्त दर्योधन को रोकिये; विद्वान लोग इ प्रवज्जना के लिये मना करते हैं। कितु आपने मैरा कहना नहीं माना ॥ ७० ॥

न तद्बलं यन्मृदुना विरुध्यते मिश्रो धर्मस्तरसा सेवितव्यः ।
प्रध्वंसिनी क्रूरसमाहिता श्रीर् मृदुप्रौढा गच्छति पुत्रपौत्रान् ॥ ७१ ॥

यह बल नहीं, जिसका मुदल स्वभाव के साथ विरोध हो; सूक्ष्म धर्म व शी् ही रोवन करना चाहिये। कृरतापूर्वक उपाज्जन को हुई लक्ष्मी नश्चर हो है. यदि बह मृदुलतापूर्वक बढ़ायी गयी हो तो पुत्र-पौत्रो तक रहती है।। ७१ ।।

धार्तराष्ट्राः पाण्डवान्पालयन्तु पाण्डोः सुतास्तव पुत्रांश्च पान्तु ।
एकारिमित्राः कुरवो ह्येकमन्त्रा जीवन्तु राजन्सुखिनः समृद्धाः ॥ ७२ ॥

राजन् ! आपके पुत्र पाण्डवों की रक्षा करें और पाण्डु के पुत्र आपके पुत्रों की रक्षा करें सभी कौरव एक-दूसरे के शत्रु को शत्रु और मित्र को मित्र समझे। सबका एक ही कर्तव्य हो, सभी सुखी और समृद्धिशाली होकर जीवन व्यतीत करें ॥ ७२ ॥

मेढीभूतः कौरवाणां त्वमद्य त्वय्याधीनं कुरु कुलमाजमीढ ।
पार्थान्बालान्वनवास प्रतप्तान् गोपायस्व स्वं यशस्तात रक्षन् ॥ ७३ ॥

अज़मीढकुलनन्दन ! इस समय आप ही कौरवों के आधार स्तम्भ हैं, कुरुवंश आपके ही अधीन है। तात ! कुन्तीके पुत्र अभी बालक हैं और वनवास से बहुत कष्ट पा.चुके हैं, इस समय अपने यश की रक्षा करते हुए पाण्डवों का पालन कीजिये ॥ ७३ ॥।

सन्धत्स्व त्वं कौरवान्पाण्डुपुत्रैर् मा तेऽन्तरं रिपवः प्रार्थयन्तु ।
सत्ये स्थितास्ते नरदेव सर्वे दुर्योधनं स्थापय त्वं नरेन्द्र ॥ ७४ ॥

कुरुराज ! आप पाएडवो से सन्धि कर ले; जिससे शत्रुओं को आपका छिद्र देखने का अवसर न मिल । नरदेव । समस्त पाण्डव सल्य पर डुटे हाए है, अब आप अपने पुत्र दुर्याधन को राकिये ।। ७४ ।।

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरहितवाक्ये षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

विदुर उवाच ।
सप्तदशेमान्राजेन्द्र मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।
वैचित्रवीर्य पुरुषानाकाशं मुष्टिभिर्घ्नतः ॥ १ ॥

तानेविन्द्रस्य हि धनुरनाम्यं नमतोऽब्रवीत् ।
अथो मरीचिनः पादाननाम्यान्नमतस्तथा ॥ २ ॥

यश्चाशिष्यं शासति यश् च कुप्यते यश्चातिवेलं भजते द्विषन्तम् ।
स्त्रियश्च योऽरक्षति भद्रमस्तु ते यश्चायाच्यं याचति यश् च कत्थते ॥ ३ ॥

यश्चाभिजातः प्रकरोत्यकार्यं यश्चाबलो बलिना नित्यवैरी ।
अश्रद्दधानाय च यो ब्रवीति यश्चाकाम्यं कामयते नरेन्द्र ॥ ४ ॥

वध्वा हासं श्वशुरो यश् च मन्यते वध्वा वसन्नुत यो मानकामः ।
परक्षेत्रे निर्वपति यश्च बीजं स्त्रियं च यः परिवदतेऽतिवेलम् ॥ ५ ॥

यश्चैव लब्ध्वा न स्मरामीत्युवाच दत्त्वा च यः कत्थति याच्यमानः ।
यश्चासतः सान्त्वमुपासतीह एतेऽनुयान्त्यनिलं पाशहस्ताः ॥ ६ ॥

विदूर कहते हैं- रजेन्द्र ! विचित्रवीर्यनन्दन ! स्वायन्भुव मनुजी ने कहा है वि नीचे लिखे सत्रह प्रकार के पुरुषों को पाश हाथम लिय यमराज के दूत नरक में ले जाते हैं-जो आकाश पर मुि मुष्टि प्रहर करता है, न झुकाये जा सकने वाले वर्षा कालीन इन्द्र थनुष को झुकाना चाहता है, पकड़ मे न आने वाली सर्य को किरणो को पकड़ने का प्रयास करता है, शासन के अयाग्य पुरूष पर शासन करता है, मयादा का उल्लंघन करके रून्तुष्ट होता है, शत्रु की सवा करता है, रक्षण के अयोग्य स्त्री की रक्षा करने का प्रयत्न करता तथा उसके द्वारा अपने कल्याण का अनुभव करता है, याचना करने के अयोग्य पुरुष से याचना करता है तथा आत्मप्रशंसा करता है, अच्छे कुल में उत्पन्न होकर भी नीच कर्म करता है, दुर्बल होकर भी बलवान से वैर बाँधता है, श्रद्धाहीन को उपदेश करता है, न चाहने योग्य (शास्त्रनिषिद्ध) वस्तु को चाहता है, श्वशुर होकर पुत्रवधू के साथ परिहास पसन्द करता है तथा पुत्रवधु से एकान्तवास करके भी निर्भय होकर समाज में अपनी प्रतिष्ठा चाहता है, पर स्त्री में अपने वीर्य का आधान करता है, आवश्यकता से अधिक स्त्री की निन्दा करता है, किसी से कोई बस्तु पाकर भी याद नहीं है’, ऐसा कहकर उसे दबाना चाहता है, माँगने पर दान देकर उसके लिये अपनी डींग हाँकता है और झुठ को सही साबित करने का प्रयास करता है । १-६॥

यस्मिन्यथा वर्तते यो मनुष्यस् तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः ।
मायाचारो मायया वर्तितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युदेयः ॥ ७ ॥

जो मनुष्य अपने साथ जैसा बर्ताव करे उसके साथ वैसा ही वर्ताव करना चाहिये-यही नीति-धर्म है। कपट का आचरण करने वाले के साथ कपट पूर्ण बर्ताव करे और अच्छा बतर्ताव करने वाले के साथ. साधु-भाव से ही बर्ताव करना चाहिये ।॥ ७ ॥

जरा रूपं हरति धैर्यमाशा मृत्युः प्राणान् धर्मचर्यामसूया ।
कामो हियं वृत्तमना्यसेवा क्रोधः श्रियं सर्वमेवाभिमानः ॥ ८ ॥

बुढापा रूप का आशा धैर्य का, मृत्यु प्राणों का, असूया धर्माचरण का, काम लज्जा का, नीच पुरुषों की सेवा सदाचार का, क्रोध लक्ष्मी का और अभिमान सर्वस्व का ही नाश कर देता है ॥ ८॥

धृतराष्ट्र उवाच।
शतायुरुक्तः पुरुषः सर्ववेदेषु वै यदा ।
नाप्नोत्यथ च तत्सर्वमायुः केनेह हेतुना ॥ ९ ॥

धृतराष्ट्र ने कहा-जब सभी वेदो में पुरुष को सो वर्ष की आयु वाला बताया गया है, तो वह किस कारण से अपनी पूर्ण आयु को नहीं पाता ? ॥ ९ ।

विदुर उवाच ।
अतिवादोऽतिमानश्च तथात्यागो नराधिपः ।
क्रोधश्चातिविवित्सा च मित्रद्रोहश्च तानि षट् ॥ १० ॥

एत एवासयस्तीक्ष्णाः कृन्तन्त्यायूंषि देहिनाम् ।
एतानि मानवान्घ्नन्ति न मृत्युर्भद्रमस्तु ते ॥ ११ ॥

विदुरजी बोले-राजन् ! आपका कल्याण हो। अल्यन्त अभिमान, अधिक बोलना, त्याग का अभाव, क्रोध, अपना ही पेट पालने की चिन्ता और मित्र द्रोह-ये छः तीखो तलवारें देहधारियों की आयु को काटती हैं। ये ही मनुष्यों का वध करती हैं, मत्यु नहीं ॥। १०-११ ।।

विश्वस्तस्यैति यो दारान्यश्चापि गुरु तक्पगः ।
वृषली पतिर्द्विजो यश्च पानपश्चैव भारत ॥ १२ ॥

शरणागतहा चैव सर्वे ब्रह्महणैः समाः ।
एतैः समेत्य कर्तव्यं प्रायश्चित्तमिति श्रुतिः ॥ १३ ॥

भारत ! जो अपने ऊपर विश्वास करने वाले की स्त्री के साथ समागम करता है, जो गुरु स्त्री गामी है, ब्राह्मण होकर शुद्र की स्त्री से सम्बन्ध रखता है, शराब पीता है तथा जो बड़ों पर हुकुम चलाने वाला दूसरों की जीविका नष्टः करने वाला, वाह्यणों को सेवा कार्य के लिये इधर-उधर भेजने वाला और शरणागत की हिसा करने वाला है ये सब के सब ब्रह्म हत्यारे के समान है, इनका सङ्ग ही जाने पर प्रायश्चित करे—यह वेदों की आज्ञा है । १२-१३ ॥

गृही वदान्योऽनपविद्ध वाक्यः शेषान्न भोकाप्यविहिंसकश् च ।
नानर्थकृत्त्यक्तकलिः कृतज्ञः सत्यो मृदुः स्वर्गमुपैति विद्वान् ॥ १४ ॥

बड़ो की आज्ञा मानने वाला नीतिज्ञ, दाता यज्ञ शेष अन्र का भोजन करने वाला, हिंसा रहित, अनर्थकारी कार्यो से दूर रहने वाला, कृतज्ञ, सत्यवादी और कोमल स्वभाव वाला विद्वान् स्वर्ग-गामी होता है । १४ ।।

सुलभाः पुरुषा राजन्सततं प्रियवादिनः ।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥ १५ ॥

राजन् ! सदा प्रिय वचन बोलने वाले मनुष्य तो सहज में ही मिल सकते हैं, किंतु जो अप्रिय होता हुआ हितकारी हो, ऐसे वचन के वक्ता और श्रोता दोनों ही दुर्लभ हैं।। १५ ॥

यो हि धर्मं व्यपाश्रित्य हित्वा भर्तुः प्रियाप्रिये ।
अप्रियाण्याह पथ्यानि तेन राजा सहायवान् ॥ १६ ॥

जो धर्म का आश्रय लेकर तथा स्वामी को प्रिय लगेगा या अप्रिय-इसका विचार छोड़कर अप्रिय होने पर भी हित की बात कहता है; उसी से राजा को सच्ची सहायता मिलती है।। १६ ॥

त्यजेत्कुलार्थे पुरुषं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ १७ ॥

कुल की रक्षा के लिये एक मनुष्य का, ग्राम की रक्षाके लिये कुल का, देश की रक्षा के लिये गाँव का और आत्मा के कल्याण के लिये सारी पृथ्वी का त्याग कर देना चाहिये । १७ ।

आपदर्थं धनं रक्षेद्दारान्रक्षेद्धनैरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ १८ ॥

आपति के लिये धन की रक्षा करे, धन के द्वारा भी स्त्री की रक्षा करे और स्त्री एवं धन दोनों के द्वारा सदा अपनी रक्षा करे ॥ १८ ॥

द्यूतमेतत् पुराकल्पे दूष्टं वैरकरं नृणाम् ।
तस्माद् द्यूतं न सेवेत हास्यार्थमपि बुद्धिमान् ॥ १९ ॥

पहले के समय में जुआ खेलना मनुष्यों में वैर डालने का कारण देखा गया हैं, अतः बुद्धिमान् मनुष्य हँसी के लिये भी जूआ न खेले।। १९ ॥

उक्तं मया द्यूतकालेऽपि राजन् नैवं युक्तं वचनं प्रातिपीय ।
तदौषधं पथ्यमिवातुरस्य न रोचते तव वैचित्र वीर्य ॥ २० ॥

प्रतीपनन्दनं ! विचित्र वीर्य कुमार ! राजन् ! मेंने जूए का खेल आरम्भ होते समय भी कहा था कि यह ठीक नहीं है, किन्तु रोगी को जैसे दवा और पथ्य नहीं भाते, उसी तरह मेरी वह बात भी आपको अच्छी नहीं लगी ।। २० ।।

काकैरिमांश्चित्रबर्हान्मयूरान् पराजैष्ठाः पाण्डवान्धार्तराष्ट्रैः ।
हित्वा सिंहान्क्रोष्टु कान्गूहमानः प्राप्ते काले शोचिता त्वं नरेन्द्र ॥ २१ ॥

नरेन्द्र ! आप कौओं के समान अपने पुत्र के ह्वारा विचित्र पंख वाले मोरों के सदश पाण्डवों को पराजित करने का प्रयत्न कर रहे हैं, सिंहो को छोडकर सियारों की रक्षा कर रहे हैं; समय आने पर आप को इसके लिये पश्चाताप करना पड़ेगा।। २१ ।

यस्तात न क्रुध्यति सर्वकालं भृत्यस्य भक्तस्य हिते रतस्य।
तस्मिन्भृत्या भर्तरि विश्वसन्ति न चैनमापत्सु परित्यजन्ति ॥ २२ ॥

तात . जो स्वामि सदा हितसाधनम लगे रहने वाले अपने भक्त सेवक पर कभी क्रोध नहीं करता, उस पर भूत्यगण विश्वास करते हैं और उसे आपत्ति के समय भी नहीं छोड़ते॥ २२ ॥

न भृत्यानां वृत्ति संरोधनेन बाह्यं जनं सञ्जिघृक्षेदपूर्वम् ।
त्यजन्ति ह्येनमुचितावरुद्धाः स्निग्धा ह्यमात्याः परिहीनभोगाः ॥ २३ ॥

सेवकों की जीविका बन्द करके दूसरों के राज्य और धन के अपहरण का प्रयत्न नहीं करना चाहिये, क्योंकि अपनी जीविका छिन जाने से भोगों से वंचित होकर पहले के प्रेमी मन्त्री भी उस समय विरोधी बन जाते हैं और राजा का परित्याग कर देते हैं । २३ ॥

कृत्यानि पूर्वं परिसङ्ख्याय सर्वाण्य् आयव्ययावनुरूपां च वृत्तिम् ।
सङ्गृह्णीयादनुरूपान्सहायान् सहायसाध्यानि हि दुष्कराणि ॥ २४ ॥

पहले कर्तव्य, आय-व्यय और उचित वेतन आदि का निश्चय करके फिर सुर्योग्य सहायका का संग्रह करे; क्यांकि कठिन से कठिन कार्य भी सहायको द्वारा साध्य होते हैं।। २४ ॥

अभिप्रायं यो विदित्वा तु भर्तुः सर्वाणि कार्याणि करोत्यतन्द्रीः ।
वक्ता हितानामनुरक्त आर्यः शक्तिज्ञ आत्मेव हि सोऽनुकम्प्यः ॥ २५ ॥

जो सेवक स्वामी के अभिप्राय को समझकर आलस्थरहित हो समस्त कार्य का पूरा करता है, जो हितको बात कहने वाला, स्वामिभत्त, सज्जन और राजा की शक्ति की जानने वाला है, उसे अपने समान समझकर कृपा करना चाहिये ॥ २५ ॥

वाक्यं तु यो नाद्रियतेऽनुशिष्टः प्रत्याह यश्चापि नियुज्यमानः ।
प्रज्ञाभिमानी प्रतिकूलवादी त्याज्यः स तादृक्त्वरयैव भृत्यः ॥ २६ ॥

जो सेवक स्वामी के आज्ञा देने पर उनकी बात का आदर नहीं करता, किसी काम में लगाये जाने पर इनकार कर जाता है, अपनी बुद्धि पर गर्व करने और प्रतिकूल बोलने वाले उस भूत्य को शीघ्र ही त्याग देना चाहिये ।| २६ ॥

अस्तब्धमक्लीबमदीर्घसूत्रं सानुक्रोशं श्लक्ष्णमहार्यमन्यैः।
अरोग जातीयमुदारवाक्यं दूतं वदन्त्यष्ट गुणोपपन्नम् ॥ २७ ॥

अहंकाररहित, कायरता शून्य, शीष्र काम पूरा करनेवाला, दयालु, शुद्धहदय, दूसरा के बहकावे में न आनेवाला, नीरीग और उदार बचनवाला- इन आठ मुणों से युक्त मनुष्य को दूत बनाने योग्य बताया गया हैं॥ २७ ॥

न विश्वासाज्जातु परस्य गेहं गच्छेन्नरश्चेतयानो विकाले ।
न चत्वरे निशि तिष्ठेन्निगूढो न राजन्यां योषितं प्रार्थयीत ॥ २८ ॥

सावधान मनुष्य विश्वास करके असमय में कभी किसी दुसरे अविश्वस्त मनुष्य के घर न जाय, रात मे छिपकर चौराहे पर न खड़ा हो आर राजा जिस स्त्री को ग्रहण करना चाहता हो, उसे प्राप्त करने का यल्न न करें ॥ २८ ॥

न निह्नवं सत्र गतस्य गच्छेत् संसृष्ट मन्त्रस्य कुसङ्गतस्य ।
न च ब्रूयान्नाश्वसामि त्वयीति स कारणं व्यपदेशं तु कुर्यात् ॥ २९ ॥

दुष्ट सहायको वाला राजा जब बहुत लोगों के साथ मन्त्रणा समिति में बैठकर सलाह ले रहा हो, उस समय उसकी बात का खण्डन न करे; मैं तुम पर विश्वास नहीं करता ऐसा भी न कहे, अपितु कोई युक्तिसङ्गत बहाना बनाकर वहाँ से हट जाय ॥ २९ ॥

घृणी राजा पुंश्चली राजभृत्यः पुत्रो भ्राता विधवा बाल पुत्रा ।
सेना जीवी चोद्धृत भक्त एव व्यवहारे वै वर्जनीयाः स्युरेते ॥ ३० ॥

अधिक दयालु राजा, व्यभिचारिणी स्त्री, राजकर्मचारी, पुत्र, भाई, छोटें बच्चों बाली विधवा., सैनिक और जिसका अधिकार छीन लिया गया हो, वह इन सबके साथ लेन-देन का व्यवहार न करे । । ३० ॥

अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपर्यन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च श्रुतं दमश्च ।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥ ३१ ॥

ये आठ गुण परुष की शोभा बढ़ाते हैं- बुद्धि लीनता शास्त्र ज्ञान, इन्द्रिय निम्रह, पराक्रम, अधिक न बोलने का स्वभाव, यथाशक्ति दान और कतज्ञता ।। ३१ ।।

एतान् गुणांस्तात महानुभावा-नेको गुण: संश्रयते प्रसह्य ।
यदा सत्कुरुते मनुष्यं सर्वान् गुणानेष गुणो बिभर्ति ॥ ३२ ॥

तात ! एक गुण एसा है, जो इन सभा नहत्त्वपूर्ण गुण पर हठात् आधिकार कर लेता है। राजा जिस समय किसी मनुष्य का सत्कार करता है, उस समय यह गुण (राज सम्मान) उपर्युक्त सभी गुणों से बढ़कर शोभा पाता है॥ ३२ ॥

गुणा दश स्नानशीलं भजन्ते बलं रूपं स्वरवर्णप्रशुद्धिः ।
स्पर्शश्च गन्धश्च विशुद्धता च श्रीः सौकुमार्यं प्रवराश्च नार्यः ॥ ३३ ॥

नित्य स्नान करने वाले मनुष्य को बल, रूप, मधुर स्वर, उज्ज्वल वर्ण, कोमलता, सुगंन्ध, पवित्रता, शोभा, सुकुमारता और सुन्दरी स्त्रियाँ- ये दस लाभ प्राप्त होते हैं ३३ ॥

गुणाश्च षण्मितभुक्तं भजन्ते आरोग्यमायुश्च सुखं बलं च ।
अनाविलं चास्य भवेदपत्यं न चैनमाद्यून इति क्षिपन्ति ॥ ३४ ॥

थोड़ा भोजन करने वाले को निम्नड्कित छः गुण प्राप्त होते हैं- आरोग्य, आयु, बल और सुख तो मिलते ही हैं, उसकी संतान सुन्दर होती है तथा यह बहुत खाने वाला है ऐसा कहकर लोग उसपर आक्षेप नहीं करते ॥ ३४ ॥

अकर्म शीलं च महाशनं च लोकद्विष्टं बहु मायं नृशंसम् ।
अदेशकालज्ञमनिष्ट वेषम् एतान्गृहे न प्रतिवासयीत ॥ ३५ ॥

अकर्मण्य, बहुत खाने वाले, सब लोगो से वेर करने वाले अधिक मायावी, क्रूर, देश-काल का ज्ञान न रखने वाले और निन्दित वेष धारण करने वाले मनुष्य को कभी अपने घर में न ठहरने दे। ३५ ॥

कदर्यमाक्रोशकमश्रुतं च वराक सम्भूतममान्य मानिनम् ।
निष्ठूरिणं कृतवैरं कृतघ्नम् एतान्भृतार्तोऽपि न जातु याचेत् ॥ ३६ ॥

बहुत दुःखी होने पर भी कृपण, गाली बकने वाले, मूर्ख, जंगल में रहने वाले, धूर्त, नीच सेवी, निर्दयी, वैर बाँधने वाले और कृतन्न से कभी सहायता की याचना नहीं करनी चाहिये ॥ ३६ ॥

सङ्क्लिष्टकर्माणमतिप्रवादं नित्यानृतं चादृढ भक्तिकं च ।
विकृष्टरागं बहुमानिनं चाप्य् एतान्न सेवेत नराधमान्षट् ॥ ३७ ॥

क्लेशप्रद कर्म करने वाला, अत्यन्त प्रमादी, सदा असत्यभाषण करने वाला, अस्थिर भक्ति वाला स्नेह से रहित अपने को चतुर मानने वाला- इन छः प्रकार के अधम पुरुषों की सेवा न करे ॥ ३७ ॥

सहायबन्धना ह्यर्थाः सहायाश्चार्थबन्धनाः ।
अन्योन्यबन्धनावेतौ विनान्योन्यं न सिध्यतः ॥ ३८ ॥

धन की प्राप्ति सहायक की अपेक्षा रखती है और सहायक धन की अपेक्षा रखते हैं। से दोनों एक-दूसरे के आश्रित हैं, परस्पर के सहयोग बिना इनकी सिद्धि नहीं होती । ३८॥

उत्पाद्य पुत्राननृणांश्च कृत्वा वृत्तिं च तेभ्योऽनुविधाय कां चित् ।
स्थाने कुमारीः प्रतिपाद्य सर्वा अरण्यसंस्थो मुनिवद्बुभूषेत् ॥ ३९ ॥

पुत्रो को उत्पन्न कर उन्हें ऋण के भार से मुक्त करके उनके लिये किसी जीविका का प्रबून्ध कर दे, फिर कन्याओ का योग्य वरके साथ विवाह कर देने के पश्चात् बन मे मुनिवृत्ति से रहने की इच्छा करे।। ३९ ॥

हितं यत्सर्वभूतानामात्मनश्च सुखावहम् ।
तत्कुर्यादीश्वरो ह्येतन्मूलं धर्मार्थसिद्धये ॥ ४० ॥

जो सम्पूर्ण प्रापियों के लिये हितकर और अपने लिये भी सुखद हो, उसे ईश्वरार्पणबुद्धि से करे, सम्पूर्ण सिद्धियों का यही मूल मन्त्र है॥ ४० ॥

बुद्धिः प्रभावस्तेजश्च सत्त्वमुत्थानमेव च ।
व्यवसायश्च यस्य स्यात्तस्यावृत्ति भयं कुतः ॥ ४१ ॥

जिसमें बढ़ने की হक्ति, प्रभाव, तेज, पराक्रम, उद्योग और निश्चय है,उसे अपनी जीविका के नाश का भय कैसे हो सकता

पश्य दोषान्पाण्डवैर्विग्रहे त्वं यत्र व्यथेरन्नपि देवाः स शक्राः ।
पुत्रैर्वैरं नित्यमुद्विग्नवासो यशः प्रणाशो द्विषतां च हर्षः ॥ ४२ ॥

पाण्डवं के साथ युद्ध करने में जो दोष हैं, उन पर दृष्टि डालिये, उनसे संग्राम छिड़ जाने पर इन्द्र आदि देवताओं को भी कष्ट ही उठाना पड़ेगा। इसके सिवा पुत्रो के साथ वैर, निल्प उद्वेगपूर्ण जीवन, कीर्ति का नाহা और शत्रुओ को आनन्द होगा ॥ ४२ ॥

भीष्मस्य कोपस्तव चेन्द्र कल्प द्रोणस्य राज्ञश्च युधिष्ठिरस्य ।
उत्सादयेल्लोकमिमं प्रवृद्धः श्वेतो ग्रहस्तिर्यगिवापतन्खे ॥ ४३ ॥

इन्द्र के समान पराक्रमी महाराज ! अआकाश मे तिरछा उदित हुआ धूमकेतु जैसे सारे संसार में अशान्ति और उपद्रव खड़ी कर देता है, उसी तरह भग्म, आप द्रोणाचार्य और राजा युधिष्टिर का बढ़ा हुआ कोप इस संसार का संहार कर सकता है ॥ ४३ ॥

तव पुत्रशतं चैव कर्णः पञ्च च पाण्डवाः ।
पृथिवीमनुशासेयुरखिलां सागराम्बराम् ॥ ४४ ॥

आपके सौ पुत्र, कर्ण और पाँच पाण्डव – ये सब मिलकर समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन कर सकते हैं ॥ ४४ ॥

धार्तराष्ट्रा वनं राजन्व्याघ्राः पाण्डुसुता मताः ।
मा वनं छिन्धि स व्याघ्रं मा व्याघ्रान्नीनशो वनात् ॥ ४५ ॥

राजन् ! आपके पुत्र वन के समान हैं और पाण्डव उसमें रहने वाले व्याघ्र हैं। आप व्याघ्रों सहित समस्त वन को नष्ट न कीजिये तथा बन से उन व्याघ्रो को दूर न भगाइये ॥ ४५॥

न स्याद्वनमृते व्याघ्रान्व्याघ्रा न स्युरृते वनम् ।
वनं हि रक्ष्यते व्याघ्रैर्व्याघ्रान्रक्षति काननम् ॥ ४६ ॥

व्याघ्रों के बिना वन की रक्षा नहीं हो सकती तथा वन के बिना व्याघ्र नहीं रह सकते; क्योंकि व्याघ्र वन की रक्षा करते हैं और वन व्याघों की ।। ४६ ।।

न तथेच्छन्त्यकल्याणाः परेषां वेदितुं गुणान् ।
यथैषां ज्ञातुमिच्छन्ति नैर्गुण्यं पापचेतसः ॥ ४७ ॥

जिनका मन पाप में लगा रहता है, वे लोग दूसरी के कल्याणमय गुण को जानने की वेसी इच्छा नहीं रखते, जैसी कि उनके अवगुणों को जानने की रखते हैं ॥ ४७ ॥

अर्थसिद्धिं परामिच्छन्धर्ममेवादितश् चरेत् ।
न हि धर्मादपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम् ॥ ४८ ॥

जो अर्थ का पूर्ण सिद्धि चाहता हो उसे पहले धर्म का ही आचरण करना चाहिये । जैसे स्वर्ग से अमृतd दूर नही होता उसी प्रकार धर्म से अर्थ अलग नहीं होता |॥ ४८ ॥

यस्यात्मा विरतः पापात्कल्याणे च निवेशितः ।
तेन सर्वमिदं बुद्धं प्रकृतिर्विकृतिर्श्च या ॥ ४९ ॥

जिसकी बुद्धि पाप से हटाकर कल्याण में लगा दी गयी है, उसने संसार में जो भी प्रकृति और विकृति हैं- उन सबको जान लिया है ॥ ४९ ।॥

यो धर्ममर्थं कामं च यथाकालं निषेवते ।
धर्मार्थकामसंयोगं योऽमुत्रेह च विन्दति ॥ ५० ॥

जो समयानुसार धर्म, अर्थ और काम का सेवन करता है, वह इस लोक और परलोक में भी धर्म, अर्थ और काम को प्राप्त करता है ५० ॥

संनियच्छति यो वेगमुत्थितं क्रोधहर्षयोः ।
स श्रियो भाजनं राजन्यश्चापत्सु न मुह्यति ॥ ५१ ॥

राजन् ! जो क्रोध और हर्षके उठे हुए वेग को रोक लेता है और आपत्ति में भी धैर्य को खो नहीं बैठता, बही राजलक्ष्मी का अधिकारी होता है ॥ ५१ ॥

बलं पञ्च विधं नित्यं पुरुषाणां निबोध मे ।
यत्तु बाहुबलं नाम कनिष्ठं बलमुच्यते ॥ ५२ ॥।

अमात्यलाभो भद्रं ते द्वितीयं बलमुच्यते ।
धनलाभस्तृतीयं तु बलमाहुर्जिगीषवः ॥ ५३ ॥

यत्त्वस्य सहजं राजन्पितृपैतामहं बलम् ।
अभिजात बलं नाम तच्चतुर्थं बलं स्मृतम् ॥ ५४ ॥

येन त्वेतानि सर्वाणि सङ्गृहीतानि भारत ।
यद्बलानां बलं श्रेष्ठं तत्प्रज्ञा बलमुच्यते ॥ ५५ ॥

आपका कल्याण हो, ननुष्या में सदा पाँच प्रकार का बल होता है, उसे सुनिये । जो बहुबल नामक बल है, वह कनिष्ठ बल कहलाता है; म्न्त्री को मिलना दूसरा बल हैं; मनीषी लोग धन के लाभ को तीसरा बल बतात। है, और राजन् ! जो बाप दादो से प्राप्त हुआ ननुष्य का स्वाभाविक बल (कुटम्ब का बल) है, वह अभिजात नामक चौथा बल है। भारत! जिसमे इन सभी बलों का संगह हो जाता है ता जो सब बलों में श्रेष्ठ बल है, वह पाँचवा बुद्धि का बल’ कहलाता है। ५२-५५॥

महते योऽपकाराय नरस्य प्रभवेन्नरः ।
तेन वैरं समासज्य दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् ॥ ५६ ॥

जो मनुष्य का बहुत बड़ा अपकार कर सकता है, उस पुरुष के साथ बैर ठानकर इस विश्वास पर निश्चिन्त न हो जाय कि मैं उससे दूर हूँ (बह मेरा कुछ नहीं कर सकता) ।॥ ५६ ॥

स्त्रीषु राजसु सर्पेषु स्वाध्याये शत्रुसेविषु ।
भोगे चायुषि विश्वासं कः प्राज्ञः कर्तुमर्हति ॥ ५७ ॥

ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा जो स्त्री, राजा, साँप, पढ़े हुए पाठ, सामर्थ्यशाली व्यक्ति, शत्रु भोग और आयुष्य पर पूर्ण विश्वास कर सकता

प्रज्ञा शरेणाभिहतस्य जन्तोश् चिकित्सकाः सन्ति न चौषधानि ।
न होममन्त्रा न च मङ्गलानि नाथर्वणा नाप्यगदाः सुसिद्धाः ॥ ५८ ॥

जिस को बुद्धि के बाण से मारा गया है, उस जीव के लिये न कोई वैध्य है, न दवा है, न होम है, न मन्त्र है, न कोई माङ्गलिक कार्य, न अरथववेदोक्त प्रयोग और न भलीं-भाँति सिद्ध जड़ी-बूटी ही है । ५८ ॥

सर्पश्चाग्निश्च सिंहश्च कुलपुत्रश्च भारत ।
नावज्ञेया मनुष्येण सर्वे ते ह्यतितेजसः ॥ ५९ ॥

भारत ! मनुष्य को चाहिये कि वह सर्प, अग्नि, सिंह और अपने कुल में उत्पत्र व्यक्तिव अनादर न करे, क्योंकि ये सभी बड़े तेजस्वी होते हैं।। ५९ ॥

अग्निस्तेजो महल्लोके गूढस्तिष्ठति दारुषु ।
न चोपयुङ्क्ते तद्दारु यावन्नो दीप्यते परैः ॥ ६० ॥

संसार में अग्नि एक गहान् तेज हैं, बह काठ में छिपी रहती है; किन्तु जबतक दूरे लग उस प्र्चटत न कर दे, तवतक वह उस काठ को नहीं हे ।। ६० ।।

स एव खलु दारुभ्यो यदा निर्मथ्य दीप्यते ।
तदा तच्च वनं चान्यन्निर्दहत्याशु तेजसा ॥ ६१ ॥

वही अग्नि यदि काष्ठ से मथकर उद्दीप्त कर दी जाती है, तो बह अपने तेज से उस काष्ठ को, जङ्गल को तथा दूसरी वस्तुओं को भी जल्दी ही जला डालती है। ६१ ॥

एवमेव कुले जाताः पावकोपम तेजसः ।
क्षमावन्तो निराकाराः काष्ठेऽग्निरिव शेरते ॥ ६२ ॥

इसी प्रकार अपने कुल में उत्पन्न वे अग्रि के समान तेजस्वी पाण्डव और विकार शून्य हो काष्ठ में छिपी अग्रि की तरह शान्त भाव स्थित हैं॥ ६२ ॥

लता धर्मा त्वं सपुत्रः शालाः पाण्डुसुता मताः ।
न लता वर्धते जातु महाद्रुममनाश्रिता ॥ ६३ ॥

अपने पुत्रो सहित आप लताके समान है और पाण्डव महान् शालबूक्ष सदृश हैं, महान् वृक्षका आश्रय लिये बिना लता कभी बढ़ नः सकती ॥ ६३ ॥

वनं राजंस्त्वं सपुत्रोऽम्बिकेय सिंहान्वने पाण्डवांस्तात विद्धि ।
सिंहैर्विहीनं हि वनं विनश्येत् सिंहा विनश्येयुरृते वनेन ॥ ६४ ॥

राजन् ! अम्बिकानन्दन ! आपके पुत्र एक वन हैं और पाण्डवों को उस भीतर रहने वाले सिंह समझिये। तात ! सिंह से सुना हो जाने पर वन नष्ट हो जाता है और वन के बिना सिंह भी नष्ट हो जाते हैं॥ ६४ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरवाक्ये सप्तत्रिंशोऽध्यायः । ३७ ।॥

ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति ।
प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान्पतिपद्यते ॥ १ ॥

विदुरजी कहते हैं- समय नवयुवक व्यक्ति के प्राण ऊपर को उठने लगते हैं, फिर जब वह वृद्ध के स्वागत में उठकर खड़ा होता और प्रणाम करता है, तो पुनः प्राणो को वास्तविक स्थिति में प्राप्त करता है। १ ॥

पीठं दत्त्वा साधवेऽभ्यागताय आनीयापः परिनिर्णिज्य पादौ ।
सुखं पृष्ट्वा प्रतिवेद्यात्म संस्थं ततो दद्यादन्नमवेक्ष्य धीरः ॥ २ ॥

धीर पुरुष को चाहिये, जब कोई साधु पुरुष अतिथि के रूप में घर पर आवे तो पहले आसन देकर, जल लाकर उसके चरण पखारे, पिर उसकी कुशल पूछकर अपनी स्थिति बतावे, तदनन्तर आवश्यकता समझकर अन्न भोजने करवे ॥ २ ॥

यस्योदकं मधुपर्कं च गां च न मन्त्रवित्प्रतिगृह्णाति गेहे ।
लोभाद्भयादर्थकार्पण्यतो वा तस्यानर्थं जीवितमाहुरार्याः ॥ ३ ॥

वेदवेत्ता बाह्मण जिसके घर दाता के लोभ, भय या कजूसी के कारण जल मधुपर्क और गौ को नहीं स्त्वाकार करता, श्रेष्ठ पुरुष उस गृहस्थ का जीवन व्यर्थ वताया है ।। ३ ।।

चिकित्सकः शक्य कर्तावकीर्णी स्तेनः क्रूरो मद्यपो भ्रूणहा च ।
सेनाजीवी श्रुतिविक्रायकश् च भृशं प्रियोऽप्यतिथिर्नोदकार्हः ॥ ४ ॥

वैद्य, चीर-फाड़ करने वाला (जर्राह), ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट, चोर, क्रूर शराबी, गर्भहत्यारा, सेनाजीवी और वेद विक्रेता – ये यद्यपि पैर धोने के योग्य नहीं हैं तथापि यदि अतिथि होकर आवें तो विशेष प्रिय यानी आदर के योग्य है ॥ ५ ॥ 

अविक्रेयं लवणं पक्वमन्नं दधि क्षीरं मधु तैलं घृतं च ।
तिला मांसं मूलफलानि शाकं रक्तं वासः सर्वगन्धा गुडश् च ॥ ५ ॥

नमक, पका हुआ अत्र, दही, दूध, मधु, तेल, घी, तिल, मांस, फल, मूल, साग, लाल कपड़ा, सब प्रकार की गन्ध और गुड़-इतनी वस्तुएँ बेचने योम्य नहीं हैं ॥ ५ ॥

अरोषणो यः समलोष्ट काञ्चनः प्रहीण शोको गतसन्धि विग्रहः ।
निन्दा प्रशंसोपरतः प्रियाप्रिये चरन्नुदासीनवदेष भिक्षुकः ॥ ६ ॥

जो क्रोध न करने वाला ढेला-पत्थर और सुबर्ण को एक सा समझने वाला, शोकहीन, सन्धि वि्रह से रहित, निन्दा-प्रशसा से शून्य, प्रिय अप्रिय का त्याग करने वाला तथा उदासीन है, जही भिक्षुक (संन्यासी) है॥ ६ ॥

नीवार मूलेङ्गुद शाकवृत्तिः सुसंयतात्माग्निकार्येष्वचोद्यः ।
वने वसन्नतिथिष्वप्रमत्तो धुरन्धरः पुण्यकृदेष तापसः ॥ ७ ॥

जो नीवार (जंगली चावल), कन्द-मूल, इङ्गद (लिसीड़ा) और सागू खाकर नि्वाह करता है, मन को वश में रखता है, अग्निहोत्र करता है, वन में रहकर भी अतिथि सेवा में सदा सावधान रहता है, वही पुण्यात्मा तपस्वी (वानप्रस्थी) श्रेष्ठ माना गया है॥ ७ ॥

अपकृत्वा बुद्धिमतो दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् ।
दीर्घौ बुद्धिमतो बाहू याभ्यां हिंसति हिंसितः ॥ ८ ॥

बुद्धिमान् पुरुष की बुराई करके इस विश्वास पर निश्चित्त न रहे कि मै टूर हूँ। बुद्धिमान की बाँहे बड़ी लम्बी होती हैं, सताया जाने पर वह उन्हीं बाँहों से बदला लेता है ॥ ८ ॥

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ।
विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥ ९ ॥

जो विश्वास का पात्र नहीं है, उसका तो विश्वास करे ही नहीं, किन्तु जो विश्वासपात्र है, उसपर भी अधिक विश्वास न करे । विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है, वह मूल का भी उच्छेद कर डालता है ॥ १॥

अनीर्ष्युर्गुप्तदारः स्यात्संविभागी प्रियंवदः ।
श्लक्ष्णो मधुरवाक्स्त्रीणां न चासां वशगो भवेत् ॥ १० ॥

मनुष्य को चाहिये कि वह ईष्ष्यारहित स्त्रियों का रक्षक, सम्पत्ति का न्यायपूर्वक विभाग करने वाला प्रियवादी, स्वच्छ तथा स्त्रियों के निकट मीटे वचन बोलने वाला हो, परंतु उनके वश में कभी न हो ॥ १० ॥

पूजनीया महाभागाः पुण्याश्च गृहदीप्तयः ।
स्त्रियः श्रियो गृहस्योक्तास्तस्माद्रक्ष्या विशेषतः ॥ ११ ॥

स्त्रीयां घर की लक्ष्मी कही गयी हैं: वे अत्यंत सौभाग्यशालिनी पूजा के योग्य पवित्र तथा धर की शोभा है। अतः इनकी विशेष रुप से रक्षा करनी चाहिये॥ ११ ॥

पितुरन्तःपुरं दद्यान्मातुर्दद्यान्महानसम् ।
गोषु चात्मसमं दद्यात्स्वयमेव कृषिं व्रजेत् ।
भृत्यैर्वणिज्याचारं च पुत्रैः सेवेत ब्राह्मणान् ॥ १२ ॥

अन्तःपुर की रक्षा का कार्य पिता को सौंप दे, रसोई-घर का प्रबंध माता के हाथों में दे दे, गौओं की सेवा में अपने समान व्यक्ति को नियुक्त करे और कृषि का कार्य स्वयं करे ॥ १२॥

अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् ।
तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ॥ १३ ॥

सेवकों द्वारा वाणिज्य-व्यापार और पुत्रो के द्वारा बाह्मणो की सेवा करे । जल से अग्नि, ब्राह्मण से क्षत्रिय और पत्थर से लोहा पेदा हुआ है । इनका तेज सर्वत्र व्याप्त होने पर भी अपने उत्पत्तिस्थान मे शान्त हो जाता है । १३ ।।

नित्यं सन्तः कुले जाताः पावकोपम तेजसः ।
क्षमावन्तो निराकाराः काष्ठेऽग्निरिव शेरते ॥ १४ ॥

अच्छे कुल में उत्पन्न, अग्नि के समान तेजस्वी, क्षमाशील और विकारशुन्य पुरुष सदा काष्ठ में अग्नि की भाँति शान्तभाव से स्थित रहते हैं॥ १४ ॥

यस्य मन्त्रं न जानन्ति बाह्याश्चाभ्यन्तराश् च ये।
स राजा सर्वतश्चक्षुश्चिरमैश्वर्यमश्नुते ॥ १५ ॥

जिस राजा की मन्त्रणा को उसके बहिरङ्ग एवं अन्तरङ्ग सभासद् तक नही जानते सब और दूष्टि रखने वाला वह राजा चिरकाल तक ऐस्वर्य का उपभोग करता है ॥ १५ ॥

करिष्यन्न प्रभाषेत कृतान्येव च दर्शयेत् ।
धर्मकामार्थ कार्याणि तथा मन्त्रो न भिद्यते ॥ १६ ॥

धर्म, काम आर अर्थसम्ब्ध कार्या को करने से पहले न बताने. करके ही दिखावे | ऐसा करने से आपनी मन्त्रणा दुसरो पर प्रकट नहीं होती॥ १६ ॥

गिरिपृष्ठमुपारुह्य प्रासादं वा रहोगतः।
अरण्ये निःशलाके वा तत्र मन्त्रो विधीयते ॥ १७ ॥

पर्वत की चोटी अथवा राजमहलपर चढ़कर एकान्त स्थान में जाकर या जङ्गल में तृण आदि से अनावृत स्थान पर मन्त्रणा करनी चाहिये॥ १७॥

नासुहृत्परमं मन्त्रं भारतार्हति वेदितुम् ॥ १८ ॥

अपण्डितो वापि सुहृत्पण्डितो वाप्यनात्मवान् ॥ १९ ॥

अमात्ये ह्यर्थलिप्सा च मन्त्ररक्षणमेव च ॥ २० ॥

कृतानि सर्वकार्याणि यस्य वा पार्षदा विदुः।
गूढमन्त्रस्य नृपतेस्तस्य सिद्धिरसंशयम् ॥ २१ ॥

भारत ! जो मित्र न हो, मित्र होने पर भी पण्डित न हो, पप्डित होने पर भी जिसका मन बश में न हो, वह अपनी गुप्त मन्त्रणा जानने के योग्य नहीं है। राजा अच्छी तरह परीक्षा किदये बिना किसी को अपना मन्त्री न बनावे क्योंकि धन की प्राप्ति और मन्त्र की रक्षाका भार मन्त्री पर ही रहता है। जिसके धर्म, अर्थ ओर कामविषयक सभी कार्यो को पूर्ण होने के बाद हो सभासद्गण जान पाते हैं, वही राजा समस्त राजाओ में श्रेस्ट हैं। अपने मन्त्र को गुप्त रखने वाले उस राजा को निःसन्देह सिद्धि प्राप्त होती है।॥ १८ – २१ ॥

अप्रशस्तानि कर्माणि यो मोहादनुतिष्ठति ।
स तेषां विपरिभ्रंशे भ्रश्यते जीवितादपि ॥ २२ ॥

जो मोहवश बुरे कर्म करता है, वह उन कार्यो का विपरीत परिणाम होने से अपने जीवन से भी हाथ धो बैठता है॥२२॥ 

कर्मणां तु प्रशस्तानामनुष्ठानं सुखावहम् ।
तेषामेवाननुष्ठानं पश्चात्तापकरं महत् ॥ २३ ॥

उत्तम कर्मो का अनुष्ठान तो सुख देने वाला होता है किन्तु उन्ही का अनुष्ठान न किया जाय तो बह पश्चाताप का कारण माना गया है ॥ २३ ॥

अनधीत्य यथा वेदान्न विप्रः श्राद्धमरहति ।
एवमश्रुतषाडगुण्यो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥ २४ ॥

जैसे वेदों को पढ़े बिना ब्राह्मण श्राद्ध का अधिकारी नहीं होता, उसी प्रकार सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय नामक छः गुणों को जाने बिना कोई गुप्त मन्त्रणा सुनने का अधिकारी नहीं होता ।। २४ ॥

स्थानवृद्ध क्षयज्ञस्य षाड्गुण्य विदितात्मनः ।
अनवज्ञात शीलस्य स्वाधीना पृथिवी नृप ॥ २५ ॥

राजन्! जो सन्धि-विग्रह आदि छः गुणों की जानकारी के कारण प्रसिद्ध है, स्थिति, वृ्धि और ह्रास को जानता है तथा जिसके स्वभाव की सब लोग प्रशंसा करते हैं, उसी राजा के अधीन पृथ्वी रहती है। २५ ॥

अमोघक्रोधहर्षस्य स्वयं कृत्यान्ववेक्षिणः।
आत्मप्रत्यय कोशस्य वसुधेयं वसुन्धरा ॥ २६ ॥

जिसके क्रोध और हर्ष व्यर्थ नहीं जाते जो आवश्यक कर्यो की स्वयं देख-भाल करता है और खजाने की भी स्वयं जानकारी रखता है उसकी पृथ्वी पर्याप्त धन देने वाली ही होती है॥ २६ ॥

नाममात्रेण तुष्येत छत्रेण च महीपतिः।
भृत्येभ्यो विसृजेदर्थान्नैकः सर्वहरो भवेत् ॥ २७ ॥

भूपति को चाहिये कि अपने राजा’ नाम से और राजोचित छन्न’ धारण से सतुष्ट रहे। सेवको को पर्यान्न धन दे, सब अकेले ही न हडप ले ।। २७ ॥

ब्राह्मणो ब्राह्मणं वेद भर्ता वेद स्त्रियं तथा ।
अमात्यं नृपतिर्वेद राजा राजानमेव च ॥ २८ ॥

ब्राह्मण को ब्राह्मण जानता है, स्त्री की उसका पति जानता है, मन्त्री को राजा जानता है और राजा को भी राजा ही जानता है ॥२८॥ 

न शत्रुरङ्कमापन्नो मोक्तव्यो वध्यतां गतः ।
अहताद्धि भयं तस्माज्जायते नचिरादिव ॥ २९ ॥

वश मे आये हुए वध योग्य शत्रु को कभी छोड़ना नहीं चाहिये । यदि अपना बल अधिक न हो तो नम्र होकर उसके पास समय बिताना चाहिये और बल होने पर उसे मार डालना चाहिये; क्यांकि यदि शत्रु मारा न गया तो उससे शीघ्र ही भय उपस्थित होता है ॥ २९ ॥

दैवतेषु च यत्नेन राजसु ब्राह्मणेषु च ।
नियन्तव्यः सदा क्रोधो वृद्धबालातुरेषु च ॥ ३० ॥

देवता, ब्राह्मण, राजा, बुद्ध, बालक और रोगी पर होने वाले क्रोध को प्रयत्न पूर्वक सदा रोकना चाहिये॥ ३० ॥

निरर्थं कलहं प्राज्ञो वर्जयेन्मूढ सेवितम् ।
कीर्तिं च लभते लोके न चानर्थेन युज्यते ॥ ३१ ॥

निरर्थक कलह करना मूर्खो का काम है, बुद्धिमान पुरुष कों इसका त्याग करना चाहिये ऐसा करने से उसे लोक में बश मिलता है और अनर्थ का सामना नहीं करना पड़ता ॥ ३१ ॥

प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थकः ।
न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्ढं पतिमिव स्त्रियः ॥ ३२ ॥

जिसके प्रसन्न होने का कोई फल नहीं तथा ज़िसे का क्रोध भी व्यर्थ होता. ऐसे राजा को प्रजा उसी भाति नहीं चाहती, जैसे स्त्री नपुंसक पति को ॥ ३२ ॥

न बुद्धिर्धनलाभाय न जाड्यमसमृद्धये ।
लोकपर्याय वृत्तान्तं प्राज्ञो जानाति नेतरः ॥ ३३ ॥

बुद्धि से धन प्राप्त होता है और मूर्खता दरिद्रता का कारण है —ऐसा कोई नियम नहीं है । संसार चक्र क वृत्तान्त कों केवल विद्वान् पुरुष ही जानते है, दूसरे लोग नहीं॥ ३३ ॥

विद्या शीलवयोवृद्धान्बुद्धिवृद्धांश्च भारत।
धनाभिजन वृद्धांश्च नित्यं मूढोऽवमन्यते ॥ ३४ ॥

भारत ! मूर्ख मनुष्य विद्या, शील, अवस्था, बुद्धि, धन और कुल मे बड़े माननीय पुरुषों का सदा अनादर किया करता है। ३४ ॥

अनार्य वृत्तमप्राज्ञमसूयकमधार्मिकम्।
अनर्थाः क्षिप्रमायान्ति वाग्दुष्टं क्रोधनं तथा ॥ ३५ ॥

जिसका चरित्र निन्दनीय है, जो मूर्ख, गुणों में दोष देखने वाला अधार्मिक, बुरे वचन बीलने वाला और क्रोधी है, उसके ऊपर शीघ्र ही अनर्थ (सङ्कट) टूट पड़ते हैं ३५ ॥

अविसंवादनं दानं समयस्याव्यतिक्रमः ।
आवर्तयन्ति भूतानि सम्यक्प्रणिहिता च वाक् ॥ ३६ ॥

ठगी न करना, दान देना, बात पर कायम रहना और अच्छी तरह कहीं हुई हित की बात- ये सब सम्पूर्ण भूतों को अपना बना लेते हैं॥ ३६ ॥

अविसंवादको दक्षः कृतज्ञो मतिमानृजुः ।
अपि सङ्क्षीण कोशोऽपि लभते परिवारणम् ॥ ३७ ॥

किसी को भी धोखा न देने वाला चतुर, कृतज्ञ, बुद्धिमान् और सरल राजा खजाना समाप्त हो जाने पर भी सहायकों को पा जाता है, अर्थात् उसे सहायक मिल जाते हैं॥ ३७ ॥

धृतिः शमो दमः शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा ।
मित्राणां चानभिद्रोहः सतैताः समिधः श्रियः ॥ ३८ ॥

धैर्य, मनोनिग्रह, इन्द्रिय संयम, पवित्रता, दया, कोमल वाणी और मित्र से द्रोह न करना-ये सात बातें लक्ष्मी को बढ़ाने वाली है ।॥ ३८ ॥

असंविभागी दुष्टात्मा कृतघ्नो निरपत्रपः ।
तादृङ्नराधमो लोके वर्जनीयो नराधिप ॥ ३९ ॥

राजन ! जो अपने आश्रितो मे धन का ठीक-ठाक बॅटवारा नहीं करता तथा जो दुष्ट, कृत्घन और निर्लज्ज है, एसा राजा इस लोक में त्याग देने- योग्य है ।। ३९ ॥

न स रात्रौ सुखं शेते स सर्प इव वेश्मनि ।
यः कोपयति निर्दोषं स दोषोऽभ्यन्तरं जनम् ॥ ४० ॥

जो स्वयं दोषी होकर भी निर्दोष आत्मीय व्यक्ति को कुपित करता है, वह सर्प युक्त घर में रहने वाले मनुष्य की भाँति रात में सुख से नहीं सो सकता ।। ४० ॥

येषु दुष्टेषु दोषः स्याद्योगक्षेमस्य भारत ।
सदा प्रसादनं तेषां देवतानामिवाचरेत् ॥ ४१ ॥

भारत ! जिनके ऊपर दोषारोपण करने से योग और क्षेम मे बाधा आता हो, उन लोगों को देवता को भाँति सदा प्रसन्न रखना चाहिये |४१ ॥

येऽर्थाः स्त्रीषु समासक्ताः प्रथमोत्पतितेषु च ।
ये चानार्य समासक्ताः सर्वे ते संशयं गताः ॥ ४२ ॥

जो धन आदि पदार्थ स्त्री, प्रमादी, पतित और नीच परुषो के हाथ में सौप दिये जाते हैं, ते संशय में पड़ जाते हैं। ४२ ॥

यत्र स्त्री यत्र कितवो यत्र बालोऽनुशास्ति च ।
मज्जन्ति तेऽवशा देशा नद्यामश्मप्लवा इव ॥ ४३ ॥

राजन् ! जहां का शासन स्त्री, जुआरी और वालक के हाथ में है, बहां के लोग नटी में पत्थर की नाव पर बैठन वाला की भांत विपत्ति के समुद्र में डूब जाते हैं॥ ४३ ॥

प्रयोजनेषु ये सक्ता न विशेषेषु भारत ।
तानहं पण्डितान्मन्ये विशेषा हि प्रसङ्गिनः ॥ ४४ ॥

जो लोग जितना आवश्यक है, उतने हो काम में लगे रहते हैं, अधिक में हाथ नहीं दालते, उन्हें में पडते मानता है क्यांकि अधिक में हाथ डालना संधर्ष का कारण होता है ॥४४।

यं प्रशंसन्ति कितवा यं प्रशंसन्ति चारणाः ।
यं प्रशंसन्ति बन्धक्यो न स जीवति मानवः ॥ ४५ ॥

जुआरी जिसकी तारीफ करत है, चारण जिसकी प्रशसा का, गान करते हैं और वेश्याएँ जिसकी बढ़ाई किया करती है वह मनुष्य जीता ही मुर्दे के समान है।।४५ ॥

हित्वा तान्परमेष्वासान्पाण्डवानमितौजसः ।
आहितं भारतैश्वर्यं त्वया दुर्योधने महत् ॥ ४६ ॥

भारत ! आपने उन महान् धनुर्धर और अत्यन्त तेजस्वी पाण्डवों को छोड़कर यह महान् ऐश्वर्य का भार दुर्याधन के ऊपर रख दिया है ॥ ४६ ॥ 

तं द्रक्ष्यसि परिभ्रष्टं तस्मात्त्वं नचिरादिव ।
ऐश्वर्यमदसंमूढं बलिं लोकत्रयादिव ॥ ४७ ॥

इसलिये आप शीघ्र ही उस ऐश्रर्यमद से मृढ़ दुर्योधन को त्रिभुवन के साम्राज्य से गिरे हुए बालि की भाति इस राज्य से भ्रष्ट होते देखियेगा ॥४७॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरवाक्ये अष्टत्रिंशोऽध्यायः ।। ३८ ॥

धृतराष्ट्र उवाच।
अनीश्वरोऽयं पुरुषो भवाभवे सूत्रप्रोता दारुमयीव योषा।
धात्रा हि दिष्टस्य वशे किलायं तस्माद्वद त्वं श्रवणे घृतोऽहम् ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र ने कहा-विदुर ! यह पुरुष ऐश्वर्य की प्राप्ति और नाश में स्वतनत्र नहीं है । अरह्माने धागे से बँधी हुई कठपूतली की भाँति इसे प्रारब्ध के अधीन कर रखा है; इसलिये तुम कहते चलो, में सुनने के लिये धैर्य धारण किये बैठा हूँ॥ १ ॥

विदुर उवाच।
अप्राप्तकालं वचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन्।
लभते बुद्ध्यवज्ञानमवमानं च भारत ॥ २ ॥

विदुरजी बोले- भारत ! समय के विपरीत यदि बृहस्पति भी कुछ बोले, ता उनका अपमान ही होगा और उनकी बुद्धि को भी अवज्ञा ही होगी ॥ २ ॥ 

प्रियो भवति दानेन प्रियवादेन चापरः।
मन्त्रं मूलबलेनान्यो यः प्रियः प्रिय एव सः ॥ ३ ॥

संसार में कोई मनुष्य दान देते से प्रिय होता है, दुसरा प्रिय वचन बोलने से সरिय होता है और तीसरा मन्त्र तथा औषध के बलेसे प्रिय होता है, कितु जो वास्तव में प्रिय है, वह तो सदा प्रिय ही है । ३ ।

द्वेष्यो न साधुर्भवति न मेधावी न पण्डितः ।
प्रिये शुभानि कर्माणि द्वेष्ये पापानि भारत ॥ ४ ॥

जिससे द्वेष हो जाता है, वह न साधु न विद्वान् और न बुद्धिमान् ही जान पड़ता है। प्रियतम के तो सभी कर्म शुभ ही प्रतीत होते हैं और शत्रु के सभी कर्म पापमय ।। ४ ।।

तस्य त्यागात्. पुत्रशतस्य ।
वृद्धि-रस्यात्यागात् पुत्रशतस्य नाशः ॥ ५ ॥

राजन् । दुर्योधन के जन्म लेते ही मैंने कहा था कि केवल इसी एक पुत्र को तुम त्याग दो। इसके त्याग से सौ पुत्रों की वृद्धि होगी और इसका त्याग न करने से सौ पुत्रों का नाश होगा।॥ ५॥

न वृद्धिर्बहु मन्तव्या या वृद्धिः क्षयमावहेत् ।
क्षयोऽपि बहु मन्तव्यो यः क्षयो वृद्धिमावहेत् ॥ ६ ॥

जो बुद्धि भविष्य में नाश का कारण बने, उसे अधिक महत्त्व नहीं देना वाहिये और उस क्षय का भी बहुत आदर करना चाहिये; जो आगे चलकर अभ्युदय का कारण हो । ६ ॥

न स क्षयो महाराज यः क्षयो वृद्धिमावहेत् ।
क्षयः स त्विह मन्तव्यो यं लब्ध्वा बहु नाशयेत् ॥ ७ ॥

महाराज ! वास्तव र्मे जो क्षय वृद्धि का कारण होता है, वह क्षय ही नहीं है, किंतु उस लाभ को भी क्षय ही मानना चाहिये, जिसे पाने से बहुत से लाभों का नाश हो जाय ।। ७ ।।

समृद्धा गुणतः के चिद्भवन्ति धनतोऽपरे ।
धनवृद्धान्गुणैर्हीनान्धृतराष्ट्र विवर्जयेत् ॥ ८ ॥

! कुछ लोग गुण के घनी होते हैं, और कुछ लोग धन के धनी । जो घन के धनी होते हुए भी गुण के कंगाल हैं, उन्हें सर्वथा त्याग दीजिये।। ८॥

धृतराष्ट्र उवाच ।
सर्वं त्वमायती युक्तं भाषसे प्राज्ञसंमतम् ।
न चोत्सहे सुतं त्यक्तुं यतो धर्मस्ततो जयः ॥ ९ ॥

धृतराष्ट्र ने कहा लोग इसका अनुमोदन करते हैं; यह भी ठीक है कि जिस ओर धर्म होता है, उसी पक्ष की जीत होती है, तो भी में अपने बेटे का त्याग नही कर सकता ।। ९।।

विदुर उवाच ।
स्वभावगुणसम्पन्नो न जातु विनयान्वितः ।
सुसूक्ष्ममपि भूतानामुपमर्दं प्रयोक्ष्यते ॥ १० ॥

विदुरजी बोले-जो अधिक गुणों से सम्पन्न और विनयी है, वह प्राणियों का तनिक भी संहार होते देख उसकी कभी उपेक्षा नहीं कर सकता ।। १० ॥

परापवाद निरताः परदुःखोदयेषु च ।
परस्परविरोधे च यतन्ते सततोथिताः ॥ ११ ॥

स दोषं दर्शनं येषां संवासे सुमहद्भयम् ।
अर्थादाने महान्दोषः प्रदाने च महद्भयम् ॥ १२ ॥

जो दूसरों की निन्दा में ही लगे रहते हैं, दूसरों को दुःख देने और आपस में फूट डालने के लिये सदा उत्साह के साथ प्रयत्न करते हैं, जिसका दर्शन दोष से भरा (अशुभ) है और जिनके साथ रहने में भी बहुत बड़ा खतरा है, ऐसे लोगों से धन लेने में महान् दोष है और उन्हें देने में बहुत बड़ा भय है ॥ ११-१२ ॥

ये पाप इति विख्याताः संवासे परिगर्हिताः ।
युक्ताश्चान्यैर्महादोषैर्ये नरास्तान्विवर्जयेत् ॥ १३ ॥

दूसरों में फूट डालने का जिनका स्वभाव है, जो कामी, निल्लज्ज, शठ और प्रसिद्ध पापी हैं, वे साथ रखने के अयोग्य – निन्दित माने गये हैं । १३ ॥

निवर्तमाने सौहार्दे प्रीतिर्नीचे प्रणश्यति ।
या चैव फलनिर्वृत्तिः सौहृदे चैव यत्सुखम् ॥ १४ ॥

उपर्युक्त दोषों के अतिरिक्त और भी जो महान् दोष हैं उनसे युक्त मनुष्य का त्याग कर देना चाहिये। सौहार्द भाव निवृत्त हो जाने पर नीच पुरुषों का प्रेम नष्ट हो जाता है, उस सौहार्द से होने वाले फल की सिद्धि ओर सुख का भी नाश हो जाता है ।। १४-१/२ ।।

यतते चापवादाय यत्नमारभते क्षये ।
अल्पेऽप्यपकृते मोहान्न शान्तिमुपगच्छति ॥ १५ ॥

फिर वह नीच पुरुष निन्दा करने के लिये यत्न करता है, थोडा भी अपराध हो जाने पर माहवश विनाश के लिये उद्योग आरम्भ कर देता है उसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती॥ १५-१/२ ॥

तादृशैः सङ्गतं नीचैर्नृशंसैरकृतात्मभिः ।
निशाम्य निपुणं बुद्ध्या विद्वान्दूराद्विवर्जयेत् ॥ १६ ॥

वैसे नीच, क्रूर तथा अजितेन्द्रिय पुरुषो से होने वाले सङ्ग पर अपनी बुद्धि से पूर्ण विचार करके विद्वान् पुरुष उसे, दूर से ही त्याग दे ॥ १६-१/२ ।।

यो ज्ञातिमनुगृह्णाति दरिद्रं दीनमातुरम् ।
सपुत्रपशुभिर्वृद्धिं यशश्चाव्ययमश्नुते ॥ १७ ॥

जो अपने कुटुम्बी, दरिद्र, दीन तथा रोगी पर अनुगरह करता है, वह पुत्र और पशुओ से समूद्ध होता और अनन्त कल्याण को अनुभव करता है । १७-१/२ ॥

ज्ञातयो वर्धनीयास्तैर्य इच्छन्त्यात्मनः शुभम् ।
कुलवृद्धिं च राजेन्द्र तस्मात्साधु समाचर ॥ १८ ॥

राजेन्द्र जो लोग अपने भले की इच्छा करते हैं, उन्हें अपने जाती भाइयों को उन्नतिशील बनाना चाहिये; इसलिए आप भली भांति अपने कुल की वृद्धि करें । १८-१/२ ।

श्रेयसा योक्ष्यसे राजन्कुर्वाणो ज्ञातिसत्क्रियाम् ।
विगुणा ह्यपि संरक्ष्या ज्ञातयो भरतर्षभ ॥ १९ ॥

राजन् ! जो अपने कुटुम्बीजनों का सत्कार करता है वह कल्याण का भागी होता है ।। १ १ ।।

किं पुनर्गुणवन्तस्ते त्वत्प्रसादाभिकाङ्क्षिणः ।
प्रसादं कुरु दीनानां पाण्डवानां विशां पते ॥ २० ॥

भरतश्रेष्ठ ! अपने कुटुम्ब के लोग गुणहीन हो तो भी उनकी रक्षा करनी चाहिये। फिर जो आपके कृपाभिलाषी एवं गुणवान् हैं, उनकी तो बात हो क्या है ॥ २० ॥

दीयन्तां ग्रामकाः के चित्तेषां वृत्त्यर्थमीश्वर ।
एवं लोके यशःप्राप्तो भविष्यत्सि नराधिप ॥ २१ ॥

राजन ! आप समर्थ हैं, बीर पाण्डवो पर कृपा कीजिये और उनकी जीविका के लिये कुछ गाँव दे दीजिये ॥ २१ ॥

वृद्धेन हि त्वया कार्यं पुत्राणां तात रक्षणम् ।
मया चापि हितं वाच्यं विद्धि मां त्वद्धितैषिणम् ॥ २२ ॥

नरेश्वर ! ऐसा करने से आपको इस संसार में यश प्राप्त होगा। तात ! आप बुद्ध हैं, इसलिये आपको अपने पुत्रो पर शासन करना चाहिये || २२ ॥

ज्ञातिभिर्विग्रहस्तात न कर्तव्यो भवार्थिना ।
सुखानि सह भोज्यानि ज्ञातिभिर्भरतर्षभ ॥ २३ ॥

भरतश्रेष्ठ ! मुझे भी आपके हित की ही बाते कहनी चाहिये। आप मुझे अपना हितेषी समझो । तात ! शुभ चाहने चाले को अपने जाति-भाइयो के साथ कलह नहीं करना चाहिये; अपितु उनके साथ मिलकर सुख का उपभोग करना चाहिये॥ २३ ॥

सम्भोजनं सङ्कथनं सम्प्रीतिश् च परस्परम् ।
ज्ञातिभिः सह कार्याणि न विरोधः कथं चन ॥ २४ ॥

जाति-भाइयो के साथ परस्पर भोजन, बातचात एवं प्रेम करना हो कर्तव्य है, उनके साथ कभी विरोध नही करना चहिये।। २४ ।।।

ज्ञातयस्तारयन्तीह ज्ञातयो मज्जयन्ति च ।
सुवृत्तास्तारयन्तीह दुर्वृत्ता मज्जयन्ति च ॥ २५ ॥

इस जगत में जाति-भाई ही तारते और डुबाते भी हैं ! उनमें जो सदाचारी हैं वे तो तारते है और दुराचारी डुबा देते हैं।। २५ ।।

सुवृत्तो भव राजेन्द्र पाण्डवान्प्रति मानद ।
अधर्षणीयः शत्रूणां तैर्वृतस्त्वं भविष्यसि ॥ २६ ॥

राजेन्द्र ! आप पाण्डवो के प्रति सद्व्यवहार करें। मानद ! उनसे सुरक्षित होकर आप शत्रुओं के आक्रमण से बचे रहेंगे।। २६ ॥

श्रीमन्तं ज्ञातिमासाद्य यो ज्ञातिरवसीदति ।
दिग्धहस्तं मृग इव स एनस्तस्य विन्दति ॥ २७ ॥

विषैले वाण हाथ में लिये हुए व्याध के पास पहुँचकर जैसे मृग को कष्ट भोगना पड़ता है, उसी प्रकार जो जातीय बन्धु अपने धनी बन्धु के पास पहुंचकर दुःख पाता है; उसके पाप का भागी वह धनी होता हैं । २७ ॥

पश्चादपि नरश्रेष्ठ तव तापो भविष्यति ।
तान्वा हतान्सुतान्वापि श्रुत्वा तदनुचिन्तय ॥ २८ ॥

नरश्रेष्ठ ! आप पाण्डवों को अथवा अपने पुत्रों को मारे गये सुनकर पीछे सन्ताप करेंगे; अतः इस बात का पहले ही विचार कर लीजिये ।। २८ ।।

येन खट्वां समारूढः परितप्येत कर्मणा ।
आदावेव न तत्कुर्यादध्रुवे जीविते सति ॥ २९ ॥

इस जीवन का कोई ठिकाना नहीं है। जिस कर्म के करने से अन्त में खाट पर बैठकर पछताना पड़े, उसको पहले से ही नहीं करना चाहिये॥ २९ ।

न कश्चिन्नापनयते पुमानन्यत्र भार्गवात् ।
शेषसम्प्रतिपत्तिस्तु बुद्धिमत्स्वेव तिष्ठति ॥ ३० ॥

शुक्राचार्य के सिवा दूसरा कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है, जो नीति का उल्लंघन नहीं करता, अतः जो बीत गया सो बीत गया। अब शेष कर्तव्य का विचार आप जैसे बुद्धिमान पुरुषो पर ही निर्भर है॥ ३० ॥

दुर्योधनेन यद्येतत्पापं तेषु पुरा कृतम् ।
त्वया तत्कुलवृद्धेन प्रत्यानेयं नरेश्वर ॥ ३१ ॥

नरेश्वर दुर्योधन ने पहले यदि पांडवों कि प्रति यह अपराध किया आप इस कुल में बड़े-बूढ़े हैं, आपके द्वारा उसका मार्जन हो जाना चाहिये॥ ३१ ॥

तांस्त्वं पदे प्रतिष्ठाप्य लोके विगतकल्मषः ।
भविष्यसि नरश्रेष्ठ पूजनीयो मनीषिणाम् ॥ ३२ ॥

नरश्रेष्ठ । यदि आप उनको राज पद पर स्थापित कर देंगे तो संसार में आपका कलङ्क धुल जायगा और आप बुद्धिमान् पुरुषों के माननीय हो जायेगे॥ ३२ ॥

सुव्याहृतानि धीराणां फलतः प्रविचिन्त्य यः ।
अध्यवस्यति कार्येषु चिरं यशसि तिष्ठति ॥ ३३ ॥

जो धीर पुरुषों के वचनो के परिणाम पर विचार करके उन्हें कार्य रूप में परिणत करता है, वह चिरकाल तक यश का भागी बना रहता है। ३३ ।

असम्यगुपयुक्तं हि ज्ञानं सुकुशलैरपि ।
उपलभ्यं चाविदितं विदितं चाननुष्ठितम् ॥ ३४ ॥

कुशल विद्वानों के द्वारा भी उपदेश किया हुआ ज्ञान व्यर्थ है, यदि उससे कर्तव्य का ज्ञान न हुआ अथवा ज्ञान होने पर भी उसका अनुष्ठान न हुआ। ३४ ।।

पापोदयफलं विद्वान् यो नारभति वर्धते |
यस्तु पूर्वकृतं पापमविमृश्यानुवर्तते ।
अगाधपड्के दुर्मेंधा विषमे विनिपात्यते ॥ ३५ ॥

जो विद्वान पाप-रूप फल देने वाले कर्मों का आरग्भ नहीं करता, वह बढ़ता है, किन्तु जो पूर्व में किये हुए पापो का विचार करके उन्हीं का अनुसरण करता है, वह खोटी बुद्धि वाला मनुष्य अगाध कीचड से भरे हुए बीहड़ नरक में गिराया जाता है।। ३।।

मन्त्रभेदस्य षट् प्राज्ञो द्वाराणीमानि लक्षयेत् ।
अर्थसंततिकामश्च रक्षेदेतानि नित्यशः ॥ ३६ ॥

मदं स्वप्नमविज्ञानमाकारं चात्मसम्भवम् ।
दुष्टामात्येषु विश्रम्भं दूताच्चाकुशलादपि ॥ ३७ ॥

बुद्धिमान् पुरुष मन्त्रभेद के इन छः द्वारों को जाने और धन को रक्षित रखने की इच्छा से इन्हें सदा बन्द रखे- नशे का सेवन, निद्रा, आवश्यक बात की जानकारी न रखना, अपने नेत्र, मुख आदि का विकार, दुष्ट मन्त्रियों में विश्वास और मूर्ख दूत पर भी भरोसा रखना॥ ३६-३७ ॥

द्वाराण्येतानि यो ज्ञात्वा संवृणोति सदा नृप।
त्रिवर्गाचरणे युक्तः स शत्रूनधितिष्ठति ॥ ३८ ॥

राजन् ! जो इन द्वारों को जानकर सदा बंद किये रहता है वह अर्थ, धर्म और काम के सेवन में लगा रहकर शत्रुऑ को वश में कर लेता है ।। ३८ ॥

न वै श्रुतमविज्ञाय वृद्धाननुपसेव्य वा !
धर्मार्थौ वेदितुं शक्यौ बृहस्पतिसमैरपि ॥ ३९ ॥

बृहस्पति के समान मनुष्य भी शास्त्रज्ञान अथवा बृद्धों की सेवा किये बिना धर्म और आर्थ का ज्ञान नही प्राप्त कर सकता ।। ३९ ॥

नष्टं समुद्रे पतितं नष्टं वाक्यमश्रृण्वति ।
अनात्मनि श्रुते नष्टं नष्टं हुतमनग्निकम् ॥ ४० ॥

समुद्र में गिरी हुई वस्तु नषट हो जाती है, जो सुनता नहीं उससे कही हुई बात नष्ट हो जाती है, अजितेन्दव पुरुष का शास्त्रज्ञान और रास्ते मे किया हुआ हवन भी नष्ट ही है।। ४० ।

मत्या परीक्ष्य मेधावी वुद्ध्या सम्पाद्य चासकृत्।
श्रुत्वा दृष्ट्वाथ विज्ञाय प्राज्ञैमैत्रीं समाचरेत् ॥ ४१ ॥

बुद्धिमान पुरुष बुद्धि से जाँच कर अपने अनुभव से बारम्बार उनकी योग्यता का निस्चय करें, किर दुसरो से सुनकर और स्वयं देखकर भलीभांति विचार करके विद्वानों के साथ मित्रता करें । ४१ ।

अवृत्तिं विनयो हन्ति हन्त्यनर्थं पराक्रमः ।
हन्ति नित्यं क्षमा क्रोधमाचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ ४२ ॥

विनयभाव अपयश का नाश करता पराक्रम अनर्थ को दूर करता है, क्षमा सदा ही क्रोध का नाश करती है और सदाचार कुलक्षरण का अन्त करता है ॥४2 ॥

परिच्छदेन क्षत्रेण वेश्मना परिचर्यया ।
परीक्षेत कुलं राजन्भोजनाच्छादनेन च ॥ ४३ ॥

राजन ! नाना प्रकार की भोगसामग्री, माता, घर, स्वागत-सत्कार के ढंग और भोजन तथा वस्त्र के द्वारा कुल की परीक्षा करे ॥ ४३ ॥

उपस्थितस्य कामस्य प्रतिवादो न विद्यते ।
अपि निर्मुक्तदेहस्य कामरक्तस्य किं पुनः ॥ ४४ ॥

देहाभिमान से रहित पुरुष के पास भी यदि न्याययुक्त पदार्थ स्वतः उपस्थित हो तो वह उसका विरोध नहीं करता, फिर कामासक्त मनुष्य के लिये तो कहना ही क्या है ? । ४४ ॥।

प्राज्ञोपसेविनं वैद्यं धार्मिकं प्रियदर्शनम् ।
मित्रवन्तं सुवाक्यं च सुहृदं परिपालयेत् ॥ ४५ ॥

जो विद्वानों की सेवा में रहने वाला वैद्य, घार्मिक, देखने में सुन्दर, मित्रो से युक्त तथा मधुरभाषी हो, ऐसे सुहृद् की सर्वथा रक्षा करनी चाहिये ।॥ ४५ ॥।

दुष्कुलीनः कुलीनो वा मर्यादां यो न लङ्घयेत् ।
धर्मापेक्षी मृदुह्हीमान् स कुलीनशताद् वरः ॥ ४६ ॥

अधम कुल में उत्पन्न हुआ हो या उत्तम कुल में- जो मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, धर्म की अपेक्षा रखता है, कोमल स्वभाव वाला तथा सलज है, वह सेकड़ो कुलीनों से बढ़कर है। ४६ ॥

ययोश्चित्तेन वा चित्तं नैभृतं नैभृतेन वा ।
समेति प्रज्ञया प्रज्ञा तयोर्मैत्री न जीर्यते ॥ ४७ ॥

जिन दो मनुष्यों का चित्त से चित्त, गुप्त रहस्य से गुप्त रहस्य और बुद्धि से बुद्धि मिल जाती है, उनकी मित्रता कभी नष्ट नहीं होती ॥४७ ॥

दुर्बुद्धिमकृतप्रज्ञं छन्नं कूपं तृणैरिव ।
विवर्जयीत मेधावी तस्मिन्मैत्री प्रणश्यति ॥ ४८ ॥

मेधावी पुरुष को चाहिये कि टुर्बुद्धि एवं विचारशक्ति से हीन पुरुष का तुण से ढके हुए कुए की भाँति परित्याग कर दे, वयोंकि उसके साथ की हुई मित्रता नष्ट हो जाती है । ४८ ॥

अवलिप्तेषु मूर्खेषु रौद्रसाहसिकेषु च ।
तथैवापेत धर्मेषु न मैत्रीमाचरेद्बुधः ॥ ४९ ॥

विद्वान् पुरुष को उचित है कि अभिमानी, मुर्ख, क्रोधी, साहसिक और धर्महीन पुरुषों के साथ मित्रता न करे ।।४९ ।।

कृतज्ञं धार्मिकं सत्यमक्षुद्रं दृढभक्तिकम् ।
जितेन्द्रियं स्थितं स्थित्यां मित्रमत्यागि चेष्यते ॥ ५० ॥

मित्र तो ऐसा होना चाहिये, जो कतज्ञ, घार्मिक, सत्यवादी उद्दार दढ़ अनुराग रखने वाला, जितेन्द्रिय, मर्यादा के भीतर रहनेवाला और मैत्री का त्याग न करने वाला हो ।। ५० ।।

इन्द्रियाणामनुत्सर्गो मृत्युना न विशिष्यते ।
अत्यर्थं पुनरुत्सर्गः सादयेद्दैवतान्यपि ॥ ५१ ॥

इन्द्रियाँ को सर्वथा रोक रखना तो मृत्यु से भी बढ़कर कटिन है,और उ्हें विलकुल खुली छोड़ देना देवताओं का भी नाश कर देता है ।| ५१ ।॥।

मार्दवं सर्वभूतानामनसूया क्षमा धृतिः ।
आयुष्याणि बुधाः प्राहुर्मित्राणां चाविमानना ॥ ५२ ॥

सम्पूर्ण प्राणियो के प्रति कोमलता का भव, गुणां में दोष में दखना, छमा, हेय] और मित्रो का अपमान न करना— ये सब गुण आयु को बढाने वाले हैं-ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं। ५२ ॥

अपनीतं सुनीतेन योऽर्थं प्रत्यानिनीषते ।
मतिमास्थाय सुदृढां तदकापुरुष व्रतम् ॥ ५३ ॥

जो अन्याय से नष्ट हुए धन को स्थिर बुद्धि का आश्रय ले अच्छी नीति से पुनः लौटा लाने की इच्छा करता है, वह वीर पुरुषों का-सा आचरण करता है ॥ ५३ ।।

आयत्यां प्रतिकारज्ञस्तदात्वे दृढनिश्चयः ।
अतीते कार्यशेषज्ञो नरोऽर्थैर्न प्रहीयते ॥ ५४ ॥

जो आने वाले दुःख को रोकने का उपाय जानता है, वर्तमानकालिक कर्तव्य के पालन में दढ़ निश्चय रखने वाला है और अतीत काल में जो कर्तव्य शेष रह गया है, उसे भी जानता है, वह मनुष्य कभी अर्थ से हीन नहीं

कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते ।
तदेवापहरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत् ॥ ५५ ॥

मनुष्य मन,वाणी और कर्म से जिसका निरन्तर सेवन करता है, चह कार्य उस पुरुष को अपनी ओर खींच लेता है। इसलिये सदा कल्याणकारी कार्यो को ही करें।। ५५ ।।

मङ्गलालम्भनं योगः श्रुतमुत्थानमार्जवम् ।
भूतिमेतानि कुर्वन्ति सतां चाभीक्ष्ण दर्शनम् ॥ ५६ ॥

माङ्गलिक पदार्थों का स्पर्श, चित्तवृत्तिया का निरोध, शास्त्र का अभ्यास, और सत्पुरुषों का बारम्बार दर्शन- ये सब उद्योगशीलता, कल्याणकारी हैं। ५६ ।।

अनिर्वेदः श्रियो मूलं दुःखनाशे सुखस्य च ।
महान्भवत्यनिर्विण्णः सुखं चात्यन्तमश्नुते ॥ ५७ ॥

उद्योग में लगे रहना उससे बिरक्त न होना धन, लाभ और कल्याण का मूल है। इसलिये उद्योग न छोड़ने वाला मनुष्य महान् हो जाता है और अनन्त सुख का उपभोग करता है॥ ५७ ॥

नातः श्रीमत्तरं किं चिदन्यत्पथ्यतमं तथा ।
प्रभ विष्णोर्यथा तात क्षमा सर्वत्र सर्वदा ॥ ५८ ॥

तात । समर्थ पुरुष के लिये सब जगह और सब समय में क्षमा के समान हित कारक और अत्यन्त श्री सम्पन्न बनाने वाला उपाय दूसरा नहीं माना गया

क्षमेदशक्तः सर्वस्य शक्तिमान्धर्मकारणात् ।
अर्थानर्थौ समौ यस्य तस्य नित्यं क्षमा हिता ॥ ५९ ॥

जो शक्तिहीन है, वह तो सब पर क्षमा करे ही, जो शक्तिमान् है, वह भी धर्म के लिये क्षमा करे तथा जिसकी दृष्टि में अर्थ और अनर्थ दोनों समान हैं, उसके लिये तो क्षमा सदा ही हितकरिणी होती है॥ ९ ॥

यत्सुखं सेवमानोऽपि धर्मार्थाभ्यां न हीयते ।
कामं तदुपसेवेत न मूढ व्रतमाचरेत् ॥ ६० ॥

जिस सुख का सेवन करते रहने पर भी मनुष्य धर्म और अर्थ से भ्रष्ट नहीं होता, उसका यथेष्ट सेवन करे, किन्तु मूढवत (आसक्ति एवं अन्याय पूर्वक विषय सेवन) न करे ।। ६० ॥

दुःखार्तेषु प्रमत्तेषु नास्तिकेष्वलसेषु च ।
न श्रीर्वसत्यदान्तेषु ये चोत्साह विवर्जिताः ॥ ६१ ॥

जो दुःख से पीड़ित, प्रमादी, नास्तिक, आलसी, अजितेन्द्रिय और उत्साह रहित है, उनके बही लक्छमी का वास नहीं होता॥ ६१।।

आर्जवेन नरं युक्तमार्जवात्सव्यपत्रपम् ।
अशक्तिमन्तं मन्यन्तो धर्षयन्ति कुबुद्धयः ॥ ६२ ॥

दुर्बुद्धि वाले लोग सरलता से युल और सरलता के ही कारण लज्जाशील मनुष्य को अशक्त मानकर उसका तिरस्कार करते हैं॥ ६२ ।॥

अत्यार्यमतिदातारमतिशूरमतिव्रतम् ।
प्रज्ञाभिमानिनं चैव श्रीर्भयान्नोपसर्पति ॥ ६३ ॥

अत्यन्त श्रेष्ठ, अतिशय दानी अतीव शूरबीर, अधिक व्रत-नियमों का पालन करने वाले और बुद्धि के घमण्ड में चूर रहने वाले मनुष्य के पास लक्ष्मी भयके मारे नहीं जाती ॥ ६३ ॥

न चातिगुणवत्स्वेषा नात्यन्तं निर्गुणेषु च ।
नैषा गुणान् कामयते नैर्गुण्यात्नानुरज्यते ।
उन्मत्ता गौरिवान्धा श्रीः क्कचिदेवावतिष्ठते ॥ ६४ ॥

राजलक्ष्गी न तो अल्यन्त गुणवानों के पास रहती है और न बहुत निगुणों के पास। यह न तो बहुत-से गुणो को चाहती है और न गुणहीन के प्रति ही अनुराग रस्खती है। उत्तम गौ की भाँति यह अन्धी लक्ष्मी कहीं- कहीं ही ठहरती हैं ।। ६४ ॥

अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवृत्तफलं श्रुतम् ।
रतिपुत्र फला दारा दत्तभुक्त फलं धनम् ॥ ६५ ॥

वेदों का फल है अमिहोत्र करना, शास्त्राध्ययन को फल है सुशीलता और सदाचार, स्त्री का फल है रति-सुख और पुत्र की प्रापति तथा धन का फल है दान और उपभोग ।। ६५ ।॥

अधर्मोपार्जितैरर्थैर्यः करोत्यौर्ध्व देहिकम् ।
न स तस्य फलं प्रेत्य भुङ्क्तेऽर्थस्य दुरागमात् ॥ ६६ ॥

जो अधर्म के द्वारा कमाये हुए धन से परलोक साधक यज्ञादि कर्म करता है, वह मरने के पश्चात् उसके फल का नहीं पाता, क्योकि उसका धन बुरे रास्ते से आया होता है। ६६ ॥।

कानार वनदुर्गेषु कृच्छ्रास्वापत्सु सम्भ्रमे ।
उद्यतेषु च शस्त्रेषु नास्ति शेषवतां भयम् ॥ ६७ ॥

घोर जंगल में, दुर्गम मार्ग मे, कठिन आपत्ति के समय, घबराहट में और प्रहार के लिये शत्रु उठे रहने पर भी सत्त्व (मनोबल) सम्पन्न पुरुषों को भय नहीं होता ॥ ६७ ॥

उत्थानं संयमो दाक्ष्यमप्रमादो धृतिः स्मृतिः ।
समीक्ष्य च समारम्भो विद्धि मूलं भवस्य तत् ॥ ६८ ॥

उद्मोग, संयम, दुक्षता, सावधानी, धैर्य, स्मृति और सौच-विचारकर इन्हें उन्नति का मूलमन्त्र समझिये ॥ ६८॥

तपोबलं तापसानां ब्रह्म ब्रह्मविदां बलम् ।
हिंसा बलमसाधूनां क्षमागुणवतां बलम् ॥ ६९ ॥

तपस्वियों का बल है तप, वेदवेत्ताओं का बल है वेद, असाधुओं का बल है हिसा और गुणवानो का बल है क्षमा ॥ ६९ ॥

अष्टौ तान्यव्रतघ्नानि आपो मूलं फलं पयः ।
हविर्ब्राह्मण काम्या च गुरोर्वचनमौषधम् ॥ ७० ॥

जल, मूल, फल, दूध, घी, ब्राह्मण की इच्छापूर्ति, गुरु का वचन और ओषध-ये आठ व्रत के नाशक नहीं होते॥ ७० ॥

न तत्परस्य सन्दध्यात्प्रतिकूलं यदात्मनः ।
सङ्ग्रहेणैष धर्मः स्यात्कामादन्यः प्रवर्तते ॥ ७१ ॥

जो अपने प्रतिकूल जान पड़े, उसे दूसरो के प्रति भी न करे। थोड़े में धर्म का यही स्वरूप है। इसके विपरीत जिसमें कामना से प्रवृत्ति होती है, बह तो अधर्म हैं ७१ ॥

अक्रोधेन जयेत्क्रोधमसाधुं साधुना जयेत् ।
जयेत्कदर्यं दानेन जयेत्सत्येन चानृतम् ॥ ७२ ॥

अक्रोध से क्रोध को जीते, असाधु को सद्व्यवहार से वश में करे, कृपण को दान से जीते और झूठ पर सत्य से विजय प्राप्त करे ।। ७२ ॥

स्त्री धूर्तकेऽलसे भीरौ चण्डे पुरुषमानिनि ।
चौरे कृतघ्ने विश्वासो न कार्यो न च नास्तिके ॥ ७३ ॥

स्त्री, धूर्त, आलसी, डरपोक, क्रोधी, पुरुषत्व के अभिमानी, चोर, और नास्तिक का विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ ७३ ॥

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि सम्प्रवर्धन्ते कीर्तिरायुर्यशोबलम् ॥ ७४ ॥

जो नित्य गुरुजनों को प्रणाम करता है और वृद्ध पुरुषों की सेवा में लगा रहता है, उसकी कीर्ति, आयु, यश और बल-ये चारों बढ़ते है ॥ ७४ ॥

अतिक्लेशेन येऽर्थाः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेण च ।
अरेर्वा प्रणिपातेन मा स्म तेषु मनः कृथाः ॥ ७५ ॥

जो धन अत्यन्त क्लेश उठाने से, धर्म का उल्लङ्गन करने से अधवा शत्रु के सामने सिर झुकाने से प्राप्त होता हो, उसमें आप मन न लगाइये ॥ ७५॥

अविद्यः पुरुषः शोच्यः शोच्यं मिथुनमप्रजम् ।
निराहाराः प्रजाः शोच्याः शोच्यं राष्ट्रमराजकम् ॥ ७६ ॥

विद्याहीन पुरुष, सन्तानोत्पत्ति रहित स्त्री प्रसंग, आहार न पाने वाली प्रजा और बिना राजा के राष्ट्र के लिये शोक करना चाहिये ॥ ७६ ॥

अध्वा जरा देहवतां पर्वतानां जलं जरा ।
असम्भोगो जरा स्त्रीणां वाक्षल्यं मनसो जरा ॥ ७७ ॥

अधिक राह चलना देहधारियों के लिये दुःखरूप बुढ़ापा है, बराबर पानी गिरना पर्वतों का बुढ़ापा है, सम्भोग से वश्चित रहना स्त्रियों के लिये बुढ़ापा हैं और वचनरूपी बाणों का आघात मन के लिये बुढ़ापा है॥ ७७ ॥

अनाम्नाय मला वेदा ब्राह्मणस्याव्रतं मलम् ॥ ७८ ॥
कौतूहलमला साध्वी विप्रवास मलाः स्त्रियः ॥ ७९ ॥

अभ्यास न करना वेदो का मल है, ब्राह्मणोचित नियमो का पालन न करना ब्राह्मण का मल है, बाहीक देश (बलख-बुखारा) पृथ्वी का मल है तथा झूठ बोलना पुरुष का मल है, क्रीड़ा एवं हास-परिहास की उत्सुकता पतिव्रता स्त्री का मल है और पति के बिना परदेश में रहना स्त्री मात्र का मल है ७८-७९ ॥

सुवर्णस्य मलं रूप्यं रूप्यस्यापि मलं त्रपु ।
ज्ञेयं त्रपु मलं सीसं सीसस्यापि मलं मलम् ॥ ८० ॥

सोने का मल है चाँदी, चाँदी का मल है राँगा, राँगे का मल है सीसा और सीसा का भी मल है मल ॥ ८० ॥

न स्वप्नेन जयेन्निद्रां न कामेन स्त्रियं जयेत् ।
नेन्धनेन जयेदग्निं न पानेन सुरां जयेत् ॥ ८१ ॥

सोकर नींद को जीतने का प्रयास न करे। कामोपभाग के द्वारा सत्री को जीतने की इच्छा न करे । लकड़ी डालकर आग को जीतने की आशा न और अधिक पीकर मदिरा पीने की आदत को जीतने का प्रयास न करे ॥ ८१ ॥

यस्य दानजितं मित्रममित्रा युधि निर्जिताः ।
अन्नपानजिता दाराः सफलं तस्य जीवितम् ॥ ८२ ॥

जिसका मित्र धन-दान के द्वारा वश में आ चुका है, शत्रु युद्ध में जीत लिये गये हैं और स्त्रियाँ खान-पान के द्वारा वशीभूत हो चुकी हैं, उसका जीवन सफल है ।।८२ |

सहस्रिणोऽपि जीवन्ति जीवन्ति शतिनस्तथा ।
धृतराष्ट्रं विमुञ्चेच्छां न कथं चिन्न जीव्यते ॥ ८३ ॥

जिनके पासं हजार (रुपये) हैं, वे भी जीवित हैं तथा जिनके पास सौ (रुपये) हैं, वे भी जीवित हैं, अतः महाराज धूतराष्ट्र ! आप अधिक का लोभ छोड़ दीजिये, इससे भी किसी तरह जीवन रहेगा ही ॥ ८३ ॥|

यत्पृथिव्यां व्रीहि यवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
नालमेकस्य तत्सर्वमिति पश्यन्न मुह्यति ॥ ८४ ॥

इस पृथिवी पर जो भी धान, जो, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब-के सब एक पुरुष के लिये भी पूरे नहीं हैं—ऐसा विचार करने वाला गनुष्य मोह में नहीं पड़ता ।८४ ।।

राजन्भूयो ब्रवीमि त्वां पुत्रेषु सममाचर ।
समता यदि ते राजन्स्वेषु पाण्डुसुतेषु च ॥ ८५ ॥

राजन् ! मैं, फिर कहता हूँ, यदि आपका अपने पुत्रों और पाण्डवों में समान भाव है तो उन सभी पुत्रों के साथ एक सा बर्ताव कीजिये ।॥ ८५ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरवाक्ये एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ३९ ॥

योऽभ्यर्थितः सद्भिरसज्जमानः करोत्यर्थं शक्तिमहापयित्वा।
क्षिप्रं यशस्तं समुपैति सन्तमलं प्रसन्ना हि सुखाय सन्तः ॥ १ ॥

विदुरजी कहते हैं-जो सज्जन पुरुषों से आदर पाकर आसक्तिरहित हो अपनी शक्ति के अनुसार अर्थ-साधन करता रहता है, उस श्रेष्ठ पुरुष को शीघ्र ही सुयश की प्राप्ति होती है, क्योंकि सन्त जिस पर प्रसन्न होते हैं, वह सदा सुखी रहता है ॥ १ ॥ 

महान्तमप्यर्थमधर्मयुक्तं यः सन्त्यजत्यनुपाक्रुष्ट एव।
सुखं स दुःखान्यवमुच्य शेते जीर्णां त्वचं सर्प इवावमुच्य ॥ २ ॥

जो अधर्म से उपार्जित महान् धनराशि को भी उसकी ओर आकृष्ट हुए बिना ही त्याग देता है, वह जैसे साँप आपनी पुरानी केचुल को छोड़ता है, उसी प्रकार दुःखों से मुक्त हो सुखपूर्वक शयन करता है ।। २ ।। 

अनृतं च समुत्कर्षे राजगामि च पैशुनम् ।
गुरोश्चालीक निर्बन्धः समानि ब्रह्महत्यया ॥ ३ ॥

झठ बोलकर उन्नति करना, राजा के पास तक चुगली करना, गुरू से भी मिथ्या आग्रह करना-ये तीन कार्य ब्रह्महत्या के समान हैं ।। ३ ॥ 

असूयैक पदं मृत्युरतिवादः श्रियो वधः ।
अशुश्रूषा त्वरा श्लाघा विद्यायाः शत्रवस्त्रयः ॥ ४ ॥

गुणों में दोष देखना एकदम मृत्यु के समान है । कठोर बोलना या निन्दा करना लक्ष्मी का वध है। सुनने की इच्छा का अभाव या सेवा का अभाव, उतावलापन और आत्मप्रशंसा-ये तीन विद्या के शत्रु हैं ।। ४ ॥ 

आलस्यं मदमोहौ च चापलं गोष्ठिरव च।
स्तब्धता चाभिमानित्यं तथात्यागित्वमेव च।
एते वै सप्त दोषाः स्युः सदा विद्यार्थिनां मताः ॥ ५ ॥

स्तब्धता आलस्य, मद-मोह, चञ्चलता, गोष्ठी, उद्दण्डता, अभिमान और लोभ-ये सात विद्यार्थियों के लिये सदा ही दोष माने गये हैं ॥ ५ ॥ 

सुखार्थिनः कुतो विद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् ।
सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी वा सुखं त्यजेत् ॥ ६ ॥

सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ से मिले ? विद्या चाहने वालो के लिये सुख नहीं है। सुख की चाह हो तो विद्या को छोड़े और विद्या चाहे तो सुख का त्याग करे ।। ६ ।। 

नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः ।
नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना ॥ ७ ॥

ईधन से आग की, नदियों से समुद्र की, समस्त प्राणियों से मृत्यु की और पुरुषों से कुलटा स्त्री की कभी तृप्ति नहीं होती ॥ ७ ॥ 

आशा धृतिं हन्ति समृद्धिमन्तकः क्रोधः श्रियं हन्ति यशः कदर्यता ।
अपालनं हन्ति पशूंश्च राजन्न् एकः क्रुद्धो ब्राह्मणो हन्ति राष्ट्रम् ॥८॥

आशा थेर्ये को, यमराज समृद्धि को, क्रोध लक्ष्मी को, कृपणता यश को और सार-संभाल का अभाव पशुओं को नष्ट कर देता है। इधर एक ही बाह्मण यदि क्रुद्ध हो जाय तो सम्पूर्ण राष्ट्र का नाश. कर देता है ॥ ८ ॥ 

अजश्च कांस्यं च रथश्च नित्यं मध्वाकर्षः शकुनिः श्रोत्रियश् च ।
वृद्धो ज्ञातिरवसन्नो वयस्य एतानि ते सन्तु गृहे सदैव ॥ ९ ॥

बकरियाँ, काँसे का पात्र, चाँदी, मधु, अर्क किचन का यन्त, पक्षी, वेदवेत्ता ब्राह्मण, बूढ़ा, कुटुम्बी और विपत्तिप्ग्रस्त कुलीन पुरुष— ये सब आप के घर में सदा मौजूद रहे ।। १ ।। 

अजोक्षा चन्दनं वीणा आदर्शो मधुसर्पिषी ।
विषमौदुम्बरं शङ्खः स्वर्णं नाभिश्च रोचना ॥ १० ॥

गृहे स्थापयितव्यानि धन्यानि मनुरब्रवीत् ।
देव ब्राह्मण पूजार्थमतिथीनां च भारत ॥ ११ ॥

भारत ! मनुजी ने कहा है कि देवता, ब्राह्मण तथा आतिथियों की पुजा के लिये बकरी, बैल, चन्दन, वीणा, दर्पण, मधु, घी, जल, ताँबे के बर्तन शंख सालग्राम और गोरोचन — ये सब वस्तुएँ घर पर रखनी चाहिये ॥ १० ॥ 

इदं च त्वां सर्वपरं ब्रवीमि पुण्यं पदं तात महाविशिष्टम् ।
न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः ॥ १२ ॥

तात । आब में तुम्हें विहुत ही महत्वपूर्ण एवं सर्वोपरि पुण्य जनक बात बता रहा हूँ — कामना से, भय से, लोभ से तथा इस जीवन के लिये भी कभी धर्म का त्याग न करें ॥ १२ ॥

नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये नित्यो जीवो धातुरस्य त्वनित्यः।

त्यक्त्वानित्यं प्रतितिष्ठस्व नित्ये सन्तुष्य त्वं तोष परो हि लाभः ॥ १३ ॥ 

धर्म नित्य है, किन्तु सुख-दुःख अनित्य हैं, जीव नित्य है, पर इसका कारण (अविद्या) अनित्य हैं। आप अनित्य को छोड़कर नित्य में स्थित होइये और सन्तोष धारण कीजिये; क्योंकि सन्तोष ही सबसे बड़ा लाभ है ॥ १३ ॥ 

महाबलान्पश्य मनानुभावान् प्रशास्य भूमिं धनधान्य पूर्णाम् ।
राज्यानि हित्वा विपुलांश्च भोगान् गतान्नरेन्द्रान्वशमन्तकस्य ॥ १४ ॥

धन-धान्यादि से परिपूर्ण पृथ्वी का शासन करके अन्त में समस्त राज्य और विपुल भोगों को यहीं छोड़कर यमराज के वश में गये हुए बड़े-बड़े बलवान् एवं महानुभाव राजाओं की ओर दृष्टि डालिये ॥ १४ ॥ 

मृतं पुत्रं दुःखपुष्टं मनुष्या उत्क्षिप्य राजन्स्वगृहान्निर्हरन्ति ।
तं मुक्तकेशाः करुणं रुदन्तश् चितामध्ये काष्ठमिव क्षिपन्ति ॥ १५ ॥

राजन् ! जिसको बड़े कष्ट से पाला-पसा था, वह पुत्र जब मर जाता है तो मनुष्य उसे उठाकर तुरत अपने घर से बाहर कर देते हैं। पहरे तो इसके लिये बाल छितराये करुण स्वर में विलाप करते हैं, फिर साधारण काठ की भाँति उसे जलती चिता में झाँक देते हैं ।। १५ ॥ 

अन्यो धनं प्रेतगतस्य भुङ्क्ते वयांसि चाग्निश्च शरीरधातून् ।
द्वाभ्यामयं सह गच्छत्यमुत्र पुण्येन पापेन च वेष्ट्यमानः ॥ १६ ॥

मरे हुए मनुष्य का धन दूसरे लोग भागते हैं, उसके शरीर की धातुऑ को पक्षी खाते हैं या आग जलाती है। यह मनुष्य पुण्य-पाप से बैंधा हुआ इन्हीं दोनों के साथ पर लोक में गमन करता है ।। १६ ॥ 

उत्सृज्य विनिवर्तन्ते ज्ञातयः सुहृदः सुताः ।
अपुष्पानफलान् वृक्षान् यथा तात पतत्रिणः ॥ १७ ॥

तात ! बिना फल-फूल के वृक्ष को जैसे पक्षी छोड़ देते हैं, उसी प्रकार उस प्रेत को उसके जाति वाले, सुहृद् और पुत्र चिता में छोड़कर लौट आते हैं ॥ १७ ॥ 

अग्नौ प्रास्तं तु पुरुषं कर्मान्वेति स्वयं कृतम् ।
तस्मात्तु पुरुषो यत्राद् धर्म संचिनुयाच्छनैः ॥ १८ ॥

अग्नि में डाले हुए उस पुरुष के पीछे. तो केवल उसका अपना किया हुआ बुरा या भला कर्म ही जाता है । इसलिये पुरुष को चाहिये कि वह धीरे-धीरे प्रयत्नपूर्वक धर्म का ही संग्रह करे ॥ १८॥ 

अस्माल्लोकादूर्ध्वममुष्य चाधो महत्तमस्तिष्ठति ह्यन्धकारम् ।
तद्वै महामोहनमिन्द्रियाणां बुध्यस्व मा त्वां प्रलभेत राजन् ॥ १९ ॥

इस लोक और परलोक से ऊपर और नीचे तक सर्वेत्र अज्ञान रूप महान् अन्धकार फेला हुआ है, बह इन्द्रियों को महान् मोहमें डालने वाला है। राजन् ! आप इराको जान लीजिये, जिससे यह आपका स्पर्श न कर सके ॥ १९ ॥ 

इदं वचः शक्ष्यसि चेद्यथावन् निशम्य सर्वं प्रतिपत्तुमेवम् ।
यशः परं प्राप्स्यसि जीवलोके भयं न चामुत्र न चेह तेऽस्ति ॥ २० ॥

मेरी इस बात को सुनकर यदि आप सब ठीकि-ठीक समझ सकंगे तों इस मनुष्यलोक में आप को महान् यश प्राप्त होगा और इहलोक तथा परलोक में आपके लिये भय नहीं रहेगा ।। २० ॥ 

आत्मा नदी भारत पुण्यतीर्था सत्योदका धृतिकूला दमोर्मिः ।
तस्यां स्नातः पूयते पुण्यकर्मा पुण्यो ह्यात्मा नित्यमम्भोऽम्भ एव ॥ २१ ॥ 

भारत ! यह जीवात्मा एक नदी है, इसमें पुण्य ही तीर्थ है, सत्यस्वरूप परमात्मा से इसका उद्गम हुआ है, धैरय ही इसके किनारे हैं, इसमें दया की लहरें उठती हैं, पुण्य कर्म करने वाला मनुष्य इसमें स्नान करके पवित्र होता है; क्योंकि लोभरहित आत्मा सदा पवित्र ही हैं ॥ २१ ॥ 

कामक्रोधग्राहवतीं पञ्चेन्द्रिय जलां नदीम् ।
कृत्वा धृतिमयीं नावं जन्म दुर्गाणि सन्तर ॥ २२ ॥

काम-क्रोधादिरूप ग्राह से भरी, पाँच इन्द्रियों के जल से पूर्ण इस संसार नदी के जन्म-मरण रूप दर्गम प्रवाह को धेर्य की नौका बनाकर पार कीजिये ॥ २२॥ 

प्रज्ञा वृद्धं धर्मवृद्धं स्वबन्धुं विद्या वृद्धं वयसा चापि वृद्धम् ।
कार्याकार्ये पूजयित्वा प्रसाद्य यः सम्पृच्छेन्न स मुह्येत्कदा चित् ॥ २३ ॥ 

जो बुद्धि, धर्म, विद्या और अवस्था में बड़े आदर-सत्कार से प्रसन्न करके उससे कर्तव्य-अकर्तव्य के विषय में प्रश्न करता वह कभी मोह में नहीं पड़ता ॥ २३ ॥ 

धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत्पाणिपादं च चक्षुषा ।
चक्षुः श्रोत्रे च मनसा मनो वाचं च कर्मणा ॥ २४ ॥

शिश्र और उदर की थैर्य से रक्षा करे, अर्थात् काम वेग और भूख की ज्वाला कों धर्यपूर्वक सहे । इस प्रकार हाथ-परकी नेत्रों से, नेत्र और कानों की मन से तथा मन और वाणी की सल्कर्मो से रक्षा करें ॥ २४ ॥ 

नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती नित्यस्वाध्यायी पतितान्न वर्जी ।
ऋतं ब्रुवन्गुरवे कर्म कुर्वन् न ब्राह्मणश्च्यवते ब्रह्मलोकात् ॥ २५ ॥ 

जो प्रतिदिन जल से स्नान सन्ध्या-तर्पण आदि करता है, नित्य यज्ञोपवीत श्रारण किये रहता है, नित्य स्वाध्याय करता है, पतितों का अन्न त्याग देता है. सत्य बोलता और गुरु की सेवा करता है, वह ब्राह्मण कभी ब्रह्मालोक से भ्रष्ट नहीं होता २५ ॥ 

अधीत्य वेदान्परिसंस्तीर्य चाग्नीन् इष्ट्वा यज्ञैः पालयित्वा प्रजाश् च ।
गोब्राह्मणार्थे शस्त्रपूतान्तरात्मा हतः सङ्ग्रामे क्षत्रियः स्वर्गमेति ॥ २६ ॥ 

वेदों को पढ़कर, अग्निहोत्र के लिये अग्नि के चारो और कुश बिछाकर नाना प्रकार के यज्ञों द्वारा यजन कर और प्रजाजन का पालन करके गौ और ब्राह्मणों के हितके लिये संग्रामनें मूत्युको प्राप्त हआ क्षत्रिय शस्त्रसे अन्त करण मवित्र हो जाने के कारण उर्ध्व लोक को जाता है ॥२६॥

वैश्योऽधीत्य ब्राह्मणान्क्षत्रियांश् च धनैः काले संविभज्याश्रितांश् च ।
त्रेता पूतं धूममाघ्राय पुण्यं प्रेत्य स्वर्गे देव सुखानि भुङ्क्ते ॥ २७ ॥

वैश्य यदि वेद-शासत्रों का अध्ययन करे बहाण, क्षत्रिय तथा आश्रित ना को समय-समय पर धन देकर, उनकी सहायता करे और यज्ञों द्वारा तीनों अग्नियों के पतित्र धूम की सुगन्ध लेता रहे तो बह मरने कि पश्चात् स्वर्ग लोक में दिव्य सुख भोगता हैं ।। २७ ॥

ब्रह्मक्षत्रं वैश्य वर्णं च शूद्रः क्रमेणैतान्न्यायतः पूजयानः ।
तुष्टेष्वेतेष्वव्यथो दग्धपापस् त्यक्त्वा देहं स्वर्गसुखानि भुङ्क्ते ॥ २८ ॥ 

शूद्र यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय और बैंश्य की क्रम से न्यायपूर्वक सेवा करके इन्हें सन्तुष्ट करता है, तो वह व्यथा से रहित हो पापों से मुक्त होकर देह-त्याग के पश्चात् स्वर्ग सुख का उपभोग करता है । २८ ॥ 

चातुर्वर्ण्यस्यैष धर्मस्तवोक्तो हेतुं चात्र ब्रुवतो मे निबोध ।
क्षात्राद्धर्माद्धीयते पाण्डुपुत्रस् तं त्वं राजन्राजधर्मे नियुङ्क्ष्व ॥ २९ ॥ 

महाराज आपसे यह मेंने चारों वर्णां का धर्म बताया है; इसे बताने का कारण भी सुनिये। आपके कारण पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर क्षत्रिय धर्म से च्युत हो रहे हैं, अतः आप उन्हें पुनः राजधर्म में नियुक्त कीजिये ॥ २९ ॥ 

धृतराष्ट्र उवाच ।
एवमेतद्यथा मां त्वमनुशासति नित्यदा ।
ममापि च मतिः सौम्य भवत्येवं यथात्थ माम् ॥ ३० ॥

धृतराष्ट्र ने कहा -विदुर ! तुम प्रतिदिन मुझे जिस प्रकार उपदेश दिया करते हो, वह बहुत ठीक है। सौम्य ! तुम मुझसे जो कुछ भी कहते हों ऐसा ही मेरा भी विचार है ॥ ३० ॥ 

सा तु बुद्दिः कृताप्येवं पाण्डवान्रप्ति मे सदा ।
दुर्योधनं समासाद्य पुनर्विपरिवर्तते ॥ ३१ ॥

यह्यपि मैं पाण्डवो के प्रति सदा ऐसी हो बुद्धि रखता हूँ, तथापि दुर्योधन से मिलने पर फिर बुद्धि पलट जाती है ॥३१॥

न दिष्टमभ्यतिक्रान्तुं शक्यं मर्त्येन केन चित् ।
दिष्टमेव कृतं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम् ॥ ३२ ॥

प्रारब्ध का उल्लङ्कन करने की शक्ति किसी भी प्राणी में नहीं है। मैं तो प्रारब्ध को ही अचल मानता हूँ. उसके सामने पुरुषार्थ तो व्यर्थ है ॥ ३२ ॥ 

इति श्रीमाहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरवाक्ये चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥ 

॥ इति विदुर नीति समाप्ता ॥

विश्व स्वधर्म सूर्यें पाहो